75
Share




@dawriter

कनिया काकी

0 98       

खास कहानी आप सबके सामने रख रहा हूँ। पहले भी ये कहानी पोस्ट कर चुका हूँ काफी लोगों ने सराहा था। जो नए जुड़े हैं वो भी एक बार पढ़ लें।
__________________________________________
कनिया काकी ( कहानी )

 

छोटा सा कद था , झुक कर चलती थी। शायद ज़िंदगी का बोझ उस से अब ढोया नही जाता था इस वजह से कमर भी झुक गई थी। सारा दिन चरखे में सूत कातती फिर उस सूत से जनेऊ बनाती। ब्राह्मण पट्टी में किसी के बच्चे का यज्ञोंपवीत आदि संस्कार होता तो जनेऊ बनाने का कॉनट्रेक्ट कनिया काकी को ही मिलता। आज तक मै समझ नही पाया था उस बुढ़िया को कनिया काकी क्यों कहते थे ? सारा दिन गुमसुम बस अपनी ही दुनिया में खोई हुई चरखा चलाती रहती।

मै बच्चपन से ही बाहर रहा। छुट्टियों में ही गांव जाने का मौका मिलता। गांव मुझे बहुत पसन्द आता। आज जितनी समझ तो तब थी नही के कह सकूं वहां की हरीयाली , शांत वातावरण इत्यादि आकर्षित करता था। वहां मन लगने का सबसे बड़ा कारण होता स्कूल से कुछ दिनों के लिए आज़ादी। वहां ना माँ की धमकियों का डर होता ना पापा की डांट का क्योंकी मै जानता था कोई भी गलती करूं बाबा और ताऊ जी बचा ही लेंगे। फिर गांव की नदी से भी बड़ा प्रेम था। डांट खाने को बाद भी चला जाता नदी में नहाने।

कनिया काकी को सब खुश होते तब ही देखते जब मै वहां जाता। मुझे देखते ही वो जितनी तेज चल सकती उतनी तेज चल कर आती और मुझे गले लगा लेती। और तब मुझे सबसे बुरा लगता क्योंकी वो मुझे ज़रा पसंद नही थी। वो मुझे पागलों की तरह चूमती। उन दिनों उसका चरखा चलाना भी बहुत कम हो जाता। ना जाने कहां कहां से ढूंढ कर मेरे लिए देहाती फल लाती जिनका नाम तक हम शहरों में नही सुनते। मै स्वार्थी इंसान जो उस समय बच्चा था सब फल खा लेता और बुढ़िया से जान छुड़ा कर भाग भी जाता। उसके मुंह से मुझे हमेशा बीड़ी की दुर्गन्ध आती। जो मुझे बिल्कुल पसन्द ना थी।

एक दिन मुझे खेलने जाना था पर कनिया काकी लगी अपना प्रेम बरसाने। कभी माथा चूमती , कभी सर सहलाती , कभी मेरे चेहरे को अपने झुर्रीदार हाथों में ले कर निहारती रहती। मैं उसके चंगुल से निकलने को बेचैन था। पर वो मान ही नही रही थी। आखिर में क्रोध पर मेरा नियन्त्रण ना रहा और मैने उनका हाथ झटक दिया। बेचारी गिरते गिरते बची। और मैं वहां से भाग निकला। खेल कर जब आया तो देखा वो एक कोने में बैठी एक दम उदास मानो अब रो देगी , गुमसुम सी चरखा चला रही थी। माँ मुझे देखते गुस्से से लाल हो गई और बांह पकड़ कर कमरे मे ले गई।

गुस्से से लाल हुई बोली ” यही सिखाया है तुझे हमने ? बड़ों से ऐसा ही व्यवहार आया जाता है ? क्यों की उनके साथ बद्दतमीज़ी तूने ?”

मैं तो अपने घमन्ड में चूर था। मालूम था माँ मुझे मार सकती नहीं यहां तो डरूं क्यों ! बस लगा ज़ुबान लड़ाने ” तो वो मुझे ऐसे क्यों दुलारती है ? मुझे नही पसन्द वो। दूर रहे मुझ से। आखिर है कौन वो मेरी ? सुमितवा भी तो कह रहा था वो हमारे परिवार की भी नही है। फिर क्यों रखा है उसे घर में ?”

मेरे मुंह से ये सब सुन कर माँ एक दम स्तब्ध थी। वो समझ नही पा रही थी के इतनी सी जान में ऐसी नफरत कैसे जाग गई। उसकी आंखें गीली हो गईं। लगभग रोते हुए बोली ” ये वो है जिसकी वजह से तू इतना बड़ा हुआ के माँ से ज़ुबान लड़ा सके। ये वो है जिसने तेरी जान बचाने को लिये अपने इकलौते बेटे को नदी में बहने दिया। जब तू छोटा था तो नदी किनारे चला गया था खुद से ही। हम तुझे सब जगह ढूंढ रहे थे पर तू कहीं नही मिल रहा था। कनिया काकी ने देखा तू नदी में गिर गया है। अपने बच्चे को किनारे पर रख कर नदी में उतर गई तुझे बचाने को। तुझे बचा लिया पर उधर उनका खुद का बच्चा नदी में उतर गया। वो चिल्लाती रही , रोकती रही उसे पर वो अबोध माँ की आवाज़ कहाँ से सुन पाता समझ पाता। तुझे ले कर उस तक पहुंच पाना संभव नही था और तुझे फिर डूबता छोड़ देने के लिए उनकी आत्मा नही मानी। नतीजा ये हुआ उनका इकलौता बच्चा जिसके सिवा उनका दुनिया में कोई नही था उनकी आंखों के सामने नदी की गोद में समा गया। तुझे किनारे पर लाने के बाद वो नदी में कूदी पर तब तक देर हो गई थी बच्चा मर चुका था। अपने बच्चे की लाश और तुझे लिए घर पहुंची। अहसान तक ना जताया कभी अपने इतने बड़े बलिदान का। वो उस समय मेरी जान मांगती तो भी मैं दे देती मगर। उस पगली ने बस तुझ पर थोड़ा सा हक मांगा। उसे तुझ में अपना बच्चा दिखता है। वो नही रोक पाती अपने बच्चे पर प्यार लुटाने से खुद को। ये सब किया है उसने तेरे लिए।” इतना कह कर माँ ज़ोर ज़ोर से रोने लगी और मैं माँ से लिपट कर रोने लगा। शायद वो पहली बार था जब मैं जज़्बातों को समझ कर रोया था। इस से पहले तो बच्चपने में रोता था। शायद उस दिन मेरे बड़े होने का पहला दिन था।

मैं उठा और बाहर जा कर कनिया काकी को पीछे से गले लगा कर रोने लगा और कहने लगा ” काकी हमरा माफ कर दे।”

कनिया काकी पीछे मुड़ी और मुझे गले से लगा लिया और बोली ” ना हमार बेटा रोअत ना देख सकत आनी।”

मैं काफी देर तक उनके सीने से लगा रहा। शायद मै उस दिन मतलबी मगर ईमान्दार इंसान बन गया था। उस दिन के बाद गांव जाने की खुशी के कारणों में कनिया काकी से मिलना उनका दुलार पाना भी एक अहम वजह बन गया। कनिया काकी का प्रेम निस्वार्थ प्रेम का सफल उदाहरण बन गया था मेरे लिए।

धीरज झा



Vote Add to library

COMMENT