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@dawriter

एक कली जो कभी फूल नहीं बन पाई

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वक़्फ -ए-तब्स्सुम,

कचनार-सी एक कली...

बेइंतहा़ मोहब्ब़त की चाह में,

सोज़-ए-इश़्क में ,

बेपरवाह़ -सी

खिल रही..........

हर सह़र उसकी आफताब़ -सी,

हसीऩ-सी शामें जैसे उसी के लिए बनी.....

शब़ के शामियानें में महताब़ से 

घंटो गुफ्तग़ु करती.....

गुलश़न की रौनक़ बनकर

खुशबुओं में शामिल होना चाहती थी.....!!

पर हालात़ -ए- हयात़  के आगे....

एक ना चली उसकी,

खा़र -ए- चमन नसीब़ हुआ.......

पायमाल -सी जिंदगी में,

शब़ के अंधियारों में.......

तनहा़ई के आगोश़ में.......

वो कचना़र -सी कली..

फिर कभी फूल ना बन पाई............!!

 

By Rashmi Vaishnav



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