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@dawriter

इंतज़ार, उम्मीद, और विश्वास समेटे वो आठ साल

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कुछ प्रेम कहानियों को शब्दों या किसी की कल्पना की ज़रुरत नहीं होती, वो खुद में एक गाथा होती है और ये कहानियां उन जंगली फूलों की तरह हैं जिन्हें सोच समझ कर सुन्दर बगिया में नहीं लगाया जाता यह किसी भी परिवेश किसी भी हालत किसी भी जगह बिना सोचे समझे अपने आप ही उग जाती हैं । प्रेम लाख परेशानियाँ कठिनाइयाँ क्यों न सह ले पर अगर वो सच्चा है तो एक न एक दिन इसका मिलन निश्चित है । ऐसा ही एक प्रेम है एक देहाड़ी करने वाले मजदूर तपेश्वर सिंह और उनकी पत्नी बबिता का । इस प्रेम कहानी को सुन कर आपका प्रेम में विश्वास और मजबूत हो जाएगा ।

 

तपेश्वर सिंह बिहार से आए हुए एक मजदुर हैं जिन्होंने बबिता नाम की एक ऐसी लड़की से शादी की जिनकी दिमागी हालत सही न होने की वजह से उसके रिश्तेदारों ने उसे ब्रजघाट उत्तर प्रदेश के एक धर्मशाला में छोड़ दिया था । कहते हैं न प्यार अँधा होता है, प्यार का अंधापन किसी को किसी के लिए इस तरह से पागल कर देता है कि वो फिर सामने वाले की कमियों को भी नज़रअंदाज़ कर देता है । वही हुआ था तपेश्वर सिंह के साथ । मगर ये साथ ज्यादा लम्बा नहीं चल पाया । कुछ महीनों बाद ही बबिता अपनी खराब दिमागी हालत की वजह से घर से लापता हो गई । तपेश्वर इस बात से पूरी तरह अंजन थे की आखिर वो गई कहाँ होगी ।

 

उनकी जगह कोई और होता तो शायद ये सोच कर चुप हो जाता कि चलो एक पागल बीवी से पीछा छूटा । मगर तपेश्वर तो प्रेमी था ऐसे कैसे चुप रह जाता । प्रेम का जुनून इन्सान से किसी भी मुश्किल लक्ष्य को पार करवा सकता है यह तपेश्वर ने साबित कर दिया जब एक साईकिल पर सवार हो कर आगे अपनी पत्नी की तस्वीर लगा कर उसे ढूंढने निकल पड़े । हर गाँव शहर और गली ढूंढा उसे मगर उसका कहीं थाह पता न चला । ऐसा नहीं कि यह पहली बार हुआ था जब एक पति अपनी पत्नी को साईकिल पर स्वर हो कर ढूंढने निकला था, इस से पहले भी 1978 में एक पति साईकिल से महाद्वीपों को पार कर के अपनी पत्नी की तलाश में गया था । वह दिल्ली से गोथनबर्ग (स्वीडन) साईकिल से गया और चार महीने और कुछ हफ़्तों में अपनी पत्नी को वापिस ले कर लौटा । मगर तपेश्वर का इंतजार बहुत लम्बा था और उसका डर और भी बड़ा जब उसे किसी द्वारा यह पता लगा की उसकी पत्नी को कुछ लोग वेश्यावृति के धंधे में बेचने के लिए ले गए हैं ।

 

तपेश्वर ने उस जगह के हर रेड लाईट एरिया में अपनी पत्नी को ढूंढा । इस मामले में उसने पुलिस कम्पलेन भी करवाई और पुलिस ने उसकी मदत का अस्वषण भी दिया मगर ज्यादा कुछ किया नहीं । सुरागों को के पीछे भागते हुए हताश निराश और डरा हुआ तपेश्वर जब एक जगह पहुंचा तब उसे पता लगा कि उसकी पत्नी को यहाँ बेचने लाया गया था मगर उसकी दिमागी हालत ख़राब होने की वजह से उसे छोड़ दिया गया । यह सुन कर तपेश्वर को थोड़ी रहत मिली मगर वो अपनी पत्नी के ना मिलने से हताश हो गया । मगर इन सब के बाद भी उसने हिम्मत नहीं हारी ।

 

आठ साल बीत चुके थे तपेश्वर को साईकिल पर पूरे भारत में अपनी पत्नी के लिए घूमते हुए मगर अभी तक उसका कोई सुराग नहीं था मगर कहते हैं न आप कोई काम लगन से करो तो भगवन रस्ते खुद से खोल देता है । यही हुआ जब 13 नवम्बर को तपेश्वर को ब्रजघाट से एक आदमी का फोन आया जिसने बताया की उसने हरिद्वार

में बबिता को देखा है । तपेश्वर एक नई उम्मीद के साथ अपने साईकिल पर सवार हो कर हरिद्वार की तरफ निकल गया । मगर अफ़सोस हरिद्वार पहुँचने के बाद पूरा दिन ढूंढने पर भी बबिता का कहीं पता नहीं चला । आगे जो हुआ वह किसी सिनेमा के  अंतिम दृश्य से अलग नहीं था । शाम के वक़्त जब तपेश्वर की आस टूटने पर थी तब उसने बबिता को अपने सामने पाया । बबिता चीथड़े हो चुके कपड़ो में बैठी थी । तपेश्वर ने पहले तो अपनी आँखों को यह सोच कर जोर से मला कि कहीं ये सपना तो नहीं मगर बबिता सच में उसके सामने थी ।

 

आठ साल इस इन्सान ने अपनी पत्नी को दिन रात तलाशा, मेहनत से कमा कर बचाई हुई पाई पाई उसे ढूंढने में खर्च हो गई और वो उसे यहाँ मिली । आज के दौर में कैसे इतने प्रेमी हैं जो इतना बड़ा जोखिम उठा सकते हैं इनता इंतजार कर सकते हैं । सच्चा प्रेम मारा नहीं है बस इस झूठे प्रेम के पीछे कहीं छुप सा गया है । सलाम करते हैं तपेश्वर सिंह जी के इस प्रेम को, इस त्याग को, इस प्रतीक्षा को और इस विश्वास को ।

 

धीरज झा



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