sunilakash

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लोगों का न्याय

वह निर्दोष व्यक्ति जिसने इंसाफ की बात कही थी, लोगों की मार से छूटने के लिए छटपटा रहा था और वहां मौजूद लोग अब भीड़ में मिलकर या तो तमाशा देख रहे थे, या उसे पीट रहे थे।

शेषनाग

"नई रोशनी" दैनिक की प्रेस में अखबार की स्थापना से लेकर आज तक, पचास वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था।

बापू देख रहे हो ना?

बापू ! देख रहे हो ना अपने सपनों का भारत ? तुम्हारी--- अहिंसा की मूरत आकंठ रक्त में डूब चुकी है।

तुम कब आओगे ?

दिक्-दिगंत का कलरव आज संगीत बना है। जीवन का ये एकाकीपन फिर गीत बना है॥ सुखद मनोहर वसंत बना है शीत आजकल। विरह-व्यथा का दर्द पुन: मनमीत बना है ॥ हृदय-उमंगें लगी सँवरने। तन्हाई का जाल कुतरने॥1॥

🌴 प्रकृति ने घोले रंग 🌴

प्रकृति ने रंग घोल दिये हैं हल्के-गहरे प्यारे-प्यारे। मन को बहुत भले लगते हैं दृश्य सलोने न्यारे-न्यारे।

देश तब मरता है !

काम चल जाता हो जब बातों-ख्यालों से। जूझना पड़ता न हो रोटी के सवालों से॥

आसमान बोलता है !

विश्वास है इंसान का, जो विपदाओं मॆं डोलता है।

पतझड़ बीत गया

उसके जीवन में पतझड़ जैसे आकर ठहर गया...और विनय के उसे छोड़ जाने के बाद से आज तक, जैसे उसके जीवन फिर कभी बहार नही आई है।

घंटों मुझसे बतियाती हो

जब मन एकाकी होता है, तुम दबे पाँव आ जाती हो।

ग़ज़ल-"बेकार की बातें न कर..."

व्यवस्था में विष घोलकर, उद्धार की बातें न कर।

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