harish999

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उत्तराखंड में रंगमंच की एक आधार शिला नाट्य गुरु श्रीश डोभाल

कंधे पर बैग, बैग में २ कपड़े और नाटक और रंगमंच की जीती जागती मिसाल न पैसे और न खाने की चिंता रगो में बहता रंगमंच एक परिचय है श्रीश डोभाल का।

बहू या अलादीन का चिराग

पति को भगवान मानने वाले समाज में आखिर कब बहू-बेटियों को इस मानसिक, शारीरिक उत्पीडऩ से मुक्ति मिलेगी, यह सवाल हर समय हमको परेशान रखता है. आखिर ऐसा क्यों होता है और कब तक होता रहेगा?

पढ़कर कोई कलेक्टर तो बनना नहीं

नए अविष्कारों को महत्व मिलना चाहिए, लेकिन इतना भी नहीं कि उसको अपनाने की धुन में अपनी परम्पराएं और अपना अस्तित्व ही गुम हो जाएं।

सबसे बड़ा तीर्थ : माता-पिता का घर

अगर भगवान न होते तो तब भी हम इस धरती पर आते, क्योंकि हमारे माता-पिता ने हमको जन्म देने का फैसला कर दिया था.

हम क्यों नहीं हासिल कर सकते अपना लक्ष्य

क्या कभी किसी ने सोचा था, चांद पर घर बसाने की या आसमां में उडने की। लेकिन करने वालों ने यह भी संभव बना दिया। तब फिर हम अपने लक्ष्य को क्यों नहीं हासिल कर सकते।

जब रौंद डाली इंसानियत

लाइफ लाइन दिव्यांगों का साथ छोड़ दें तो सरकार की दिव्यांगों के प्रति सारी कवायद पानी-पानी हो जाती है.

घातक न हो जाए कर्जमाफी

किसानों को कर्ज माफ़ी की सौगात क्यों, अन्य वह लोग भी कर्ज माफ़ी के हकदार है, जिन्होंने रोजगार शुरू करने के लिए बैंक ऋण लिया था, लेकिन किसी कारणवश उनका रोजगार चल नहीं पाया और वो बैंक के कर्जदार बन गए. कर्ज वसूली का समय बढ़ाया जा सकता है, लेकिन कर्जमाफी जायज नहीं है.

घर क्यों बन जाता है नरक

हम सत्ता पलटने और दुश्मन को धूल चटाने में माहिर है, तो फिर भी बच्चों को संस्कारवान बनाने में क्यों नाकाम साबित हो रहे है?

ज़िंदगी रोटी से चलती है, गोलियों से नहीं

हर कोई अपनी बीन ऐसे बजा रहा है जैसे जनता सांप हो और वो नासमझ खुद अभी अभी आसमान से टपका हो. चाहे कितना भी हंगामा कर लीजिये,

घर का भेदी लंका ढहाए

दोस्त हमेशा पराया और दुश्मन हमेशा अपना ही निकलता है. उसकी दुश्मनी की वजह भी साफ होती है. कभी एक ही रास्ते के हम राही जब एक-दूसरों की जरूरत या उम्मीदों पर खरा नहीं उतरते, तो वह आपस में दुश्मनी की शक्ल में अख्तियार कर लेते है.

इंसानी जिद में दफन हो गए पेड़

आज महानगरों में सांस लेने के लिए शुद्ध हवा तक मयस्सर नहीं है, कंक्रीट के जंगलों के लिए पेड़ों को दफन करके हाउसिंग प्रोजेक्ट को मंजूरी और हाइवे के चौड़ीकरण के लिए पेड़ों को कटान के चलते पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा गया है

हल्ला-गुल्ला नहीं, मंथन की जरुरत

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाने के बजाय अपने गिरेबान में झांकना बेहतर होगा. ये रोज-रोज की चिक-चिक बाजी से अच्छा है, विपक्षी दलों को मंथन करते हुए अपने आचरण में सुधर लाने की जरुरत है.

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