chandrasingh
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बस यूं ही

चांद की शीतलता उसके रुप मे जो समाई थी, लग रहा था चांद जैसे उसकी ही परछाईं थी,

जिन्दा है आज भी वो मुझमें जैसे कहीं।

जिन्दा है आज भी वो मुझमें जैसे कहीं ॥

यादों की डायरी

कहते हैं ना की, जिन्दगी को हम जितना सुलझाना चाहते हैं। वो हमें उतना ही उलझाती है। ज़िन्दगी को अपनी जिन्दगी में सुलझना बहुत कठिन है। इस लिये हमे कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। वो जैसी चल रही हैं हमें उसे वैसे ही चलने देना चाहिए।

चल आज कुछ किस्से लिखते है ।

तेरे हर एक लम्हे के खातिर, अपनी जिन्दगानी लिखते हैं ॥

मैं तुम और ये आवारगी ।

जिन्दगी में अगर कभी बिछड़ना हो तो, एक काम करना बस जरा सा तुम मेरा मान करना। मुझसे कभी किश्तो मे मत बिछड़ना जब, मैं मुकम्मल नींद मे चला जाऊँ तब, तुम मुकम्मल तौर पर बिछड़ जाना, बस ज़िन्दगी में इतना तुम अहसान कर जाना।

बस यूं ही

अगर बन जाता घरौंदे ख्वाबों से, तो इतनी शिद्दत से चिड़िया तिनका-तिनका न सजोती।

अधूरे रिश्ते

“आँखों में जल रहा है क्यों…? बुझता नहीं धुंआ..! उठता तो घटा सा है बरसता नहीं धुंआ”

जाने वालों ज़रा, मुड़ के देखो इन्हें..!

देह से अधूरे है तो क्या आत्मा तो पूरी है न, मुस्कुराहटों में मिलावट तो नहीं है ना, इक सवाल अक्सर मन में उठता है कि विकलांग कौन? जिसकी देह अधूरी है वो या जिसे इश्वर ने देह तो सुन्दर दे दी लेकिन मन की सुन्दरता नहीं दिया ह्रदय में किसी के लिए प्रेम,?

बेईमान मौसम

मौसमों ने मिल के साजिशें रच रहे थे, उस शरमाती हुई को, बेशरम कर रहा थे !!

ख्याल क्यों है.....!

मै बोला गर करता हो, बेवफाई तो मेरे लिये ये ख्याल क्यों है.?

तेरा मेरा प्यार....!

जब लहरे मुझे थोड़ा भीगो के कुछ कहने लगी, तो मै भी निःशब्द होकर खो गया कुछ यूं ही उनमें।

तुम रो लो परदेश में , नहीं भीगेगा माँ का प्यार....!

माँ एक पवित्र भावना है, संवेदना है, कोमल अहसास है। तपती दोपहरी में मीठे पानी का झरना है। एक खुशबु है। वो माँ जो कभी मिटती नहीं। देह मिट भी जाये तो अपने बच्चों की देह में रूह बन कर सिमट जाती है।

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