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दो बेज़ुबान - चीकू और मैं।

nidhi   52 views   1 year ago

मुझे रोज़ चीकू याद आता है..उसकी बड़ी बड़ी लाल आँखें याद आती हैं जो चीख चीख कर मुझसे पूछ रही हैं तुमने मुझे आज़ाद क्यों नही कराया??

ख्वाहिशों वाली खिड़की

avinashsurajpur   230 views   1 year ago

"आसमान में आज काले काले बदल थे, न तारो के कोई निशान थे न चाँद था. फैली थी अंदर से चीखती हुई, अनंत सी ख़ामोशी. और बेजान सी हो गयी थी, ख्वाहिशों कि खिड़की भी."

क्यों करूँ करवाचौथ

Maneesha Gautam   191 views   1 year ago

आप करवाचौथ क्यों करती हैं ओर यदि नहीं करती तो क्यों नहीं....मुझे आपके जवाब का इंतजार रहेगा।

जिंदगी की परीक्षा

kavita   299 views   1 year ago

माँ की मृत्यु के उपरांत नितांत अकेले पिता द्वारा पुत्र के पालन पोषण में उभरती वस्तु स्थिति एवम पिता पुत्र के बीच के प्रेम का अनूठा वर्णन

निराशा

Rajeev Pundir   263 views   1 year ago

दूसरों की मजबूरियां किस तरह हमारी समझ में नहीं आती और हमारे लिए एक पहेली बन कर रह जाती है , पढ़िए इस कहानी में I

जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख)

Mohit Trendster   20 views   1 year ago

बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं?

समूह वाली मानसिकता (लेख)

Mohit Trendster   2 views   1 year ago

समूहों की रेखाओं में उलझे समाज का विश्लेषण।

अपवित्रता??....... वो पाँच दिन (पीरियड्स)

Maneesha Gautam   74 views   1 year ago

जिस खून को लोग अपवित्र समझते हैं वे यह क्यों नहीं समझते कि 9 महीने तक माँ के पेट में उसी खून से उनका विकास और पालन पोषण होता है।

नार्मल डिलीवरी ही होनी चाहिए।

Maneesha Gautam   871 views   1 year ago

वो पिकं रेखाएं माँ बनने की परीक्षा में पास होने के संकेत थे। आंनद ,रमा का पति भी संपूर्णता की परीक्षा में सफल होकर गर्व महसूस कर रहा था।

अपशकुनी

kavita   118 views   1 year ago

समाज की घृणित सोच और गिरी हुई मानसिकता की शिकार एक युवती की कहानी

औरत का अस्तित्व

Mona Kapoor   18 views   1 year ago

औरत का हर रूप सम्मानीय है, उसे कमजोर ना समझते हुए उसकी इज्जत करें।

कंधो का बोझ

avinashsurajpur   175 views   1 year ago

पार्क की एक बेंच पर अपनी धर्मपत्नी के साथ बैठे शर्मा जी आज अपने कंधो को कुछ जादा भारी महसूस कर रहे थे। हालाँकि वो उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ बहुत सी जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल जाती है और कंधो का बोझ बहुत हद तक कम भी हो जाता है। लेकिन उनके कंधो पर इतना बोझ क्यों था??

धारा विरुद्ध

suneel   127 views   1 year ago

पर मैं सोच रही थी, कि हम लोगों ने जिस तरह अकारण ही बेटे के जन्म को उत्सव का पर्याय बना दिया है, अब उसे बदलने का वक्त आ गया है।

सबै सयाने एक मत

prakash   18 views   1 year ago

कई बार हम वास्तविकता जाने बगैर ही परिस्थितियों को दोष देते हैं। लेकिन कई बार केवल परिस्थितियाँ या साधन ही दोषी नहीं होते अपितु हमारी सोच मे ही कोई दोष रह जाता है , और हम आत्मविश्लेषण किए बगैर ही किसी को भी दोष देते फिरते हैं ।

ज़िंदगी जीत गई

kusumakardubey69   355 views   1 year ago

रोहित नामक एक युवक को अचानक ज्ञात होता है कि वह एच आई वी पॉजिटिव है। वह जीने की आशा छोड़ देता है। उसकी पारिवारिक परिस्थिति खराब हो जाती है। एक शुभचिंतक के सहयोग से वह अपनी ज़िंदगी की जंग जीत जाता है।