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जब जड़ों में पनपता हो भेदभाव

harish999   11 views   1 year ago

भारत को डिजिटल इंडिया बनाने पहले कुछ सवालों के सकारात्मक जवाब तलाशने होंगे।

​तुम्हारे बिना वो खुद खुद का भी नहीं

dhirajjha123   16 views   1 year ago

हर बात पर रूठना और रूठ कर कह देना कि अब जा रहा हूँ मैं

​चले आओ

dhirajjha123   16 views   1 year ago

तेजाबी बूंदों ने बना दिया है थोड़ा सा बदसूरत जो छटपटा रही है इस अनचेते हमले से

बरगद

Amritanshu Yadav   7 views   1 year ago

एक कविता है जो समसायिक विश्व में स्वार्थीपन पर तंज कसती है...

Mohra

alok   18 views   1 year ago

अब मेरी हालत ख़राब हो गयी थी । इस कारण नहीं कि मुझे एक अप्रत्याशित खुशी नसीब हुई थी, बल्कि इसलिये कि मुझे अब यह महसूस हो गया था, कि मोहरों को चलाने वाले हाथ कभी मोहरा नहीं बना करते

हमको उठा लो भगबान (कहानी जैसा ही कुछ)

dhirajjha123   9 views   1 year ago

अच्छा सिला दिया तुने मेरे प्यार का यार ने ही लूट लिया घर यार का” ई गीत 36वीं बार बज रहा था । चाईना का फोन, कान फाड़ू अबाज, लोराएल झोराएल आँख के सामने खुलल दस रुपया में ली हुई दर्द भरी सायरी के किताब आ अँटा चालने वाला चलनी के जैइसे छलनी हुआ रमजनमा के दिल । दू महीना हो गया फूलबतिया के सादी हुए ।

दूजी कोख में 'अपना' बच्चा

Mohit Trendster   33 views   1 year ago

A tail of surrogacy and blackmail....

रंग का मोल

Mohit Trendster   9 views   1 year ago

आज भारत और नेपाल में हो रहीं 2 शादियों में एक अनोखा बंधन था।

उम्मीदों की कश्ती- अंतिम भाग

abhidha   68 views   1 year ago

बहुत दूर तक साथ चलते-चलते अब वक़्त हो चला था कि घर की ओर जाया जाए। अपनी आँखों में उदासी के घने बादल लिए हम दोनों अपने-अपने कमरे में पहुँच गए।अलख रसोई में जाकर आज खुद अपने हाथों से पकोड़े और अदरक वाली चाय बना रही थी मेरे लिए।

उम्मीदों की कश्ती-७

abhidha   53 views   1 year ago

बर्फीले तूफ़ान के गुज़रते ही हमने अपनी चढ़ाई शुरू की। अब धीरे-धीरे जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे हमें ऑक्सीजन की कमी महसूस रही थी परन्तु अलख में पता नहीं कहाँ से एक नयी ऊर्जा का संचार हो गया था

उम्मीदों की कश्ती-६

abhidha   56 views   1 year ago

अगली सुबह से हम लोग अलख के अंडर ट्रेनिंग में थे। कर्नल साहब आर्मी में थे और मैं खुद भी एक बार एवरेस्ट की आधी चढ़ाई चढ़ चुका था इसलिए हमें कोई परेशानी नहीं होती। अलख के नए पैरों की वजह से उसे पहले छोटे-छोटे रास्तों पर ट्रैकिंग करवानी थी जिससे उसके पैरों को पहाड़ी रास्तों की आदत हो जाये।

उम्मीदों की कश्ती-५

abhidha   67 views   1 year ago

सारी रात मुझे नींद नहीं आई। देर रात मैं उठकर कागज़ पर कुछ लिखकर कश्तियाँ बना रहा था। अगली सुबह मैं झरने की ओर भागा देखा तो अलख नहीं थी।

उम्मीदों की कश्ती-४

abhidha   69 views   1 year ago

अलख के साथ जब मैं घर पहुँचा तो कर्नल साहब और तृप्ति जी मुझे हैरानी से देख रही थीं।

उम्मीदों की कश्ती-३

abhidha   79 views   1 year ago

'शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पर बुलाया है'

उम्मीदों की कश्ती-२

abhidha   89 views   1 year ago

यूथ हॉस्टल पहुँचकर जूता एक तरफ फेंक केयर टेकर को आवाज़ दी- काका खाने में क्या है? वो बोला- साब,आज तो जीरा आलू, रोटी और दाल तड़का ही है