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घूंघरू

kumarg   53 views   1 year ago

आजकल उसके घूंघरूओं से न जाने माँ को क्यों चिढ़ होने लगी है । जबकि अब तो जब चलती है तो घूंघरूओं की छनकार सुन हर आता जाता उसे कितनी हसरत से निहारता है । माँ बाप के सपने से इतर उसने भी एक सपना देखा सिल्वर स्क्रीन पर चमकने का । माँ को समझा बुझाकर पिता को बिना बताये वो बम्बई पहुंच गई ।

जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख)

Mohit Trendster   20 views   1 year ago

बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं?

वो चेहरा कहीं खो गया।

rita1234   526 views   10 months ago

माँ का महत्व हम सब को मालूम है। बचपन से लेकर हर अवस्था में हमे माँ के स्नेह और प्रेम की जरूरत होती है

मुंबई कॉलिंग

kumarg   28 views   1 year ago

ट्रकवाला ओवरटेक करने लगा तो ड्राईवर ने गाड़ी का एक चक्का साइड में उतार दिया । बगल से गुजरती लड़कियां साइकिल रोककर खड़ी हो गई । गाड़ी पास आते ही सब ने एक साथ हाथ हिलाया "बाय बाय " एक गर्व भरी मुस्कान मूंछों के नीचे छुपाते हुए बाबूजी बोले "वहाँ लफंगई थोड़ा कम करिएगा । "

निराशा

Rajeev Pundir   263 views   1 year ago

दूसरों की मजबूरियां किस तरह हमारी समझ में नहीं आती और हमारे लिए एक पहेली बन कर रह जाती है , पढ़िए इस कहानी में I

तेरा मेरा प्यार....!

chandrasingh   19 views   1 year ago

जब लहरे मुझे थोड़ा भीगो के कुछ कहने लगी, तो मै भी निःशब्द होकर खो गया कुछ यूं ही उनमें।

ख्वाहिशों वाली खिड़की

avinashsurajpur   230 views   1 year ago

"आसमान में आज काले काले बदल थे, न तारो के कोई निशान थे न चाँद था. फैली थी अंदर से चीखती हुई, अनंत सी ख़ामोशी. और बेजान सी हो गयी थी, ख्वाहिशों कि खिड़की भी."

"ज़िन्दगी है"

ayushjain   15 views   1 year ago

"कहीं रोती ज़िन्दगी है कहीं हँसती ज़िन्दगी है

अनसुलझा चेहरा

gauravji   50 views   1 year ago

वो काली अंधेरी रात को पसंद करने लगा था अब।  जिसे रौशनी से नफरत करते मैं आज-कल देख रहा हूँ, वो जिंदगी में कुछ खास करेगा या ना करेगा ये तो कोइ नहीं जानता पर वो खुद में संपूर्ण है और सफल है ,ये उसने साबित कर दिया है

समय की पीड़ा

harish   9 views   1 year ago

समय दूसरे समय से कह रहा है कि बताओ मैं इन्हे इनके समय के बारे में कैसे बताऊ?

उम्मीदों की कश्ती-४

abhidha   72 views   1 year ago

अलख के साथ जब मैं घर पहुँचा तो कर्नल साहब और तृप्ति जी मुझे हैरानी से देख रही थीं।

Mohra

alok   18 views   1 year ago

अब मेरी हालत ख़राब हो गयी थी । इस कारण नहीं कि मुझे एक अप्रत्याशित खुशी नसीब हुई थी, बल्कि इसलिये कि मुझे अब यह महसूस हो गया था, कि मोहरों को चलाने वाले हाथ कभी मोहरा नहीं बना करते

"फुर्सत के दो पल मिल जाते काश"......

vandita   423 views   1 year ago

आज के समय मे लोग इतना व्यस्त हो गए है कि उनके पास अपने लोगों के लिए वक्त नहीं है। ऐसा ही कुछ मेरी इस कहानी में आपको पढ़ने को मिलेगा।

घर का भेदी लंका ढहाए

harish999   25 views   1 year ago

दोस्त हमेशा पराया और दुश्मन हमेशा अपना ही निकलता है. उसकी दुश्मनी की वजह भी साफ होती है. कभी एक ही रास्ते के हम राही जब एक-दूसरों की जरूरत या उम्मीदों पर खरा नहीं उतरते, तो वह आपस में दुश्मनी की शक्ल में अख्तियार कर लेते है.

खौफ की खाल (नज़्म)

Mohit Trendster   2 views   1 year ago

खौफ की खाल उतारनी रह गयी, रुदाली अपनी बोली कह गयी... रौनक कहाँ खो गयी? तानो को सह लिया, बानो को बुन लिया। कमरे के कोने में खुस-पुस शिकवों को गिन लिया।