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@dawriter

Mohra

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alok by  
alok

मोहरा
मैंने शतरंज़ कभी खेली नहीं है । वैसे भी इस खेल के बारे में कहा जाता है कि ये दिमाग़वालों का खेल है, और मैं ठहरा दिमाग़ से पैदल, सो वैसे भी मुझे पात्रता नहीं बनती है । हाँ मैं लोगों को शतरंज़ खेलते हुए ज़रूर देखता हूँ । लोग खेलते रहते हैं, मैं देखता रहता हूँ । लोग बडी ही बेरहमी से मोहरे चलते हैं, मैं देखता रहता हूँ। मुझे मोहरों की दयनीय हालत पर तरस आता है । बेचारे ! उनके आकार से कई गुना बडा कोई हाथ आता है, और उठाकर जहाँ मरज़ी हो, उन्हें ले जाकर पटक देता है । मैं सोचता हूँ , मोहरे भी इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहते होंगे या उन्हें तैयार रहना पडता होगा । कोई चारा भी तो नहीं होता है उनके पास ।
उफ ! मैं भी कैसी बचकानी बातें कर रहा हूँ ? सुधि पाठकों को भी मोहरा मान शतरंज की बिसात पर बिठाने का प्रयास कर रहा हूँ । लानत है मुझपर...। हाँ तो अब हम इस कहानी के मुख्य पात्र सुभाष पाण्डे से रू-ब-रू होते हैं । एक हैण्डसम सा व्यक्तित्व, कंजी सी गहरी आंखें भी । किसी दक्षिण भारतीय फिल्म के हीरो सी जानदार और शानदार मूंछों का स्वामी था वह...। लडकियाँ तो ऐसे फ़िदा रहती थी उस पर, कि पूछो ही मत। मुझे खुद भी उसके साथ से गर्व महसूस होता था, जबकि वह मुझे अहसान करने के अंदाज़ में साथ रखता था । मैं ही क्या, हर कोई जुड़ना चाहता था उससे । चाहे किसी भी रूप में । कई मुँहबोली बहनें थी उसकी । मेरी पहचान सिर्फ़ उसके एक हरिजन मित्र की ही थी । मेरा अपना पृथक अस्तित्व उसके व्यक्तित्व में पूरी तरह खो गया था ।
मैं कभी-कभी अकेले में सोचा करता था कि, कोई एक लडकी तो होती फ़िदा मुझ पर, लेकिन मैं उस जैसा व्यक्तित्व और उसकी जाति लाऊँ तो लाऊँ कहां से । मैं खुद को उसके सामने हीन-दर-हीन महसूस करने लगा । सुभाष को मेरी मनःस्थिति मालूम थी, पर उसने कभी भी मेरी कुण्ठा को दूर करने की कोशिश नहीं की, और वह ऐसा करता भी क्यों, उसने मुझसे दोस्ती थोडे़ ही की थी, दोस्ती तो मैंने उससे की थी । उसे भला मेरे व्यक्तित्व के विकास में क्यों कर दिलचस्पी होने लगी । इस मुआमले में तो कोई भी अपना वर्चस्व नहीं खोना चाहता है।
हाँ तो मैं कुण्ठित होता रहा...वह देखता रहा...हँसता रहा । उसने मुझे अपने पे्रम-पत्रों को लाने, ले जाने वाला डाकिया बना छोड़ा। मैं उसका यह कार्य भी खुशी-खुशी करता रहा, लेकिन इस चक्कर में मेरा उसकी प्रेमिकाओं के घर पर आना-जाना बढ़ने लगा, और मैं मुफ़्त में बदनाम होने लगा, कि साला एक हरिजन हमारी लड़कियों से खुसुर-फुसुर करता रहता है ।
मैं और सुभाष एक ही गाँव में सर्विस करते थे । यूँ तो हम दोनों छोटी नौकरियों में थे, पर गाँव के लिहाज से हमारी नौकरियाँ बड़ी मानी जाती थीं। हमारे गाँव से पच्चीस-तीस किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बे में वर्ष में दो बार क्रमशः चैत्र और क्वांर में धार्मिक मेला लगता था । मेले में हम दोनो ही एक साथ गाँव से आते थे। मेरे दिल में बड़ा उत्साह होता था, कि आज रातभर मुझे सुभाष के साथ घूमने का मौका मिलेगा, लेकिन मेले में पहुँचते ही न जाने कहाँ से उसके चाहनेवाले और चाहनेवालियाँ टपक पड़ते, और उसे घेर लेते, और फिर उसके बाद सुभाष ये... तो सुभाष वो...। मुझे किसी भी प्रकार की तवज्ज़ो नहीं दी जाती थी, उल्टे मेरी घोर उपेक्षा की जाती थी । मैं उनके साथ घिसट-घिसट कर चलता था, बिल्कुल ही किसी लगेज़ की तरह । मेरा जी चाहता था, कि मैं छिटककर उनसे दूर हो जाऊँ, लेकिन ईष्र्यालु न कहलाऊँ सोचकर कुछ कर नहीं पाता था, और फिर सुभाष के साथ मुझे वापस गाँव भी तो आना होता था ।
मुझे उसके साथ कदम-कदम पर ऐसे कटु जातिगत अनुभव होते थे, कि विषाद से भर उठता था मैं । जी खट्टा हो जाता था मेरा । मुझे एक बार की घटना याद आती है । मुझे एक लड़की ने बड़ी ही अदा से नमस्ते किया, मैं आनंद के अतिरेक में डूबने ही वाला था, कि उसने मुझे अपने नमस्ते का प्रयोजन बता दिया । वह मुझसे कहने लगी-सुभाष जी कैसे हैं ? उनसे कहियेगा कि...। और उसके बाद मैं कुछ भी नहीं सुन पाया ।
धीरे -धीरे मैं आदी सा हो चला था इन सब बातों का । ख़ैर ये बातें तो मुझे प्रत्यक्ष में कम, और परोक्ष रूप से ज़्यादह प्रभवित करती थी, लेकिन एक घटना ऐसी थी, जिसने मुझे सीधे -सीधे प्रभावित किया था । हमारी पोस्टिंग वाले गाँव से लगभग सत्रह-अट्ठारह कि.मी. की दूरी पर स्थित एक अन्य गाँव में एक हरिजन शिक्षिका रहा करती थी । उसकी बातों से मुझे हमेशा ही यह भ्रम होता था, कि वह मुझे चाहती है । वह हम दोनों को हमेशा ही रात के खाने पर बुलाती थी । खाने के बाद सुभाष हमेशा इसी कोशिश में लगा रहता कि ज़ंगल के ख़तरों की दुहाई देकर वह वहाँ रात रूक जाये । वह जैसा चाहता था, वैसा ही होता भी था।
अब मैं सुभाष पुराण खत्म कर कुछ अपने बारे में भी कह लूँ...। मैं औरतों की कोमल भावनाओं का सम्मान करता था, और उनसे केवल भवनात्मक संबंध ही बनाये रखना चाहता था, लेकिन मुझे क्या पता था, कि उनमे से कुछ को भावनाओं के सम्मान से ज़्यादा आवश्यकताओं के सम्मान की जरूरत होती है । ख़ैर सुभाष भी भावनात्मक सम्बन्धों का ढोंग कर रूक जाता और फिर...
उनके बीच क्या था, मुझे स्पष्ट तो मालूम नहीं, लेकिन चूँकि उस शिक्षिका के घर पर मेरा आना-जाना ज़्यादह था, सो मैं बदनाम हो गया, और एक बार संयोग ऐसा बना कि उस शिक्षिका ने अपने घर जाने के लिये छुट्टी ली, उसी समय मुझे भी छुट्टी लेकर कहीं और जाना पड़ गया। इसी दौरान किसी शख्स द्वारा सारे गाँव में यह अफ़वाह फैला दी गई कि, मैं उस शिक्षिका को भगाकर ले गया हूॅं। न...न...मैं सुभाष पर इलज़ाम नहीं लगा रहा हूँ ।
सुधि पाठक बंधु भी अब तक हलाकान हो गये होंगे । धीरज धरिये भई अब मैं इस कहानी के टर्निगप्वाॅइंट पर आता हूँ ।
हमारी पोस्टिंग वाले गाँव से तकरीबन छः-सात किलोमीटर की दूरी पर एक और गाँव था वहाँ के ब्राम्हण सरपंच की एक बेटी थी पारूल वह बड़ी ख़ूबसूरत थी। उसकी पढ़ाई बड़े शहरों से पूर्ण हुई थी । सुभाष की गिद्ध दृष्टि से वह भी नहीं बची रही। जातिगत समानता के कारण उसके घर पर सुभाष को हाथोंहाथ लिया जाता था। और किसी दामाद की तरह ही उसकी ख़ातिरदारी की जाती थी, जबकि सुभाष पारूल को पटाकर अपने चाहनेवालों की सूची में एक इज़ाफ़ा भर करना चाहता था। शादी का विचार तो दूर दूर तक उसके ज़ेहन में नहीं था । लेकिन सुभाष ने यह महसूस कर लिया था, कि वह दूसरो से जरा हटकर है। वह सुभाष को जरा भी लिफ़्ट नहीं देती थी । सुभाष ने मुझसे भी कई दफे़ कहा था कि, यदि मैंने इसे पटा लिया, तो यकीन मानों, कि मेरी अब तक की मेहनत सफल हो जायेगी। इसी कोशिश में वह उसके सामने बड़े अदब से पेश आता था, और बड़े ही ख़ूबसूरत अंदाज़ में प्रबुद्धवर्गीय जुमले जैसे पारूलजी मैं समझता हूँ ..., ‘‘पारूलजी, बात दरअसल यह है कि...,’’ आदि उछाला करता, लेकिन वह उससे सिर्फ़ औपचारिक बातें ही करती। मैं तो कभी पारूल से कुछ कह पाने का साहस ही नहीं जुटा पाया । वह जैसे ही मेरे सामने आती, मैं नज़रें झुका लेता, लेकिन पारूल में कोई बात तो अवश्य थी, जो मुझे आकर्षित करती थी, और मैं खुद को उसके घर जाने से रोक नहीं पाता था ,यह जानते हुए भी कि, मैं एक मरीचिका के पीछे भाग रहा हूँ ।
कुछ दिनों के बाद मैंने अपना ध्यान लेखन की ओर केन्द्रित कर लिया । कुछ स्थानीय अख़बारों मे मेरी ग़ज़लें छपने भी लगीं । जीवन यँू ही घिसट-घिसट कर चलाता रहा, कि एक दिन अचानक पारूल मेरे घर पर आयी, और मेरी ग़ज़लांे की तारीफ़ करने लगी । उसे अपने बिल्कुल नज़दीक पाकर मेरी हालत बड़ी ही दयनीय हो गई थी । मैं लगभग घिघियाते हुए सिर्फऱ् इतना ही कह पाया-जी धन्यवाद । अब वह ग़ज़लों की तारीफ़ डूबकर करने लगी, और उधर मैं यह सोचने लगा, कि शायद वह सुभाष का जिक्र छोड़ने के लिये भूमिका बाँध रही है । मैं अब तक संभल चुका था, और प्रतीक्षा कर रहा था कि, वह सुभाष का ज़िक्र अब छेड़ी कि तब छेड़ी, लेकिन मुझे सुखद आश्चर्य हुआ, जब उसने सुभाष का ज़िक्र तक नहीं किया। मैंने यह सोचकर कि शायद उसे मेरी भावनाओं की चिन्ता है, इसी कारण वह सुभाष का ज़िक्र छेड़ने में संकोच का अनुभव कर रही है, खुद ही उसे टटोलने के उद्देश्य से सुभाष का ज़िक्र कर दिया, पर आश्चर्य वह फिर से मेरी ग़ज़लों पर ही आ गयी । जाते-जाते उसने मेरी ओर अज़ीब सी नज़रों से देखा । मैंने यह सोचकर अपना सर झटक लिया कि भला वह मेरी ओर चाहत भरी नज़रांे से कैसे देख सकती है, तो भी मेरे दिल में चाहत का अंकुर फूटने लगा था, जिसे मैंने पल्लवित होने दिया, आखिर पहला अंकुरण जो था । इस बीच क्वांर का धार्मिक मेला आ गया । मैं सुभाष के साथ हमेशा की तरह ही घूमने पहुँचा । इसे संयोग ही कहा जायेगा, कि उस दिन सुभाष के चाहने वाले कोई नज़र नहीं आ रहे थे। हम दोनों मज़े से घूम ही रहे थे, कि सामने से पारूल आती हुई दिख पड़ी । सामान्य अभिवादन के दौरान पता चला कि वह यहाँ नज़दीक ही अपने रिश्तेदार के घर पर रूकी हुई है, और टहलते हुए इधर आ निकली है । अभिवादन के बाद वह भी हमारे साथ ही हो ली । घूमते-घूमते मुझे महसूस होने लगा कि वह मुझे जरा भी तवज्ज़ो नहीं दे रही है,और सुभाष के साथ ही चिपकी हुई है। उसका यह व्यवहार मुझे गाल पर पड़े तमाचे सा लगा। दर्द से बिलबिला उठा था मैं । मेरे दिल में हुए चाहत के अंकुरण को बेदर्दी से कुचला जा रहा था । मुझे अपने आप पर घिन सी होने लगी । मुझे एक-एक पल, एक-एक युग सा लगने लगा। उसे उसके रिश्तेदार के घर पर छोड़ मैं और सुभाष वापस गाँव आने लगे। सुभाष रास्ते भर चहकता रहा, और मैं अपने नर्क की आग में दहकता रहा।
इस घटना को भूलने की कोशिश करता हुआ, मैं लिखता रहा... लिखता रहा । साहित्य मरहम की तरह होता है, इस बात का मुझे अहसास होने भी लगा था कि, एक दिन पारूल मेरे घर पर आ धमकी । कसैला सा हो उठा था मेरा मन । उसी मन से बैठने को कहा मैंने अपनी पराजय के उस प्रतीक को । एक लम्बी सी ख़ामोशी की दीवार सी तन गई थी हमारे दरमियान, कि उसने ही कहना शुरू किया-जी सुभाषजी ने कुछ कहा आपसे ? यह तो हद थी । मुझे अपने ज़ख्मों पर नमक सा छिड़कता हुआ जान पड़ा । छटपटा उठा मैं । जी चाहा कि उसे गालियाँ देकर घर से निकाल बाहर करूँ, पर मैंने बड़ी ही मुश्किल से खुद को नियंत्रित किया। इस प्रयास में मेरे होंठ दाँतों से कट गये ।
आगे उसने ही कहना ज़ारी रखा-जी मैंने सुभाषजी के माध्यम से आपके पास संदेश भिजवाया था, कि मैं आपसे मन ही मन...। सुभाषजी ने आपसे इस बारे में कुछ नहीं कहा ?
1. अब मेरी हालत ख़राब हो गयी थी । इस कारण नहीं कि मुझे एक अप्रत्याशित खुशी नसीब हुई थी, बल्कि इसलिये कि मुझे अब यह महसूस हो गया था, कि मोहरों को चलाने वाले हाथ कभी मोहरा नहीं बना करते ।
By alok kumar satpute
Dalit Writer of three languages. Hindi English and urdu.
Short tales published in Dawn's Urdu version.
Four books have been published in Hindi and one in Urdu.

 



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