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@dawriter

Dadaji

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उनकी उम्र लगभग ६५ साल थी तब. मैं ७ साल का था और उनका सबसे बड़ा चापलूस था. वो एक रिटायर्ड क्लास २ अधिकारी थे और मैं क्लास २ में था. हममें खूब छनती थी. मैं एक काम का आदमी था.जब भी नुक्कड़ की दूकान से मुझे सुपारी,तम्बाकू या दाढ़ी बनाने का ब्लेड लाने भेजा जाता था, मुझे एक रूपया कमिशन मिलता था.मैं बचपन से ही कमीशण्ड अधिकारी था. घर के आर्थिक मंदी के दौर में भी मेरा कमीशन नहीं कटता था.बीयूरोक्रेट्स का कट आप मना कर सकते हैं भला? मैं दादी से उनके कूटनीतिक सम्बन्ध भी देखता था. जब वो उनसे नाराज रहती थीं,वार्ता के लिए मुझे ही भेजा जाता था. जब उनकी नोकझोंक होती थी मैं दादाजी की तरफ से चापलूसिया हूँ हूँ करता था.दादी मुझे उनकी जासूसी के मिशन पे भेजती थीं जब वो पौवा के जुगाड़ में बाजार निकल लेते थे. मेरा काम था उनपे नजर रखना, पर एक समोसे या अंडे के घूस में मैं मामला रफा-दफा कर देता था.मेरे लिए करियर के कई रस्ते खुले थे. डिप्लोमेट और जासूस मैं था ही,जब दादाजी की आँखों में दवा डालता था वो कहते थे मेरा मुन्ना डॉक्टर बनेगा.टफ चॉइस,यू सी. हम दोनों में जबरदस्त  यारी थी क्योंकि हम दोनों घर के बेरोजगार सदस्य थे. हमारा दिमाग दिन भर किसी न किसी तिकडम में चलता था.जब भी मैं कोई बड़ी गड़बड़ किया होता था,दादाजी की ही शरण लेता था. उनके हाल कमरे में मम्मी पापा जैसे आतंकियों का प्रवेश वर्जित था. टी.वी का रिमोट किसने तोडा,टोर्च की स्प्रिंग कैसे निकल गयी, जैसे सवालों का जवाब देना हम और दादाजी अपनी तौहीन समझते थे. 

कोहरे की धुंध वाली सर्दी के दिनों में दादाजी की मौजूदगी सुहानी बात थी. हम अलाव के किनारे बैठते थे और उसमे एक सीक्रेट था. आग के नीचे मीठी आलू भुनती थी,और ये मेरा और दादाजी का सीक्रेट था. हालाँकि मेरी तेज़ नाक वाली बेहेन विकीलीक्स, सूंघ लेती थी, और उसे एक मीठी आलू का गुज़ारा भत्ता दे दिया जाता था. जब भी मैं मम्मी की नजर बचाके घर से कल्टी मारने के फ़िराक में होता था,वो लीक कर देती थी.मुझे रक्षा-बंधन का त्यौहार बिलकुल नहीं पसंद था जब मुझे उसे दस रुपये देने पड़ते थे. उस दिन दादाजी मेरे भावनात्मक बलिदान की क्षतिपूर्ति दो रुपये दे के करते थे. वो एक लंबा भूरा ओवरकोट पेहेनते थे. छुप्पन छुपाई के खेल में, मैं उसमे छुपके घर के किसी भी हिस्से में आ जा सकता था. गाँव में हमारा एक बड़ा घर था या हो सकता है उस उम्र में सबकुछ बड़ा बड़ा ही लगता था. ये उन दिनों की बात है जब पार्ले-जी  के पैकेट में 16 बिस्कुट होते थे. 

दादा जी जानकार आदमी थे. उन्होंने मुझे दुनिया और इसके लोगों के बारे में बताया. उन्होंने मुझे बताया की हमें अपने निर्णयो के लिए दूसरो का मुँह नहीं देखना चाहये. इस सिद्धांत की आड़ में हम अलमारी से मिठाई चुरा के खाते थे. उन्होंने मुझे जापान, अमेरिका और भारत के बड़े शहरों के बारे में बताया.उन्होंने मुझे वास्को डी गामा और कोलोम्बस के बारे में भी बताया.

पता है? अमेरिका हमारे एकदम नीचे है?

तो क्या अगर मैं दुआरे पे खोदुंगा तो अमेरिका पहुँच जाऊंगा?

हाँ बिलकुल!

 मैंने अमेरिका जाने का निश्चय किया.उन दिनों अमेरिका कौन नहीं जाना चाहता था? साथ ही जो रोमांचक बातें उन्होंने अमेरिका के बारे में बताई थी, उससे मेरा निश्चय और दृढ हुआ.मैं अब बड़ा हो रहा था.चीटियों की लंबी कतारें मुझे चकित नहीं करती थीं.तितलियों में कुछ स्पेशल बचा नहीं था. मैं साथ के लड़को को तिरस्कार की दृष्टि से देखता था जो उनके पीछे टाइम वेस्ट करते थे.मुझे सब मालूम था की पिजन की स्पेलिंग में आई कहा होता है और ई कहाँ पे. मैं विद्वान आदमी था,  हालाँकि मुझे एक डाउट था की, “शेर ज्यादा पावरफुल होता है? या हाथी? अब चूँकि हाथी नॉन-वेज नहीं खाता था इसलिए मैंने अपना वोट उसे दिया था. १० तक के पहाड़े याद होना और डिक्शनरी देख लेने का गुण मेरी प्रसिद्धि बन चुके थे. अब मुझे कुछ बड़ा करना था.

मैंने अपने औजार इकट्ठा किये.एक खुरपा,एक फावड़ा और एक बेलचक और निकल पड़ा अमेरिका की ओर. शुरुआत मैंने कोलोम्बस के जोश से की पर दोपहर की दो फुट खुदाई के बाद मैं थक गया.पहले मैंने सोचा की प्रोजेक्ट छोड़ दूं पर कोलंबस ने छोड़ने दिया नहीं.  इतने में घर से बुलावा आ गया,खेत से धनिया की पत्ती उखाड़ने जाना था.मैंने अपने प्रोजेक्ट को चतुराई से ढका और निकल पड़ा.मैं सोच में था की कैसे मैं अमेरिका की जमीन से बुल्ल से निकल आऊंगा और सब मुझे देख के चौंक जायेंगे. मैं वहां पे नया हीरो बन जाऊंगा.

वापस आया तो विकीलीक्स माँ के साथ खड़ी थी. मेरी साझा उपक्रम की संधि उसने तोड़ दी थी. दादा जी घर पे नहीं थे. माँ ने नहीं बक्शा. ना मुझे ना कोलंबस को.

मेरे लिए ज्यादा बेज़्ज़ती की बात मम्मी की वो उड़ती हुई चप्पल नहीं थी जिससे मैं बच गया था, बल्कि मेरी बहन की कुटीली मुस्कान थी. ये मेरे पुरुषत्व का अपमान था.मैं अब एक पल भी इस घर में नहीं रुकूंगा. जहाँ नए विचारों और इनोवेशन को सम्मान ना मिले वो घर कोई घर नहीं है. मैंने घर छोड़ देने का निश्चय किया. मैं इस घर को इसके हाल पर छोड़ देना चाहता हूँ.घर से नंगे पैर ही निकल पड़ा, पर सड़क गर्म थी इसलिए चप्पल पहनने वापस आया. किसी ने नहीं रोका. मैंने अपने कुत्ते शेरू को इमोशनल सपोर्ट की उम्मीद से देखा पर उसने भी मुझे इग्नोर कर दिया. साला आजकल किसी कुतिया के खयालो में खोया रहता है.जीभ निकाल के हांफता रहता है,कुत्ता कही का. खेत और पुराना अस्पताल पार होकर अब मेनरोड आ गयी थी.  गुमटीवाले ने पूछा,"क्या तुम अपने दादाजी को ढूंढ रहे हो? मैंने कहा,"मैं जा रहा हूँ.".वो मुस्कुराया और मैं आगे बढ़ गया. शहर मुझे बुला रहा था.मैं अपनी पक्षपाती माँ से नफरत करता हूँ. मैं कभी इस घर लौट के नहीं आऊंगा.मैं किसी होटल पे काम करूंगा और साथ साथ पढाई भी करूंगा.मैं बड़ा आदमी बन जाऊँगा पर कभी यहाँ लौट के नहीं आऊंगा.अच्छा मैं एक बार लौट के आऊंगा, इन्हें इनकी गलती का एहसास कराने.तब समझ में आएगा. क्या सब लोग मुझे ढूंढ रहे होंगे? सब मेरे लिए रो रहे होंगे.मैंने घर के सभी चेहरों को रोते हुवे इमेजिन किया और खुद भी रोने लगा.पर, मैं आने जाने वालों से अपने आंसू छुपा लेता था. शाम हो गयी है.मैंने अपनी चाल धीमी कर दी.घर से एक किलोमीटर दूर आ गया था. अगर दादाजी आएंगे तो मैं उनसे बात भी नहीं करूंगा और उनके साथ वापस जाना?सवाल ही नहीं है.मैं उनसे नफरत करता हूँ और उनसे कभी बात नहीं करूंगा.वो क्यों नहीं आये थे मुझे बचाने?वो जरूर मेरी बहन से मिले हुवे होंगे.मुझे यकीन हो गया है.

 

कोई मुझे लेने क्यों नहीं आ रहा है? मैं इस पुलिया पे बैठ जाता हूँ.घर छोड़ने का मतलब लगातार चलते रहना नहीं है. अँधेरा हो गया है. अरे वो दूर से दादाजी आ रहे हैं क्या? नहीं कोई और है.पर मैं तभी वापस जा सकता हूँ और ये सब बेज़ती भूल सकता हूँ अगर वो वादा करें की वो बहन को घर से निकाल देंगे.सिंपल और साफ़ बात है. फिर मुझे अपने बहन पे दया आयी..मैं सख्त था और दादाजी मोलभाव कर रहे थे. जल्द ही एक अंडे और एक समोसे पे बात तय हुई. पर अभी तक किसी परिचित का दूर दराज तक नामो निशाँ नहीं था.

दूर से एक आकृति साइकिल पर आती दिखी. अरे ये तो दादाजी हैं. दौड़ के उनकी बाहों में कूद गया..मैंने अपनी सारी आपबीती नामकमिर्च लगा के सुनाई. ऑंखें और नाक दोनों बह रही थी.हाथ में पार्ले-जी बिस्किट लिए,आगे डंडे पे मैं राजा की तरह बैठ के लौटा.बहन दरवाजे पे खड़ी थी. "बेवकूफ लड़की!तुम्हे क्या पता मैंने तुमपे कितना एहसान किया है.

(किसी ने नोटिस नहीं किया था की मैं घर पे नहीं हूँ.)

 



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