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@dawriter

"सुम्मी की माँ.."

26 284       
kavita by  
kavita

 

दो वर्ष की अबोध बच्ची अपनी मां के पार्थिव शरीर के पास बैठी थी ...रो नहीं रही थी सिर्फ माँ के शरीर पर बैठने वाली मक्खियों को उड़ा रही थी और बड़े ही विस्मय में से सब आने जाने वालों के चेहरे देख रही... सुम्मी नाम था उसका जो शारीरिक रुप से थोड़ी दुर्बल थी, मां के बीमार होने के कारण ,उसकी देखरेख उस प्रकार से ना हो पा रही थी जैसे की सामान्य माताएं अपने जिगर के टुकड़े का रखरखाव करती हैं किंतु सुम्मी की मां तो पिछले एक वर्ष से बीमार ही थी..!

सुम्मी के जन्म के बाद ही से उसे विभिन्न प्रकार की व्याधियों ने जकड़ लिया था..! हर प्रकार के कष्ट भोगने के बाद अन्ततः उसके शरीर ने उसके रोगों का भार ढोने से इनकार कर दिया..! और अपने पीछे वो छोड़ गई अपनी अबोध बच्ची को, जिसके बाल यही कोई पंद्रह दिनों से अधिक हो गए थे सँवारे हुए..उनमे तेल की चम्पी न हुई थी,जगह जगह उलझे बालों में गांठे पड़ गयी थी और उनमें कपड़ों के रेशे और धूल भी फंसी हुई थी..! .....बरसात के दिन थे अतः चेहरे पर जुकाम के निशान भी सूख कर पपड़ीनुमा परत बन गए थे और ऊपरी होंठ और नाक के मध्य लालिमा ....कुल मिला कर बदहवास सी शक्ल हो गयी थी बेचारी की..! वो टुकुर टुकुर सबको रोते कलपते ,तो कभी आपस मे बात करते देख रही थी..शायद सोच रही थी कि,माँ उठती क्यों नही? ....और सब ...जो कल तक उसकी माँ के पास फटकते न थे, माँ से घृणा करते थे वो भी आज उसे छूकर लिपटकर रो रहे हैं? ...कई अपरिचित चेहरों को असमंजस से देख रही थी जिन्हें न पहचानती.. उनके द्वारा उसकी माँ के शरीर पर हाथ रखे जाने पर, उसका हाथ हटाने की कोशिश करती ,और तोतली भाषा मे 'अतो अतो '..कहकर माँ के प्रति स्वाभाविक प्रेम और नैसर्गिक जलन का प्रदर्शन करती, जैसा कि हर बच्चा करता है कि, उसकी माँ का स्पर्श केवल वही करे..भला कोई और क्यों छुए !! '' ........

वो सोचती ...' माँ उठती क्यों नही' ...बोलती क्यों नही..बार बार कहती ..' मम्मी उथो उथो...' ऐछे बैटो.. किन्ना छो लही हो..' ...और उसकी इन हरकतों से वहां मौजूद हर व्यक्ति की छाती फट सी जा रही थी , उस बच्ची की हालत और माँ की मृत्यु की इस हृदय विदारक घटना से सभी की आंखे नम थीं...!

और सरला (सुम्मी की माँ) वो तो जैसे बड़ी गहरी नींद सोई थी मुख पर बड़ा सुकून था...बड़ी ही मिलनसार महिला थी और नाम के अनुरूप सरल भी..पति अनुज भी भलामानस था किसी से भी मिलता तो उसके चेहरे पर मुस्कान ला देता , कर्मठ और ईमानदार भी था सुकून से दो रोटी खाने भर को कमा भी लेता था...पति पत्नी आराम से जिंदगी गुजर बसर कर रहे थे..फिर उनके जीवन मे सुम्मी आयी और दोनों की जिंदगी जैसे खिल सी गयी..! साल भर तक सब अच्छे से चला किन्तु ये खुशी ज्यादा दिनों तक टिकी न रह सकी ...। सुम्मी के सालभर का होते होते सरला का शरीर कमजोर पड़ने लगा और आए दिन उसे कमजोरी रहने लगी ...कमर के पिछले हिस्से, रीढ़ की हड्डी में दर्द की शिकायत हो गई ..उसने दर्द से बचने के लिए दर्द निवारक गोलियां लेना शुरू किया.... आए दिन जब भी उसे दर्द हो जाता ..तो दर्द को कम करने के लिए ,दवाइयां खा लेती...! दवाई के प्रभाव से दर्द कम हो जाता ...किंतु ऐसा रोज करने से उसकी किडनी खराब होने लग गई ...प्रारंभ में पता ना चला और जब पता चला तो काफी देर हो चुकी थी जिसका परिणाम यह हुआ कि आज सुम्मी अनाथ हो गई ...।

तभी महिलाओं का एक झुंड सरला के शरीर की ओर बढ़ा और उसे अंतिम क्रिया की विधि के लिए तैयार करने( स्नानादि की प्रक्रियाएं कराने ) हेतु....।


और कोशिश की जाने लगी कि, सुम्मी वहां से हटकर पिता की गोद में चली जाए ..किंतु बच्ची ने मां के शरीर को पकड़ कर रोना प्रारंभ कर दिया और वह सरला की छाती से चिपक गई उस बच्ची का यह करुण रुदन वहां उपस्थित सभी का हृदय चीर दे रही थी... दुधमुंही बच्ची का करुण क्रंदन सुनकर जैसा लगता था कि आज धरती फट जाएगी सभी चुपचाप देख रहे थे ..आंखों से जल धारा बह रही थी....

मैं भी निशब्द देख रही थी सब कुछ ....आंखों में आंसू भरे हुए...' सरला को सुहागन की तरह सजाया गया ...लाल चुनरी, लाल चूड़ियां ,लाल महावर नई बिछिया ,पायल और अंत में आई बारी सिंदूर की जिसे भरते वक्त अनुज फफक- फफक कर रो पड़ा... और बोला: '' यह तूने ठीक नहीं किया सरला...!! मुझे बीच रास्ते में ही छोड़ कर चली गई ..' बड़ी निर्मोही है तू... मेरा नहीं ,तो अपनी बच्ची के बारे में तो सोचती....!!


पिता की गोद में चिपकी सुम्मी यह सब कुछ समझने में असमर्थ थी...बल्कि, वह तो खुशी से तालियां बजा रही थी कि उसकी मम्मी कितनी सुंदर दिख रही थी... वह अचानक बोली : "पापा पापा.. मम्मी सो गई''.........'

और अनुज उसे पकड़कर पागलों की तरह रोने लगा हां सुम्मी सो गई तेरी मम्मी...हमेशा के लिए...' मेरी बच्ची ..! तुझे तो पता भी नहीं है कि क्या हुआ है... अब तू अपनी मां को कभी नहीं देख पाएगी ....देख ले ' मेरी बच्ची देख ले...अपनी मां को..." ...
वहां मौजूद हर किसी को यह दृश्य असह्य प्रतीत हो रहा था....!


खैर ... धीरे धीरे सब कुछ सम्मी की दृष्टि से विलीन हो गया...लोग सरला के पार्थिव शरीर को चार कंधों पर ले गए ....जीवन की अंतिम यात्रा पर अनुज ने अपनी जीवनसंगिनी को अपना कंधा दिया और वो सुहागन अपने पति के सिरमाथे चढ़ परमलोक की यात्रा के लिए आगे बढ़ गयी...अपने पीछे तमाम लोगों को कलपते रोते... छोड़ गई । ....और सुम्मी ....एक दो दिन तक वह पागलों की तरह अपनी मां को ढूंढती रही : 'पापा मम्मी तो लाओ ' ...अम्मा(दादी) मम्मी कहां गई? कहां गयी मम्मी...!

..और दिन बीतते रहे ...!

कहते हैं कि, वक्त से बड़ा मरहम कोई नहीं होता..। धीरे धीरे वक्त ही इन जख्मों को भरता है... परिस्थिति की मांग को देखते हुए सभी अनुज से कह रहे थे कि तुम्हे शादी कर लेनी चाहिए ...तुम नौकरी करोगे ?या बच्ची को देखोगे? किंतु अनुज ने इनकार कर दिया।

सुम्मी का नाम स्कूल में लिखवा दिया गया ...वह अपने बड़े पापा के बच्चों के साथ स्कूल जाती किंतु जब लौटकर आती.. तो बड़े पापा के बच्चे तो दौड़कर अपनी मां से चिपक जाते ' और सुम्मी को घर लौट कर आने का उत्साह ना रहता । वह आती तो घर में बाहें फैलाकर कोई उसका इंतजार नहीं करता... वो मायूसी से, चुपचाप अपने बैग को कंधे पर लादे आती ..और गुमसुम सी कमरे के भीतर जाकर अपना बैग रख कर एक ओर बैठी रहती..! न हसती, ना बोलती, ना खेलती...! चुपचाप ही रहती...।

..... एक दिन वह बैठकर कॉपी में लाइन बना रही थी कि तभी उसकी कॉपी पर एक मक्खी आकर बैठ गयी ...उसने हंस कर अपनी दादी से कहा : 'अम्मा.. यह मक्खी.. मक्खी मम्मा पास जाती है ...!!

(उस दिन जब सरला चिरनिद्रा में सोई फर्श पर लिटायी गयी थी तो यह मक्खियां उस पर बैठ रही थी इसलिए आज मक्खी देख कर उसे वो अपनी मां के पास से उड़ कर जाने और आने वाली मक्खी लगी )और उसने कहा अम्मा अम्मा यह मक्खी मम्मा पास जाती है '...यह मेरी मम्मी पास ले जाएगी ...!! इतने दिनों बाद पहली बार सुम्मी मुस्कुराई थी वो भी सरला से मिल पाने की उम्मीद में....अनुज वहीं खड़ा होकर सुन रहा था... अम्मा ने डबडबाई आंखों से अनुज को देखा और फिर ,अम्मा ने सुम्मी से कहा : "तेरी मम्मी आने वाली है बेटी" बहुत जल्दी वो बीमार थी ना अब ठीक होकर आ जायेगी...!!
...........

सुम्मी की इस प्रकार की मम्मी मम्मी की रट और गुमसुम व्यवहार को देखकर ....अनुज ने भी पुनर्विवाह के लिए मंजूरी दे दी...! किंतु इस शर्त के साथ की पहले वह कन्या से अपनी बच्ची के बारे में बात करेगा उसकी देखरेख के बारे में आश्वस्त होने के बाद ही वह विवाह के लिए हां कहेगा...!
अनुज के हां कहते ही विवाह के लिए लाइन लग गई ...फिर योग्य कन्या देख कर , सुम्मी की परवरिश के बारे में बाते तय करके ...एक सुयोग्य कन्या अंजलि से अनुज का विवाह पक्का कर दिया गया..! किन्तु सभी के मन मे सौतेली माँ के व्यवहार को लेकर आशंकाएं अवश्य थी...!

अब विवाह का दिन भी आया...

अंजलि को जब सुम्मी ने देखा तो पहले ज्यादा खुश न हुई किन्तु अंजलि शादी के लाल जोड़े में जैसे ही सुम्मी के सामने आई सुम्मी खुशी से चिल्ला पड़ी : 'पापा पापा... मम्मी वापस आ गई अम्मा देखो ! मम्मी वही लाल कपड़ा पहनी है ... मम्मी ठीक हो गयी ...! और दौड़कर अंजलि से आकर चिपक गई ...! पूरी विवाह की रस्मो के वक्त सुम्मी अनुज और अंजलि के बीच बैठी रही, फेरों के वक्त वो उन दोनों के साथ साथ चलने लगी तभी अचानक अंजलि रुकी , सभी आशंका से चौंके...किन्तु ,यह क्या? .... अंजलि झुकी और उसने मुस्कुराकर सुम्मी को गोद में उठा लिया ...और कहा : कि ,

"इतना चलने से मेरी बच्ची थक नही जाएगी...! और उसके इतना कहने भर से ही मानो पूरा मंडप ,खुशी के भाव से भर उठा.. और उपस्थित सभी लोग अंजलि के इस कदम से भाव विभोर हो उठे.. एक मां की परछाई अंजली के चेहरे में दिखाई पड़ी... हां शायद वो सरला की परछाई थी....सुम्मी की माँ की परछाई .....!

पूरे समय सुम्मी कभी अपनी मां के चेहरे पर आए बाल हटाती, कभी साड़ी के घूंघट के भीतर झांक कर देखती और अनुज और उसका पूरा परिवार,यहां तक कि, सरला के मायके वाले सभी सुम्मी और अंजलि के इस प्रेम को देखकर बड़े ही संतुष्ट थे उस बच्ची को मां मिल जाने की खुशी देखकर ....और शायद दूर कहीं सरला की आत्मा भी अपनी सुम्मी को माँ मिल जाने से तृप्त थी.....'


स्वयं मैं भी सुम्मी की माँ के इस आगमन पर बेहद खुश थी....और कानों में गूंजते विवाह के मंत्रोच्चारण में मन ही मन उन तीनों की खुशी की कामना बरबस मेरे होठों पर आ गई...!

- कविता जयन्त श्रीवास्तव



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