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@dawriter

"फुर्सत के दो पल मिल जाते काश"......

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vandita by  
vandita

सरोजिनी मौसी देखभाल केंद्र में पड़ी अपनी आखिरी सांसे गिन रही थी। उनके सांसे मानो किसी के आने का इंतजार कर रही हो, कि वह कब आएगा और मैं चैन से अपने शरीर से मुक्त हो पाओगी। उनकी इस तड़प को देख वृंदा, सरोजिनी मौसी से पूछ पड़ी, "मासी क्या बात है? आप इतना क्यों परेशान हो रही है? बहुत जल्द आप ठीक हो जाएंगी और अपने घर चली जायेंगी, पर आप दरवाजे पर किसके इंतजार में अपनी आंखें टिकाए हुए हैं? सच कहूं तो मौसी मुझे ऐसा क्यों लग रहा है, कि आप की तड़प का कारण वो ही इंसान है जिसका आप इंतजार कर रही है"। सरोजिनी मौसी की आंखें भर आई। उन्होंने कहा, "हां, वृंदा बेटी, मुझे किसी के आने का बेसब्री से इंतजार है। बहुत समय से मैं "उसके दो पल फुर्सत के" पाने के लिए तरस रही हूँ।"। मेरे पति के जाने के बाद मेरा एक मात्र सहारा मेरा बेटा, मेरे जिगर का टुकड़ा है। आज यह माँ का दिल आखरी बार ही सही, अपने बेटे से फुर्सत के दो पल पाने का इंतजार कर रही है।

(सरोजिनी मौसी अपने अतीत में खो गई और अपने वह दिन याद कर रही है ) कमल और मैंने प्रेम विवाह किया। हम दोनों ही अनाथ थे। हमारी खुशियों से भरी जिंदगी अच्छे से चल रही थी। कमल मेरा बहुत ध्यान रखते थे। मुझे बेहद प्यार करते थे और उसी प्यार का अंश जल्दी ही मेरे शरीर में पनपने लगा। कमल भी अक्सर अपने बिजनेस के चक्कर में व्यस्त हो जाया करते थे, पर हां, कभी ऐसा ना हुआ कि, उन्होंने मुझे अकेला महसूस होने दिया। जब मैं माँं बनने वाली थी, तो मैंने कमल से उनका पूरा समय मांगा था, 'कि मुझे आपका साथ और प्यार हर पल चाहिए'। कमल ने वादा किया, हालांकि बिजनेस भी जरूरी था। पर हां वह जल्दी घर आते और मेरा हर तरीके से ख्याल रखते।

पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि........ हम दोनों हॉस्पिटल गए थे, मेरी रूटीन चेककप के लिये। सब कुछ अच्छा था। वापस लौट रहे थे कि, अचानक हमारी गाड़ी के सामने एक बच्चा आ गया। उस बच्चे को बचाने में हमारा एक्सीडेंट हो गया और मेरा और कमल का साथ हमेशा के लिए छूट गया। हमें वहां के लोगों ने हॉस्पिटल में एडमिट किया। कमल तो नहीं रहे और मेरी हालत भी खराब थी। समय से पहले ही मैंने अपने बेटे को असहनीय पीड़ा के साथ जन्म दिया। पर भगवान का शुक्र है कि मैं और मेरा बच्चा सुरक्षित बच गये। मैंने कमल से वादा किया कि, मैं कभी भी अपने बच्चे को किसी भी तरह की तकलीफ नहीं होने दूंगी। उसकी अच्छी परवरिश करूंगी। समय बीतता गया, मैंने बिजनेस की भाग दौड़ भी सम्भाली और बच्चे का भी ख्याल रखा। उसे पाल पोष कर बड़ा किया। उसे कभी एहसास नहीं होने दिया की, उसके पिता का साया उसके सर पर नहीं है। मैंने अकेले ही उसे माँ और पिता दोनों का प्यार दिया। पर ये कभी न सोचा था कि मैं खुद इतनी अकेली हो जाऊँगी। जब वो छोटा था और चलने की कोशिश करता तो लड़खड़ा जाता। मैने उसका हाथ थाम चलना सिखाया। कभी चोट लग जाये तो उससे ज्यादा दर्द मुझे होता और वो भाग कर मेरे सीने से लग सब दर्द भूल जाता। पर जब से वो बड़ा हो गया, खुद को सम्हालना अच्छे से सीख गया। चोट भी आती है,तो माँ का हाथ झिटक, खुद अपने जख्मों में मलहम लगा लेता है। पर वो ये नहीं समझ रहा कि माँ के दिल पर जो चोट लगी है, उसके घाव को कौन सा मलहम सही करेगा। छोटे में बिना माँ के हाथ से खाये उसका पेट नहीं भरता था, और आज माँ देर रात इंतजार के बाद भूखी सो जाती है। पर तेरी माँ को कोई शिकायत नही है, बस उसकी एक ही ईक्षा है कि बेटा अपनी व्यस्त जिंदगी में से कुछ पल मुझे भी फुर्सत के देदे। मै बस इस आख़री समय मे तेरे साथ बैठ, बचपन वाले बेटे के साथ थोड़ी देर जीना चाहती हूँ। जैसी तू बचपन मे अपनी माँ का आँचल कभी नही छोड़ता था, आज वैसे ही तुझे अपने आँचल में छिपना चाहती हूँ।
तभी सजोजनी मौसी दरवाजे पर आते दस्तक को सुन अतीत के पल से निकल वर्तमान समय मे लौट आयी। माँ को उनके बेटे के आने की आहट मिल गयी।
सरोजनी: देख वृंदा बेटी, मेरा बेटा आ गया, मेरा इंतजार खत्म हुआ। मैं जानती थी कि वह अपनी माँं के पास जरूर आयेगा।
प्रतीक: माँ, कैसी तबीयत है आपकी? वैसे माँ, अब तू बिल्कुल चिंता ना कर। मैंने तेरी सारी सुख-सुविधा का इंतजाम कर दिया है। अब तू घर चल और आराम कर। अब तुझे किसी भी तरीके की तकलीफ नहीं होगी।
सरोजिनी: बेटा, मुझे कोई तकलीफ नहीं है। मैं ठीक हूँ। बस तेरी माँ की आखिरी यही इच्छा है कि, तू कुछ पल मेरे साथ मेरे बेटे की तरह बिता लें, जो कहीं खो गया है।
प्रतीक: (थोड़ा चिढ़़ कर) क्या माँ तू बच्चों जैसी बातें करने लग जाती है। तुझे कितनी बार समझा चुका हूँ, कि 'मैं काम में बहुत व्यस्त रहता हूँ'। नहीं है मेरे पास समय कि, मैं तेरे साथ फुर्सत से बैठ सकूं। तू क्यों नहीं समझती इस बात को। अब तू यह पागलों वाली जिद छोड़ और घर पर चल कर आराम कर। मैंने सब इंतजाम कर रखा है।
ऐसा कहते हुए प्रतीक सामने लगे शीशे में अपने को निहार रहा था और कुछ पल के लिए ठहर गया। उसके सामने उसके बचपन का प्रतिबिम्ब था और वह सोचने लगा कि, आखिर मेरी माँ क्या गलत मांग रही है? सच ही तो है कि, उसके बचपन का प्रतीक कहीं खो गया है। थोड़ी देर में प्रतीक के बचपन का प्रतिबिंब गायब हो जाता है और बड़ा प्रतीक सिहर कर सामने आता है। जब वह आंखों में आंसू भरे अपनी माँ को पलट कर देखता है और कहता है कि, "माफ़ कर दे माँ मुझे, मुझसे गलती हो गयी। तेरा दिया हुआ मेरा यह जीवन व्यर्थ है, अगर मैं तुझे दो पल फुर्सत के ना दे पाऊं। माफ कर दे माँ, अब तेरा बेटा ऐसे नहीं करेगा। अब मेरा समय बस तेरा है"।

प्रतीक अपनी माँ से यह बोले जा रहा था और जब माँ से कोई उत्तर ना मिला तो, माँ को झिंझोड़नें लगा।
"माँ माँ......." और माँ तो अलविदा कह, इस दुनिया से जा चुकी थी।
काश सरोजनी मौसी को आखिरी समय में ही सही फुर्सत के दो पल मिल जाते......।

ऐसी घटना आज वर्तमान की हकीकत बनती जा रही है। आये दिन ऐसी घटना हमे सोशल मीडिया और अखबार की सुर्खियों में देखने को मिल जाती है। मैंने ऐसी ही कुछ घटना सोशल मीडिया पर देखी तो, सोचने लगी कि ये सच ही तो है, आज सभी का जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि, उनके पास अपने ही परिवार के लिए वक्त नहीं है। पर ये गलत है, हमे अपने माँ-बाप, बीवी, बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए वक्त निकलना चाहिए। तो सायद किसी माँ का कंकाल अकेले फ्लैट में नहीं मिलेगा और न ही कोई बीमार माँ को अकेले छोड़ घूमने जायेगा। मेरे इस ब्लॉग पर अपने सुझाव और प्रतिक्रिया मेरे साथ जरूर साझा करें।

वंदिता।

 



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