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@dawriter

" ना कहना सिखिये अपने दिल को भी और दिमाग को भी "

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Neha Neh by  
Neha Neh

 

...."जहाँ तक मेरी जानकारी है।
हो सकता है मै गलत हूँ ,पर हम सब की जिन्दगी में वो एक पल जरूर आता है। जब हमारा दिल हमे कहता है, यार ऐसी जिन्दगी से तो मर जाना अच्छा, या फिर कभी दिमाग हिसाब किताब में उलझ जाता है, और जिन्दगी को टोटल लॉस में दिखाकर पैक अप की डिमांड कर बैठता है ।

पर एक बार रूकिये और सोचिये जरा ,

मै मानती हूँ की लाइफ की बड़ी से बड़ी परेशानी एक झटके में खत्म हो सकती है। लोग कहते हैं सुसाइड के लिए बहुत हिम्मत चाहिए, पर मेरी मानिए यह गलत है ,उससे कहीं ज्यादा हिम्मत आपको जीने के लिए चाहिए। हालात से लड़ने के लिए चाहिए।

एक सच यह भी है की रात चाहे कितनी गहरी हो उसका अन्त एक चमकती सुबह के साथ ही होता है। तो यह तो हो सकता है की रात थोड़ी लम्बी हो, पर फिर भी वो खत्म तो होगी ही होगी ।

एक बच्चे की कहानी सुनाती हूँ आपको, .......जब वो आठ साल का था अपने किसी साथ के बच्चे से उसकी लड़ाई हो गयी। और उस वक्त उसके बालमन ने सोचा मै मर जाता हूँ फिर जब मेरी वजह से इसको मार पड़ेगी तब समझ में आयेगा।

यह बात अलग है उसने ऐसा कुछ किया नहीं और जब थोड़ा बड़ा हुआ तो अपनी बेवकूफी पर हँसा भी और फिर वो बच्चा नाइन्थ क्लास में आ गया और उम्मीद के खिलाफ नम्बर आने पर वो एक बार फिर ट्रेन के सामने कूदने को तैयार था, पर फिर उसने खुद को रोक लिया। और फिर जब जिन्दगी में पहला प्यार उससे दूर हो गया तो एक बार फिर उसके हाथ में जहर की शीशी थी। आगे भी उसकी जिंदगी में ऐसा कई बार हुआ, हर बार के बाद जब उसे कोई खुशी मिलती तो उसे लगता अगर मै मर जाता तो यह सब कैसे मिलता। और फिर एक दिन वो अस्सी साल की उमर में जब बीमारी में अपनी जिन्दगी का हिसाब किताब लगाने बैठा तो पाया, की जिन्दगी ने जिन्दगी भर गम तो जरुर दिये पर साथ साथ खुशियों की बरसात भी करती रही। मरना तो एक दिन है ही पर ऐसे हार कर जिन्दगी से मुँह मोड़ लेना अच्छी बात नहीं।

मै मानती हूँ की कई बार हम ऐसी परेशानी मे होते हैं जिसका दूर दूर तक हमारे पास कोई हल नहीं होता तब सिर्फ सुसाइड ही सहारा लगता है। पर सोच कर देखिये कम से कम दुनिया में एक बन्दा ऐसा जरुर होगा जो आपके इस कदम पर बहुत दुःखी होगा।

और अगर ऐसा ना भी तो भी शायद अगर आप जिन्दा रहें तो आने वाली जिन्दगी में किसी की खुशियों का सबब बन सकें।

तो अब अगर कभी गलती से भी यह ख्याल दिल या दिमाग में आये तो उसे सख्ती से डाँट दिजियेगा। अपने पास एक दोस्त ऐसा जरूर रखिए जिससे आप अपने दिल की हर बात कह सके। और अगर दुनिया भरोसे के लायक ना लगे तो कान्हा जी को अपना दोस्त बना लें और फिर अपने दिल के हालात उन्हें बयां कर दें। अपना दर्द अपना डर तकलीफ सब कुछ और कमर कस कर एक बार फिर आ जाएँ मैदान में क्योंकि हारना कभी हमारी फितरत नहीं होनी चाहिये।

" नेहा अग्रवाल नेह "



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