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@dawriter

"…और हमने उसे पत्थरों से मारा!"

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*2007 Poetic-Story*
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"हैलो! आगरा फायर सर्विस स्टेशन।"
 
"हैलो, यहाँ शाहगंज इलाके कि ट्रांजिट ईमारत मे लग गयी है आग..... जल्दी मदद भेजिए।"
 
साइरन बजाती बढ़ रही थी फायर वैन,
हर गुज़रते पल के साथ  उसमे बैठे विकल का चैन,
ईमारत वासियों पर गृहण सा लगा,
उनकी उम्मीद का एकमात्र सहारा जाम में फंसा।
व्याकुल विकल सड़क पर उतर आया,
करुण रुदन चिल्लाकर उसने रास्ता बनाना चाहा,
पर  दुर्भाग्य किसी को रास्ता देता, 
इतनी सी बात वो समझ ना पाया। 
आखिर वैन को रास्ता मिला,
मंज़िल पर पहुँचकर विकल उसके साथियों को मिला उनकी कोशिशों का सिला। 
 
पर यह संतोष के पल ना थे सगे,
कुछ देर से आयी वैन पर आक्रोशित भीड़ के पत्थर बरसने लगे। 
विकल  ने यह खून का घूँट भी पिया,
मददगारों को नियति का जो पत्थर लगा,
बाहर के ज़ख्मो कि चिंता किसे थी?
दर्द तो अंतर्मन कि चोट ने दिया। 
अंततः अंदर कि चीखों ने भीड़ के पत्थरों को रोक लिया। 
 
दूसरो के लिए भूल गये यह वर्दीवाले अपने ज़ख्मो से हुयी परेशानी, 
जलती ईमारत पर बरसने लगा अमृत जैसा पानी। 
कुछ देर को लगा यह अमृत मिटा देगा सारे गम,
पर ज़ालिम तकदीर ने फिर ढाया सितम,
फायर वैन का पानी हो गया ख़त्म। 
 
 और मदद आने में अभी समय लगता,
पर लोगो को जलता विकल कैसे देखता?
बिल्डिंग कि ओर बढ़ते विकल पर पत्थर, गालियाँ और ताने बरस रहे थे,
विकल के हाथ अंदर फंसे लोगो को बचाने को तरस रहे थेI
 
विकल के साहस ने साथियों में जोश भर दिया,
कुछ ही देर में इन जांबाजो ने लगभग सभी लोगो को बचा लिया। 
 
आग फिर से भीषण होने लगीI 
 
तभी भीड़ से आवाज़ आयी.
"मेरी बच्ची यहाँ कहीं नहीं, कहीं वो अंदर तो नहीं रह गयी!!"
 
वहाँ मौजूद इतने लोगो में जैसे यह वाक्य सिर्फ विकल के कानो में पड़ा,
बदहवास सा वो फिर बिल्डिंग कि तरफ दौड़ पड़ा!
 
उफ़...पड़ा जैसे मनहूसियत का साया,
फिर उस ईमारत से कोई बाहर नहीं आया!
 
किसी ने भी उम्मीद छोड़ी नहीं, 
इंतज़ार में पत्थर मारने वालो कि आँखें पत्थर हो गयी! 
और तब तो जैसे सबकी ज़ुबाँ सिल गयी,
जिस बच्ची के लिए विकल अंदर गया था वो भीड़ में ही मिल गयी!
 
थोड़ी देर बाद!
 
"हेल्लो! सर आग पर काबू पा लिया गया है, 
घटना में कोई नागरिक नहीं मारा गया हैI
 
"नागरिक? यानी क्या कोई फायर कांस्टेबल मर गया?"
 
"नहीं सर...आपने गलत कहा...
एक फायर कांस्टेबल शहीद हो गया!
 
**समाप्त**


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