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@dawriter

अपना सा घर

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अपना सा घर ...
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वापस एक बार मुड़कर पवित्रा ने घर की ओर देखा। वो घर जो कभी उसका था ही नहीं। बचपन में अनाथ हो गई बच्ची को चाचा ने सहारा दिया। उसे एक छत मिल गई। पिता सा स्नेह करते चाचा ,लेकिन.... चाची!
आँखों के कोर भीग गए।
आज इन रिश्ते को छोड़ कर उसे जाना ही होगा....।

दस साल की थी वो जब इस घर में आई। हाँ पेट भरने के लिए रोटी और तन ढकने के लिए कपडें तो मिले,लेकिन गलतियों के लिए देह पर पड़ती उस बेंत की मार। रूआं रूआं बिखर जाता था। भरी सर्दी में हाथों से सबके कपडें धोती वो बच्ची आज भी पवित्रा को वहीं खड़ी मिली।

दो आँखे उसे हरदम देखती बेबसी से। उसके जख्मों को सहलाती लेकिन उसके हाथ नहीं थे। बस आँखें थीं और आँखो में उसके लिए प्यार। क्योंकि अगर हाथ होते तो उसके शरीर पर यह जख्म देने वाले को रोकते।
अब वे दो आँखें भी नहीं रही चली गयी छोड़ कर।
अब क्यों रूकी है वो?
अचानक ऐसा लगा वे दो आँखें उसकी पीठ को ही देख रही हैं वह वापस पलटी……”चाचाजी!”
“क्या हुआ पवित्रा? रूक क्यों गई। अपनी जमीन तलाशना चाहती हो ना तुम! तोड़ देना चाहती हो इन बेबसी की जंजीरों को, लेकिन बेटा किसके सहारे?”
“मैं….मैं….”आगे की बात मुँह से निकल नहीं पायी और वह बात को गटक गई।
“जानता हूँ मेरी बच्ची मैं तुझे तेरी चाची के जुल्मों से तो नहीं बचा सका कभी लेकिन बेटा क्या तुम अब कमजोर नहीं पड़ रही हो? वो दस साल की बच्ची जो गाल सहलाते हुए भी पढाई करती रही आज जब मंजिल नजदीक है तो छदम प्रेम का सहारा पा गलती करने जा रही हैं। ”
“लेकिन चाचाजी अब बर्दाश्त नही होता….टूट गई हूँ मैं….आखिर कब तक…? और वह मुझे प्रेम करता है और हम शादी करेंगे। ”
“इतना विश्वास है तुम्हें उस पर?”
“ हाँ “
“फिर वह तुमसे छिपकर शादी क्यों करना चाहता है?इतना प्यार है तो सामने आकर हाथ माँग ले। ”
“लेकिन वो ...वो.। मैं क्या करूँ.. क्या करूँ मैं?”
“खुद पहले अपना सम्बल बनो फिर जो इच्छा हो करना। चाहे कितने अत्याचारी है तुम्हारी चाची लेकिन तुम्हें पढने से नही रोका। इसे महसूस करो। बाकी तुम्हारी मर्जी। ”
गोद में सिर रखकर पवित्रा रो पड़ी…….तभी किसी ने उसे आवाज दी..। ।
“पवित्रा…!..पवित्रा….!”

सिर उठाकर देखा तो चाचाजी नही थे ..जैसे उसकी चेतना जाग्रत हो गई… उठकर घर के अंदर गई आवाज की दिशा में। चाची चाचाजी की तस्वीर के सामने दीपक जला रही थी। ध्यान से देखा वह अत्याचारी औरत आज कितनी कमजोर लग रही थी। पवित्रा की आँखों में आँसू निकल पड़े...। भाग कर चाची के गले लग गई…..। चाची निष्ठुर खड़ी रही…...वो रोती रही….।

अचानक चाची ने बाँहो का घेरा बना लिया और उसके साथ सुबकने लगी।

“तेरी मासूमियत भी मुझ निसंतान को क्यों नहीं बदल सकी? मैं क्यों इतनी कठोर बनी रही। शायद तुझे देख कर अपनी बंजर जमीन और बंजर लगती थी। मुझे माफ कर दे पवित्रा …!” फफक कर रोने लगी वे।
“जा जाकर पढ ले परीक्षा सिर पर है। ” उसे अपने से अलग करती हुई चाची बोली। और चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई।

एक सुखद आश्चर्य से पवित्रा भर गई। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि चाची कुछ ऐसा सोच सकती हैं।
तभी फोन घनघनाया…..

“नहीं मैं नहीं आ रही ,तुम अगर सच में प्रेम करते हो तो एक साल बाद मेरा हाथ मांगने घर आना। ” अब उसे सम्बल मिल गया था अपने पन का। शायद यही तलाश रही थी पवित्रा। आज यह घर कुछ अपना सा था।
वे दो आँखें कुछ संतोष महसूस कर रही थी शायद परिवर्तन देख कर।

दिव्या राकेश शर्मा
देहरादून।

Image Source: unsplash



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