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@dawriter

क्या आपके घर में भी कोई सौम्या है...???

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वैसे तो रविवार की सुबह सभी के यहाँ थोड़ी अलसाई होती है, मगर मेरे पड़ोसी माथुर जी के यहाँ आज सुबह से ही काफ़ी चहल पहल लग रही थी। सुबह डस्टबिन रखते पेपर व् दूध लेते हुए मैं देख रही थी कि घर के सभी सदस्य बहुत व्यस्त नज़र आ रहे थे। अचानक मुझे कुछ याद आया... दो दिन पहले ही तो भाभी जी ने कहा था रविवार को सौम्या को लड़के वाले देखने के लिए आ रहे हैं। दूर की रिश्तेदारी में जान-पहचान का ही well selected लड़का है और फॅमिली भी बहुत कल्चर्ड और रिच है बस बात बन जाये। भाभी जी की तरह मेरी भी हार्दिक इच्छा थी कि सौम्या का रिश्ता पक्का हो जाए और सच कहूँ तो मुझे पूरा विश्वास था कि सौम्या को कोई ना पसन्द नही कर सकता है। माथुर जी की बेटी सौम्या थी भी स्मार्ट और इंटेलीजेंट। इसी साल फिजिक्स से m.s.c किया था व् नेट की प्रिपरेशन कर रही है शादी की ऐसी कोई उम्र नही है मगर छोटी नव्या भी तो है अतः माथुर जी बड़ी को ज़्यादा वक्त नही दे सकते।

मैंने अभी ब्रेकफास्ट निपटाया ही था कि माथुर भाभी का कॉल आ गया। “12 बजे तक आ जाना लड़के वाले आने को हैं तुम जल्दी अपना काम निपटा कर आ जाना सुरभि”। “जरूर भाभी” कहकर मैं भी फुर्ती से काम निपटाने लगी। शुक्र है आज गौरव घर पर ही थे सो लंच की तैयारी कर बच्चों को उनकी जिम्मेदारी पर छोड़ मैं माथुर जी के घर आ गई।

भाभी जी ने मेहमानों के लिए नाश्ते के साथ लंच की भी पूरी तैयारी कर ली थी।

वे घबराई हुई सी लग लग रही थी। ‘लड़का’ बहुत अच्छा है बात बन जानी चाहिए ‘सुरभि’।

‘हां भाभी’ उन्हें जरूर रिश्ता पसंद आयेगा। हमारी सौम्या है भी तो बहुत प्यारी ऐसा कह मैंने सौम्या को देखा पर ये क्या हमेशा खिला रहने वाला सौम्या का चेहरा हल्के मेकअप के बावजूद उसकी चमक गायब थी।

अपने माँ-पापा की चिन्ता और घबराहट ने उसका आत्मविश्वास भी ख़त्म कर दिया था। मैंने उसकी पढ़ाई व एग्जाम्स से सम्बंधित प्रश्न पूछ कर उसका दिमाग डाइवर्ट किया।

मेहमान निश्चित समय पर आ गए थे। गर्मजोशी से स्वागत सत्कार के बाद नाश्ता मेज पर सज चुका था। लड़के के घर से उसके पिता और चाचा जी आये हुए थे। इधर माथुर जी के भी छोटे भाई, भतीजे और बाकी परिवार मौजूद था। “भाभी लड़का नही आया” मैंने पूछा। “नही सुरभि” हमारे यहाँ पहले बड़े बुज़ुर्ग आते हैं। उन्हें ‘लड़की पसन्द आ जाए’ फिर बात आगे बढ़ती और बाद में लड़का भी आता है। “लड़की पसन्द आ जाये”।

अज़ीब सा लगा मुझे, मगर उस वक्त मैं चुप रही। सौम्या को मेहमानों के सामने लाकर बिठा दिया गया। औपचारिक प्रश्नों का सिलसिला शुरू हुआ। मैं देख रही थी की लड़के वाले उत्तर देती सौम्या को कनखियों से देखते और अगला कुछ पूछ बैठते। वे उसे बिलकुल कम्फ़र्टेबल नही होने दे रहे थे। माँ घबराई हुई सी उसके पाक-कला में निपुण होने की बात कहती।

पापा भी बड़े संकोच के साथ उसके गुडों को बताते हैं जैसे कही उनका स्वाभिमान न झलक जाए। कुछ देर बाद सौम्या कमरे में आ जाती है। लड़के वाले लंच के कुछ देर बाद ‘जल्दी ही फोन करने’ का आश्वासन भरा अभिभावदन कर चले जाते हैं।

इस बात को चार-पांच दिन बीत चुके थे। आज शाम अचानक ही मुझे माथुर भाभी गेट पर थोड़ी सुस्त सी दिखी। मेरे पैर उनके घर की तरफ बढ़ गए। “क्या हुआ भाभी? आपकी तबियत ठीक नही”? “नही सुरभि कुछ नही”। “उस दिन जो लड़के वाले आये थे वे कुछ साफ़ नही बता रहे”। कभी कह रहे हैं कि कुंडली फिरसे मिलाएंगे। कभी कह ते लड़का 2 साल बाद शादी करेगा।

उनके जवाब से मेरा मायग्रेन शरू हो गया है और भाई साहब का शुगर भी बढ़ा जा रहा है। मेरे जेहन में बहुत से प्रश्न आ रहे थे मगर भाभी की तबियत देख कुछ भी पूछना सही नही लगा।

दोस्तों, ये हमारे 21वीं सदी के मध्यमवर्गीय परिवार का जीता जागता चित्र है। हमने बेटी को जन्म दिया, उच्च शिक्षा दिलाई, संस्कार व् गुणों से संवारा और बिठा दिया दो अंजान लोगों के सामने कि वे निर्णय ले सकते है कि हमारी बेटी उनके योग्य है कि नहीं। लड़के वालों पहले अपने लिस्ट से हमारी लिस्ट telly कर लो, लड़की को देख परख लो, खूब आवभगत करवा लो फिर घर जा के आराम से बता देना की ये रिश्ता तुम्हारे योग्य है कि नही । दो-चार बार अगर तुमने फ़ोन नही उठाया तो भी लड़केवाले है ऐसा सोच कर संतोष कर लेंगे। तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा हम ऐसे करेंगे जैसे भगवान से कोई वरदान मांग रहे हो। कई बार तो तुम हमारे लिए भगवान से भी ज़्यादा इम्पॉर्टेन्ट हो जाते हो क्योंकि तुम्हारी हां से ही हम उनके चम्तकार में विश्वास करते हैं।

विवाह एक संस्था है उसका सम्मान करना चाहिए मगर रिश्ता तय करते समय अपनी बेटी की भावनाओं और स्वाभिमान का भी ख्याल रखें। जितनी जरूरत आपको दामाद की है उतनी ही जरूरत उन्हें बहु की भी है। धैर्य और स्वाभिमान बनाये रखें।

क्या आप मेरे विचारों से सहमत है?



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