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@dawriter

ज़िंदगी जीत गई

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मैं अक्सर सुबह टहलते हुये उसके बूथ पर चला जाता। वहां से दूध का एक पैकेट लेकर लौटता। इधर कुछ दिनों से देख रहा था कि बूथवाला वो लड़का बीमार और कमजोर-सा दीख रहा था। मैने उससे पूछा तो उसने बताया कि कुछ दिनों से उसे बुखार और दांत में दर्द रहा करता था। उसने मुझसे पूछा तो मैने उसे डा.सिंह से दिखाने की सलाह दी। उसने बताया कि वो उन्ही से दिखाता था। दो - चार दिन ठीक रहता और फिर वही समस्या। मैने उसे आश्वासन दिया कि मैं खुद उनसे बात करूँगा।

अगले दिन मैने डा.साहब से बात की और उसकी बीमारी के बारे में विस्तार से बताया। डा.साहब ने मुझसे कहा कि वो लड़का उनसे अपनी पूरी बात बताता नहीं था। मैंने उसे फिर से वहां जाने को कहा। इस बार कुछ दिनों मैं बाहर रहने के कारण उसके बूथ पर जा नहीं पाया था। जब मुलाकात हुई तो उसने बहुत व्यग्रता से मुझसे बात की और कहा कि डा.साहब ने कुछ जांच करवाई थी। उन्होने सरकारी अस्पताल जाने को कहा था। पूछने पर उसने अपनी जांच रिपोर्ट दिखायी और कहा कि मुझसे सलाह लिये बिना वो अस्पताल नहीं जाना चाहता। मैने उसकी रिपोर्ट देखी। वो एच.आई.वी पोजीटिव था। मैंने उससे बात शुरू की।
'कितना पढ़े हो '
'दसवीं तक '
'ये बूथ तुम्हारी है?'
'नहीं। मैं काम करता हूँ यहां।'
'इससे पहले क्या करते थे? '
'दिल्ली में रिक्सा चलाता था'
'शादी?'
'हो चुकी है। एक बच्ची भी है। साल भर की। '
'माँ -पिताजी? '
'दोनों हैं। यहां से अगले मोड़ पर, जहां दो -तीन गायें बंधी रहती हैं, मेरा ही घर है। लेकिन अाप ये सब क्यों पूछ रहे हैं? '
'मैं जो बताने जा रहा हूँ ध्यान से सुनो और जैसा कहूंगा, वैसा ही करना होगा। पूरी बात माननी होगी। मैं तुम्हारे घर भी आउंगा किसी दिन। '
'पर, मुझे हुआ क्या है? '
'घर में तुम बड़े लड़के हो? '
'अकेला हूँ। बताइये तो मुझे हुआ क्या है? '
'सुनो। तुम एच.आई.वी पोजिटिव हो। मगर चिंता की कोई बात नहीं। तुम अस्पताल चले जाना। वहां उचित काऊंटर पर चले जाना। किसी से भी पूछने पर पहुंच जाओगे। ए.आर.टी नाम की दवा मिलेगी। उसे नियमित खाना। ठीक हो जाओगे। और हां। अपनी पत्नी को भी वहां ले जाना। शायद उसे भी दवा की ज़रूरत पड़े। '

'मतलब मुझे एड्स हो गया है। तब तो मैं मर जाऊंगा। ओह एक गलती की इतनी बड़ी सजा? '
'सुनो बच्चे। रोने से कुछ हासिल नहीं होगा। और हां। कौन कहता है कि तुम मर जाओगे? ऐसे अनेक लोग हैं जो नियमित दवा ले रहे हैं और पिछले कई साल से मजे में जी रहे हैं। '

वो लड़का, अरे हां उसने अपना नाम रोहित बताया था, उदास -सा अपने काम में लग गया और मैं वहां से दूध लेकर घर लौट आया था। अगले कुछ दिनों तक मैं बूथ पर नहीं जा सका, क्योंकि अब साइकिल पर घूमकर दूध बेचनेवाला एक लड़का मुझे घर पर ही दे जाता था। एक दिन मन में रोहित से मिलने और उसका समाचार जानने की इच्छा हुई तो टहलते हुये बूथ तक जा पहुंचा। वहां कोई और काम पर था। उसने बताया कि रोहित काम छोड़ चुका था। मुझे चिंता हुई। मैं उसके घर गया। उसके पिता बाहर ही मिल गये, गायों को सानी देते हुये। दुआ -सलाम के बाद उन्होने बताया कि उनका लड़का मरणासन्न था। उसकी बहू भी घर छोड़कर अपने मायके जा चुकी थी। वहां खड़े एक ओटो को दिखाते हुये बोले, 'बहुत आशा से ये ओटो खरीदे थे कि चलायेगा, घर की आमदनी बढ़ेगी। ये तो खुद ही चल दिया।' और फूट -फूटकर रोने लगे।

'कुछ नहीं होगा बड़े भाई। आप धीरज रखिये। मैने कई मरीजों को हंसी -खुशी जीवन जीते देखा है। ज़रा मिलवाइये तो उससे। '

आंगन पार करके बरामदा था। उससे सटा हुआ उसका कमरा था। वो एक चारपाई पर लेटा था-मरियल- सा। पेट धँसा हुआ था। कई दिनों से भूखा था शायद। मुझे बारामदे में ही कुरसी दे दी गई। उसकी माँ ने बताया था छूत की बीमारी थी इसीलिये कोई उसके कमरे में नहीं जाता। मैंने उनलोगों को बताया था कि ये छूने या साथ रहने से फैलनेवाली बीमारी नहीं है। मैं भीतर उसके कमरे में जाकर उसकी खाट पर बैठ गया। उससे बात की। उसे समझाया। उससे दवा की जानकारी चाही। उसने बताया वो अस्पताल गया ही नहीं। जब मरने ही वाला था तो दवा लेकर क्या करता। मैंने उसके माँ-पिताजी को समझाया कि एच.आइ.वी पोजिटिव होने का ये मतलब नहीं कि रोगी को एड्स हो गया। ये दवा से ठीक हो जायेगा अथवा नियंत्रण में रहेगा। ये सुखपूर्वक अपना जीवन जी सकता है। आज मैं इसे अस्पताल लेकर जाऊंगा। दवा दिलवा दूँगा। वक्त पर नियमित दवा लेता रहेगा। और हां, अपने पड़ोसियों से बता देंगे कि वो रिपोर्ट गलत थी। अब सही बीमारी की दवा चल रही है। इससे ये फायदा होगा कि पड़ोसियों की अनावश्यक तांक-झांक से मुक्ति मिल जायेगी। और हाँ, बहू की भी जाँच करवा लें। शायद उसे भी दवा लेनी पड़े।

मैं उस बात को भूल गया था। लगभग साल भर बाद सड़क पर पैदल चला जा रहा था तो एक ऑटो मुझसे सटकर खड़ा हो गया। मैंने ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ता रहा। 'सरजी!' की पुकार सुन पीछे मुड़ा। अरे! ये तो रोहित है! उसने बताया पिछले तीन-चार महीने से उसकी तबियत सुधरी है और उसने ओटो चलाना शुरू किया है। मैंने उसकी पत्नी के बारे में पूछा तो पता चला वो बेटी को लेकर मायके चली गई है। उसने दवा भी नहीं ली।
"उसकी जाँच हुई?"
"हाँ। उसे भी है।"
"और बेटी?"
"वो ठीक है,भगवान की दया से।"
"तो जाने क्यों दिये, यहां ईलाज करवाना चाहिये था ना।"
"वो मानी नहीं। मुझसे नाराज है। उसने मुझ पर घरेलू हिंसा का मुकदमा कर दिया है- महिला आयोग में।"
"अच्छा!"
"इसीलिए मैं ढूँढ़ रहा था आपको। कुछ उपाय बताइये।"
"मेरी बात ध्यान से सुनो। जब तुम्हारी पेशी होगी तो, ईलाज के सब कागज दिखा देना। गुस्सा थोड़ा भी मत होना। वो जो भी बोले बोलने देना। तुम सिर्फ इतना ही कहना कि तुम्हें बिस्तर से उठने की ताकत ही नहीं थी, मारपीट कैसे करते। ये भी बता देना कि उसे भी वही बीमारी है, जो तुम्हें है और तुम अपने साथ रखकर जसका ईलाज करवाना चाहते हो।"

वो मेरी बात समझकर मुझे घर छोड़ता हुआ निकल गया। दो महीने बाद एक दिन अचानक वो मेरे घर आया। मिठाई का डब्बा लेकर आया था। मेरे पैर छुए।फिर बताया कि महिला आयोग वाला मुकदमा समाप्त हो गया था और पत्नी उसके पास वापस आ गई थी। आयोग की अध्यक्ष ने उसे समझाबुझाकर साथ रहने और ईलाज करवाने के लिए मना लिया था।

मुझे बहुत संतोष हुआ कि रोहित का घर फिर से बस गया था। आज के समय में एड्स की इतनी अच्छी दवाएं आ गईं हैं कि जीवनभर दवा लेने और परहेज से रहने से जान तो नहीं ही जाएगी।



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