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@dawriter

हां मैं स्त्रीलिंग हूं

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हम अकसर कन्या भ्रूण हत्या के बारे में सुनते हैं। अपने आसपास आज भी बहुत से ऐसे हीन मानसिकता के लोग देख ही लेते हैं हम। आज भी लोग ,जबकि ये पूरी तरह से अनैतिक और अवैध है, लिंग की जाँच करवाते हैं। क्या दोष है उस भ्रूण क्या? यही की वो स्त्रीलिंग है। यही की वो कुछ कमजोर और हीन मानसिकता के लोगो से जुडी है। जो एक स्त्रीलिंग को पनपने न देने में अपना पौरुष समझते हैं।क्या सोचता होगा वो भ्रूण जब वो ऐसी परिस्थितियों से गुजरता होगा। उसकी भावनाएं कैसी होती होंगी। वो क्या कहना और क्या सुनना चाहता होगा।

एक कविता के रूप में मैंने कोशिश की है उस व्यथा को समझने और समझाने की। 

 

माँ मुझे याद है जब तूने मुझे पहली बार देखा था

तू खुश थी की प्यार का अंश पनप रहा था

आँख भर आयी तेरी भावुक तू हो गयी थी

तेरी खुशी तेरे चेहरे पे दो चार हो गयी थी

तूने अब मेरा और खुद का ख्याल रखना शुरू कर दिया था

तू एक एक कदम अब सोच समझ कर लेती थी

दिन बीते महीने बीते तूने फिर मुझको देखना चाहा

और थोड़ा कुछ मेरे बारे में भी जानना चाहा

तूने खुशी खुशी फिर से मेरा दीदार किया 

पर क्यूँ फिर मुझको पैदा करने से इनकार किया 

ना, माँ ना, तेरा ही तो मैं अंश हूँ

न मार मुझे मैं तेरी सुनी कोख भरूँ

तूने कुछ आँसू बहाये की कोख में है बेटी आयी

तेरा दुःख था वो या किसी और की सोच ,समझ ना आई 

तू लड़ती थी खुद से कभी डरती थी

दुनिया क्या बोलेगी ये कहती थी तू मुझसे

माँ, क्या है उलझन तुझको क्यूँ तू परेशान है 

क्या मेरा लिंग तेरे दुःख की पहचान है

माँ तू भी तो उसी  लिंग की संतान है

क्यूँ स्त्रीलिंग होना एक शर्मनाक काम है

माँ करती हूँ मैं एक वादा तुझसे 

करुँगी तेरा मैं जग में नाम रे

न होगी तू कभी शर्मिंदा करुँगी मैं ऐसे काम रे

बनूगी तेरा सहारा और बुढ़ापे की लाठी भी 

गर्व करेगी तू की तू है स्त्रीलिंग अभी 

आने दे माँ मुझको अपने प्यार की छाव में

पाने दे ममता मुझको इस जग की राहों में

तेरी हर सांस को में समझ रही थी 

तेरी ममता अभी भी मुझ तक पहुच रही थी 

तू कभी मुझको सहलाती कभी रोती मुझे बुलाती

करना था तुझको एक दर्द भरा फैसला 

लड़की जनु या कर दूँ अपनी कोख सूनी

एक कशमकश में तू अब रहती थी 

दिन रात तू मेरे बारे में सोचती थी 

पर फिर ….

माँ तो माँ होती है 

वो कहाँ अपनी संतान को छोड़ती है

तूने किया फैसला की लड़ जाऊंगी मैं

तो क्या हुआ जो वो एक लड़की है

उसे दुनिया में लाऊंगी मैं 

एक माँ करेगी पैदा एक दूजी माँ को 

बढेगा ऐसे भी नाम मेरे परिवार का

चुकाना है मुझको भी एहसान अपनी माँ का

करुँगी पैदा तुझे यह संकल्प है अब एक माँ का 

औलाद औलाद होती है 

ममता लिंग से नहीं होती है

करेगी तू भी नाम रोशन मेरा 

दूंगी ऐसे संस्कार तुझे 

जग में नाम करेगी रोशन ऐसे होंगे काम तेरे

माँ , माँ , माँ

मैं खुश हूँ माँ, तूने है इम्तेहान दिया

देखूं में भी ये जग तूने ये एहसान किया

जुड़ गया एक और रिश्ता अब हम दोनों का

लिंग ने लिंग का अब दर्द जो समझ लिया 

चल माँ मिलते हैं अब कुछ महीनो की दूरी है

अब तो मुझको भी तुझसे मिलने की जल्दी है

शुक्रिया माँ तेरा की तूने मुझे बचा लिया

कोख के साथ साथ अपना भी अस्तित्व बचा लिया 

नाज है माँ जैसे मुझको तुझपे 

एक वादा मैं भी ये करती हूँ 

तेरा सर ऊँचा रहेगा संकल्प में ये लेती हूँ 

माँ , माँ , माँ 

आ रही हूँ मैं माँ

( वैसे तो बहुत ही मुश्किल है एक माँ और एक अजन्मे बच्चे की भावनाओं को व्यक्त कर पाना। पर मैंने उसे एक स्त्री भाव से समझने और बयां करने की कोशिश की है। मैं अपनी बात आप तक पंहुचा पायी या नहीं, बताएगा जरूर)



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