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@dawriter

स्वप्न संगिनी

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जब बचपना, कुछ सपने भी मेरे थे ,
था शौक बंगलों का गाड़ियों के मेले थे ,
थी उस चाँद को छूने की चाह जहाँ बादलों के घेरे थे ,

था खोया मैं उन लालसाओं में जहाँ प्यार में सिर्फ अँधेरे थे।

ना भगवान पर गर्व था ना था खुदा का डर,
रंजिशें जीवन की चलती कल्पनाओं पर,
क्यों वक्त रूठा मेरा क्यों ढा दिया कहर,
सपने संजोये सब टूट गए नौजवान होने पर।

रहता था खुद में खोया ना थी प्यार की आदत,
कहता था सबसे अकड़कर ना थी किसी की चाहत,
बातें करता दीवारों से प्रेम-द्वेष सब भूल गया,
अकेलेपन की बीमारी ने मेरी रूह को भी छीन लिया।

अब दिल में बस दर्द और होठों पे सूनी मुस्कराहट,
धड़कनें साथ छोड़ें ना दिल की थी यही घबराहट,
सपनों को अब मेरे किसी के साथ की तमन्ना थी,
तन्हाई के इस जंजाल में रहने की एक इच्छा ना थी।

वक्त बीता इक रौशनी आयी
संग जिसके वो संगिनी आयी,
होठों पे मुस्कराहट, आंखों में शैतानियाँ
प्यार का संग अपने संसार वो लायी।

भगवान का सुमिरन करूँ
या शुक्रिया खुदा का,
जिसने है भेजा तुझे
दुःख हरने इस दुखिया का,
तू वो रूह है जो
मुझसे था बिछड़ गया,
तू वो अमृत है जिसनें
नया मुझे जीवन दिया।

मन समर्पित, तन समर्पित
है रूह भी अर्पित तुझे,
ना वक़्त की ना उम्र की
इस जग की भी ना परवाह मुझे,
ना शौक बंगलों का
ना गाड़ियों की चाहत मेरी,
चाहत है तो बस तेरी !बस तेरी ! बस तेरी !

--शिवम् तिवारी

 



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