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@dawriter

सुमन, तुम अभागन हो ....

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swappy by  
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7साल की सुमन दरवाज़े के पीछे खड़ी होकर सब देख रही थी, बिना रोये। डरी हुयी सी, एक दम चुप।

तभी उसके कानों में वो तीन शब्द पड़े, जो सुमन लगभग रोज सुनती है "सुमन अभागन है"। छोटी सी बच्ची समझ गयी कि, नानी भी उसकी जिंदगी से चली गयी है। प्यार- दुलार का एक सहारा, अब नहीं रहा। 7 साल की बच्ची की आँखों से आँसूं, सावन की झड़ी की तरह बरसने लगे।

सुमन, नानी के घर चार साल पहले आई थी, जब उसके पिता की आकस्मिक मौत हो गयी थी। छोटी सी बच्ची को कुछ पता भी नहीं था और उसकी माँ 23 साल की छोटी सी उम्र में विधवा हो गयी थी। पहली बार उस दिन सुमन ने सुना था," सुमन ,अभागन है।"

इन सब दुःख दर्द से अलग रखने के लिए सुमन को उसकी नानी के यहाँ भेज दिया गया। सुमन की जिंदगी में प्यार की परिभाषा ही 'नानी' थी। सुमन वापस माँ के पास आ गयी। अचानक से 7 साल की बच्ची,बड़ी हो गयी थी। उम्र से पहले जिम्मेदारियों का एहसास उसे हो गया था। घर बार,भाई और माँ को पूरी तरह सुमन ने संभाल लिया था।

सुमन ने 18वे साल में कदम ही रखा था कि माँ ने अच्छा रिश्ता देख कर उसकी शादी कर दी। लड़का ज्यादा पढ़ा-लिखा तो नहीं था पर घर बार बड़ा ऊँचा था। घर में सास और देवर थे। सुमन को पहली बार लगा, वो भी भाग्यशाली है। वो खुश थी ,अपने नये जीवन के सपने बुन रही थी।

पर "तुम अभागन हो ", इन तीन शब्दों ने सुमन का पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ा। सास ने बचा खुचा प्यार भी सुमन के हिस्से से नोच लिया। बेटी की तरह घर में लाकर, सुमन के साथ जानवरों से बुरा बर्ताव किया गया। पति शराब में धुत रहता था। सुमन ने सबकी मार खायी।

जब उसे कहा जाता कि," कुछ करती क्यों नहीं, अपने घर बताओ। " तो उसका एक ही जवाब होता, " शायद, मेरे मार खाने से ही सब ठीक हो जाए। शायद मुझसे सब प्यार करने लग जाए। और घर पर है कौन,रहना तो यहीं है। "

ये मूर्ख है, ये खुद ही मार खाना चाहती है। इसका कोई कुछ नहीं कर सकता। कुछ समझदार लोगों वाली दलील देकर हम आ जाते उठ कर।

अपने 3 बच्चों को गर्भ में ही खोकर "अभागन सुमन " ने 4 साल बाद एक बेटी को जन्म दिया। "वन्या"

बहुत खुश थी वो। अब उसकी जिंदगी भी उसे थोड़ी बेहतर लग रही थी। लेकिन भगवान को उसकी खुशी मंजूर नहीं थी।

पिछले महीने सुमन का पति मर गया। शराब की लत से वो बाहर नहीं आ पाया।

सुमन फिर शांत थी। नियति कैसा खेल खेलती है? औरत उसको सांत्वना देने आ रही थी। उसकी 10 महीने की बच्ची उसकी गोद में थी। किसी ने उसके सिर पर हाथ रख कर बोला ," वन्या ,अभागन है।

सुमन चीख पड़ी ,दहाड़े मार-मार कर रोने लगी। वन्या को गले लगा कर वो कांप गयी। जैसे वक्त ने घूम कर फिर से उसके मुंह पर तमाचा जड़ दिया हो। सुमन भी अपनी माँ की ही उम्र में विधवा हो गयी थी। माँ ने आकर उसको कह दिया ," बेटी, जैसे मैंने अपने दिन काट लिए, तू भी काट ले। अभागन है तू भी मेरी तरह"।

सोचती हूँ,कैसे कुछ लोगों की जिंदगी की कहानी में बस दुःख होते है।कहीं कोई आशा की किरण नहीं। पता नहीं परमात्मा इतना कठोर कैसे हो जाता है।

एक बार सुमन से मिली थी, इतना ही जाना कि उसको सजने-संवरने का बड़ा चाव था। नये कपड़े, मेकअप, चूड़ियाँ। जहाँ जो मिला, बच्चे की तरह बिना पूछे उठा कर लगा लिया। मुझे अजीब भी लगा था कि कैसी है। आज वही सुमन सादे कपड़ों में एक दम उजड़ी हुयी लगती है। उसको देखो तो, लगता है अभी उसकी शादी कि उम्र भी नहीं हुयी है, और वो इतनी छोटी से उम्र में अपना सब खो चुकी है। सबकी सुन रही है, "बेटी के सहारे जीवन काट लो।" , "अब यही तेरी नियति है"। न जाने क्या -क्या।

पर सुमन कुछ नहीं बोल रही है।

डर है मुझे कि कहीं उसने स्वीकार तो नहीं कर लिया है कि, " मैं अभागन हूँ।"

स्वपना कादियान

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