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@dawriter

वो खत.... अहसासों के !

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१८ नवम्बर २००१

प्रिय अनन्या,

आज फिर खिड़की के पास बैठकर चाय पीने की कोशिश की. बहुत दिनों बाद। तुम तो हो नहीं, बनाई भी खुद...पी भी खुद रहा हूँ। पर हाँ, कप तुम्हारा भी मौजूद है ट्रे में। ठीक ऐसे ही जैसे तुम हमेशा मेरे वजूद में घुली-मिली हुई हो। फिर तुम तो जानती ही हो कि यह सब मैं जानबूझकर थोड़े ही करता हूँ। यह तो मन है जो स्वतः रास्ते ढूंढता है...तुमसे मोहित होने के लिए !

अभी घड़ी में सवेरे के ६.१५ बजे हैं. नवंबर की गुलाबी सर्दी है, लेकिन सवेरे की यह सर्दी भी शिमला के हिमपात जैसी ही दिखती है आगरा जैसे गर्म शहर में भी! पहले स्मॉग था...अब धुंधलका छाया है। यह उतना भी डरावना नहीं है पर! सामने के फ्लैट की वह खिड़की जहाँ से निष्ठा की मम्मी की किचेन की खटपट भी दिखाई और सुनाई पड़ती है, इस धुंधलके में खो-सी गयी है...शायद धूप निकलने तक ! पर रुको... आवाजें तो आ रही हैं...बस कोई दिख नहीं रहा। कोई बात नहीं ! ...अब तुम भी कुछ तो बोलो. चाय भी ठंडी-सी हो गई है। तुम्हें तो पाइपिंग हॉट पसंद है? मेरा क्या है...पहले की तरह ही, गर्म चाहे न भी हो बस खुशबू हो उसमें तुम्हारे अहसासों की। और चाहिए क्या मुझे ?

सुनो, पी ली है चाय की आखिरी घूँट भी यह। तुम्हारे कप के साथ। नहीं, कप नहीं है यह….यह है वही मग ...जिसे तुम थोड़ा कम पसंद करती हो। कुल्हड़ की शेप का जो है यह...और कुल्हड़ तुम्हें नेचुरल पसंद हैं...कृत्रिम नहीं। फिर उनको धोना और सहेजना तुम्हें हमेशा से ऐसा लगता रहा है न जैसे कि डस्टबिन में फेंकने वाले सामान को क्राकरी के साथ सजा दिया हो ! और हां, सिंक के पास रख दिया है मग...पानी डालकर, जैसा कि तुम हमेशा टोकती हो न, कि बिना पानी के मग रखने से वह बर्तन साफ धुल नहीं पाते! वैसे हम पुरुष लोग इतने भी हाईजनिक हो नहीं पाते कभी ! घर में नँगे पैर घूमना, और काम चलाऊ सफाई ही बहुत है हमारे लिए तो !

जयेश

२४ नवम्बर २००१


प्रिय अनन्या,

तैयार हुआ बैठा हूँ….घड़ी के हिसाब से ४२ मिनट हो चुके हैं, पर अभी रामप्रसाद नहीं आया। दो बार फोन कर चुका हूँ, पर वह रास्ते में हूँ...कह कर कॉल काट देता है। उसे नहीं समझ कि देर से जाने का मेरे लिए मायने क्या हैं ! अब लगता है इसे भी मेरी दिनचर्या में कोई ख़ास रूचि नहीं रही है। इसको क्यूँ दोष दूं वह सैलरी बढ़ने की मांग नहीं कर रहा है ऐसे समय में… यही क्या कम राहत है ! नहीं तो अच्छे ड्राईवर मिलते कहाँ हैं ! अब मेरा ब्लड प्रेशर यूँ भी नार्मल चल रहा है। क्यूँ बढ़ाना उसे !

छोडो उसको …, देखो आज का क्या प्रोग्राम कितना इन्टरएस्टिंग है ! तुम यहाँ होती तो जिद करके चलती जरूर, यह मैं जानता हूँ। और देर तो तुम्हें इतनी होनी थी कि कॉन्सर्ट का आधा समय जाया हो ही जाना था! यूँ भी अलका याग्निक के गीत तुम्हें आकर्षित करते हैं न? और सोलो जी भर के...मजा आएगा। मेरी थोड़ी फोटोग्राफी भी हो जाएगी. तुम जानती हो कि मुझे भावों को कैद करना कितना अच्छा लगता है!

ओह… लगता है आ गया रामप्रसाद..! चलता हूँ अब...पहुंचना भी है, कॉन्सर्ट से पहले एक मीटिंग भी है !

जयेश

दिसंबर २, २००१

 

प्रिय अनन्या,

तुम्हारे पत्र मुझे नहीं मिल पाते, इसका अर्थ यह नहीं कि मैं तुमसे नाराज़ हो जाऊं. थोड़ा देर हुई यह पत्र लिखने में उसका कारण कुछ और है.. समझ गई ना? हां, बदलते मौसम से इस शरीर को होने वाली एलर्जी...सही पहचाना आपने ! कई दिन से छींकते-छींकते बुरा हाल है..बुखार भी हो जाता है अकसर ! न जाने कहाँ से आई है यह नाजुकता !

कई दिन से तो खिड़की के पास बैठकर फ़ेवरिट कप में चाय भी नहीं पी. मुझे मालूम है तुम्हारी भी चॉइस… मग नहीं...छोटे कप...श्वेत धवल रंग पर महीन गोल्डेन बॉर्डर, और जिनकी तली ऐसी हो जिसको अच्छे से और बेहतर ढंग से साफ किया जा सके, या फिर ट्रांसपेरेंट ग्लास के कप! और हर बार अलग-अलग तरह के कप में चाय. ऐसा ही करता हूँ यूँ तो मैं पर कई बार सब नियम तोड़ने को उद्देलित हो जाता है यह मन भी!

हां, वो मेडिसिन ले रहा हूँ...नियम से! पर एलर्जी तो नियम से नहीं बंधीं है न? उसका होना क्षम्य है ! चलूं फिर अभी? ध्यान रखना अपना!

जयेश

दिसम्बर ३, २००१

 

सुनो अनन्या,

आज जल्दी डिस्टर्ब कर रहा हूँ तुम्हें. क्या करूं सलाह लेनी जरूरी जो है तुमसे। तुम्हारे पाम के दो पौधे शायद कुछ बीमार हैं। कोई रोग उन्हें घुन की तरह खाये जा रहा है। पहले तो उन्होंने बढ़ना छोड़ दिया, अब उनके पत्ते पीले पड़ने लगे हैं।

पानी तो देता हूँ, पर पता नहीं कितना जरूरी है! कभी हफ्ता निकल जाता है, और कभी दूसरे दिन भी हो जाता है। न जाने तुम कैसे मैनेज करती हो, इन सैकड़ों पौधों को। और देखते-देखते कुछ तो पेड़ बन कर पल्लवित हो गए हैं। अब उन्हें न मेरी याद आती है और शायद न तुम्हारी! बहुत आत्मनिर्भर जो हो गए हैं !

और सुनो, वाशिंग मशीन में बेडशीट्स और टॉवेल्स किस मोड पर चलानी होती है...समझा देना अगले पत्र में ! मशीन का मैनुअल ढूंढ रहा था, पर मिल ही नहीं। लेकिन यह भी समझ में नहीं आया कि जब हर कपड़े की धुलाई का तरीका अलग है तो मशीन ऑटोमैटिक क्यूँ कहलाती है। कपड़े डालो और धुल जाए !

चलो, बाय, फिलहाल अभी जाना है ! फिर से डॉक्टर को दिखाने की सोच रहा हूँ, अपॉइंटमेंट लिया है. अपना ध्यान रखना !

जयेश

दिसंबर १४, २००१


अनन्या,

तुम ठीक हो न? कोई समाचार नहीं मिला तुम्हारा। देखो मेरे ध्यान के चक्कर में अपनी तबीयत को खराब न कर लेना। सर्दियों में गुनगुना पानी, दिन भर मोज़े पहनना और ज्यादा सर्दी में दो-दो जोड़ी मोज़े पहनने में भी कोई हर्ज़ नहीं। बच्चे तुम्हारे इस तरीके पर हँसते हैं तो हँसते रहें! रजाई में गर्म बाटल तो तुम्हें जो सुकूं देती है वह रूम हीटर या हॉट एयर एयर कंडीशनर से भी नहीं मिलता, यह क्या भला छिपा है मुझसे !

तुम्हारी फोटो फ्रेम में बार-बार पिक्चर बदल लेता हूँ। एक ही पिक्चर से मन नहीं मानता. तरह-तरह के भाव तो अलग-अलग फोटो से व्यक्त हो पाते हैं ? और तुम्हें पता है...यह हुनर तो थोडा बहुत जाना है मैंने...न जाने कितने फोटो हैं जो तुम्हारी जानकारी के बिना लिए हैं. और असलीयत में वही फोटो “एक्सप्रेसिव” बन पाए हैं...बाकी तो औपचारिक हैं...जैसे स्टूडियो में जाकर पासपोर्ट के लिए खिंचवा लिए हों. याद है न ऊटी में लेक के पास, या फिर पुष्कर और फिर फतेहपुर सीकरी के लाल पत्थर की सूनी-सी दुनिया में खो गई थी तुम, तब कितने खूबसूरत क्षण कैद किये मैंने. और वो भरतपुर के घाना पक्षी विहार में मोरों की नृत्य नाटिका देखते हुए तुम्हारे वो लम्हे...सब कितने बेहतर फोटो हैं वह !

जुकाम तो अभी भी है, पर कोई चिंता की बात नहीं. जब भी किसी और को जुकाम या नजले से दुखी देखता हूँ तो हंसी आती है...कि मैं अकेला ही दुखी नहीं हूँ!

जयेश

दिसम्बर २४, २००१

 

प्रिय अनन्या,

सर्दी का मौसम चरम पर है. मैं भी जूझ रहा हूँ...हार नहीं मानूंगा तर्ज़ पर ! ऐसा कहा जाता है कि आज की रात सबसे बड़ी होती है, और कल यानी २५ दिसंबर का दिन सबसे छोटा ! ऐसा लगता है कि सवेरे बिस्तर से निकलने...चाय पीने, धूप की इंतज़ार...फिर स्नान और दिनचर्या… न जाने कितनी जल्दी सूर्य अस्त हो जाता है. सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य का यह कम समय कुछ अलग सी हीन भावना...या अवसाद को उपजाता है, लेकिन पता है कि यह समय चक्र मात्र अस्थायी है.. इसलिए मुस्कुरा कर निकल जाता है समय !

आज रविवार है, आराम का दिन, लेकिन इस दिन जरूर आंखें स्वतः ही समय से और स्व-स्फूर्त सी खुल जाती हैं। सोचा कि आज सीधे स्नान कर तैयार हो जाऊं. ७.४५ हुआ है अब, यूँ तो सर्द मौसम है बहुत, लेकिन अगर ठान लिया है तो कोई भी मंजिल दूर तो नहीं!

आज बहुत दिन बाद मंदिर की सफाई-सज्जा का ध्यान आया है. तुम कभी करने ही नहीं देती मुझे अपने इस काम मे सहयोग. अब आओगे तो कोई धूल नहीं मिलेगी. हां, पूजा-अर्चना भी की आज धूपबत्ती की सुगंध ड्राइंग रूम तक बिखर गई है और एक खुशनुमा सा वातावरण बन गया है.

आज खिड़की की धूल भी साफ की. धूल तो शीशे पर भी है थोड़ी. रुको, कॉलीन से इसे भी साफ कर दूं, तभी चाय पीऊंगा. तब तक तुम भी अपना काम समेट लेना, नहीं तो चिंता होती रहेगी !

जयेश

जनवरी,१८, २००२

 

अनन्या,

बहुत दिन हो गए ना? हां, पूरे तीन हफ्ते! क्या करूं यह समय ही इतनी भागदौड़ का रहता है कि चाह कर भी लिख नहीं पाता. आज सोचा कि गाड़ी में ऑफिस जाते समय जो २०-२२ मिनट होते हैं, और जो अस्त-व्यस्त सी सड़कों पर बिखरी जिंदगी को ऑब्सर्व करने में ही बीतते हैं, क्यूं न उसका भी उपयोग किया जाय.

कल फिर सवेरे ५.५० पर लखनऊ की इंटरसिटी से रिजर्वेशन है. मतलब भोर में ४ बजे उठना जरूरी होगा न, समय से स्टेशन पहुंचने के लिए. हां, अब दो अलार्म लगा कर रखता हूँ… एक ४ बजे का, दूसरा ४.०५ का! याद है न उस बार रिजर्वेशन कन्फर्म था इसी ट्रेन का, पर आंख खुली ६.४० पर! और यूँ तो ट्रेन अकसर डिले होती है, पर देखो तो भला उस दिन यह भी डॉट ऑन टाइम थी.

आज तो लगता है २० मिनट का यह सफर भी समय से पूर्व ही हो जाएगा. रास्ते मे कोई खास ट्रैफिक ही नहीं, अच्छा है समय से पहुंचने पर अच्छी भावनाएं बनी रहती हैं, नहीं तो गिल्ट की फीलिंग होती है.

लो, पहुंच ही गये. अब फिर बाद में !

जयेश

जनवरी २९, २००१

 

अनन्या,

आज कई दिन बाद खिड़की पर बैठकर चाय पी रहा हूँ. वही तरीका, वही तुम्हारे फ़ेवरिट सोने की महीन लाइनिंग वाले उज़्ज़वल-धवल से दो कप हैं. शीशा भी साफ है...इतना कि दूर से कई बार लगता है जैसे केवल फ्रेम हो, ग्लास गायब हो!

सन्नाटा इतना है कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़ी सदृश्य लगती है. इस मौसम में तो बस लगता है कि रजाई में दुबके रहो, जब तक दो बार गर्म चाय न पी लो, और चटख धूप का आगमन खुद महसूस न कर लो, पर, सब मन की कब चलती है भला!

आजकल घर के गैजेट्स सब कुछ न कुछ किस्म की आवाजें निकालने लगे हैं...फ्रिज, वाशिंग मशीन और वाटर फ़िल्टर खास तौर से! अब यह तो तुम्हारा डिपार्टमेंट है, तो मेरा दख़ल होने से रहा. मुझे कोई खास कष्ट भी नहीं इन आवाजों से.

ध्यान रखना...मौसम का यह प्रहर वाकई भयावह-सा महसूस कराता है.

जयेश

फरवरी १, २००१

 

प्रिय अनन्या,

पिक्चर फ्रेम धुंधला-सा दिखता था. साफ करने की कोशिश में टूट कर शीशा बिखर गया. और बिखर गए सब चित्र भी. कांच ही कांच है फर्श पर ! दुःखद है उसका टूट जाना. तुमने चुन-चुन कर संजोये थे सब फोटो...अपनी प्रेमल अनुभूतियों की स्मृतियां. विवाह पूर्व से लेकर कुछ दिन पहले तक के ! अब… क्षण भर में ही, सब बिखरा पड़ा है. समेटने को भी मन नहीं. कैसा है सब... क्षणभंगुर जीवन की तरह!

पर...स्मृतियां कभी मरती हैं क्या ! मरते हम हैं… वस्तुएं नष्ट हो सकती हैं, निर्जीव शरीर की भी नियति यही है. आत्मा, विचार...कर्म, व्यवहार और भाव… यह तो आस-पास ही रहेंगे, शायद अनंतकाल के लिए. जैसे कल की ही बात थी तुम्हारा इस जिंदगी में आना. और तुम रहोगी सदा इस मन में, यह तो निश्चित है.

जल्दी ही आता हूँ मैं भी ! उसी सितारों की दुनिया में… टिमटिमाते सितारों के बीच, कुछ चांदनी मुझे भी तो फैलानी चाहिए न ? और तब तुम अपने साथ, फिर से, मेरा भी ध्यान रखना !

जयेश

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आगरा,

नवम्बर २३, २०१७



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