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@dawriter

लाज़मी है

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मेरी हर बात मे तेरा जिक्र हो ये लाज़मी है
मुझको हर पल तेरी फिक्र हो ये लाज़मी है।
तुझको मेरे हाले दिल का इल्म ना था
मेरे दिल का ये हश्र हो ये लाज़मी है
हम तो मेहमान थे फ़ख्त तेरी महफिल के
तुझे हो खुद पे यूं फख्र ये लाज़मी है
हम तो उड़ते थे आसमां की ऊचाँईयो में
किस्मत मे ये फर्श हो ये लाज़मी है
तुमने गम दिये हमको बेइन्तहा
तेरी खुशियाँ मेरा फर्ज हो ये लाज़मी है
तुने मुझको दी राह नई जीने की
तेरा मुझ पर कोई कर्ज हो ये लाज़मी है
सुना करते थे किस्सा जमाने भर के कभी
आज खुद बन के किस्सा कहीं दर्ज हो ये लाज़मी है।

 



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