62
Share




@dawriter

मोर्चा

1 144       

 

#मोर्चा_संभाल

 

रात के सन्नाटे में कोई ऐसी वजह नहीं थी जो किसी की नींद खोल सके। फिर भी एक माँ की नींद उचट गयी। तीन बजे का वक़्त था। उन्हें घबराहट होने लगी।

“ए जी, उठिए, उठिए न, हमें घबराहट हो रहा है” उन्होंने अपने पति को उठाना चाहा।

आखिर वो कुनमुनाते हुए उठे।

“का है? काहे आधी रात मा सनसना रही हो? सोई जाओ चलो”

“आधी नहीं पौनी रात, तीन से ऊपर हो गया है”

“अरे तो कौन कहा तुमसे टाइम बताने को, सोवो, हमका भी सोए देओ”

“हमे घबराहट हो रहा है, बबुआ का फिकर हो रहा है!”

ये सुन कर बबुआ के बापू भी सीधे होकर बैठ गए। “का बात, कोई बुरा सपना देखीं का?”

“पता नाही, याद नाही, पर जी बहुत उचाट हो रहा है, एक बारी काल कर लें बबुआ को?”

“तुम बौरा गयी हो का? समय देखो, ईस बखत सो रहा होगा न, बेकार का चिंता न किया करो”

पर वो माँ बेकार की चिंता कर चुकी थी। उसकी नींद गायब थी।

 

गया – बिहार से कई सौ किलोमीटर दूर – कश्मीर में –चार लोग बैठे – सुबह के साढ़े तीन बजे – खाना खा रहे थे। उनके चेहरे सपाट थे। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था।

 

आखिर खाना निपटा तो पांचवा बोला – जो खाना नहीं खा रहा था, सिर्फ उनके बैग तैयार कर रहा था। “आप लोगों को एक बार फिर ज़रूरी बातें मैं बताना चाहूँगा। यहाँ से निकलकर आप लोग सीधे सलामाबाद मस्जिद में फ़ज्र की नमाज़ पढ़ेंगे, उसके बाद.....”

“आप फिकर न करें भाईजान, इंशाल्लाह अपने मंसूबे हम हर हाल में कामयाब करेंगे”

“मुझे आपकी फिकर सता रही है” वो पांचवा चिंतित होता हुआ बोला।

“आप यकीन रखें, कामयाबी और शहादत दोनों हमारी होगी”

“अमीन” एक सुर में बाकी चारों बोले।

वहां से ज़रा सी दूर - हेडक्वाटर बेस – उरी जम्मू एंड कश्मीर में –

 

एक सिपाही जाग रहा था। न ही सिर्फ जाग रहा था – बल्कि मोबाइल से उलझा पड़ा था। वजह बहुत मामूली सी थी, उसकी माँ का जी घबरा रहा था, उन्हें अपने बेटे की चिंता हो रही थी। उसने सुबह उठते ही फ़ोन करने का आश्वासन दिया, फिर भी उसकी माँ उसके पिताजी से मेसेज करवाकर उसे समझाने में लगी थी।

 

झक मारकर उसने फ़ोन मिलाया। “हाँ अम्मा.. पायलाग, हम कुसल से हैं, नाही कौनो फिकर का बात नाही है तुम्हें पहले भी कहे, पिताजी को.. अरे... अच्छा पिताजी को फ़ोन दीजिए.. हाँ पिताजी, अम्मा को समझाइए न..... अच्छा तो जब आप नाही समझा सकत हैं तो हम कौन खेत का मूली... हाहाहा.. हांजी, सुबह जल्दी उठना पड़ता है, समझिए। चलिए रखते हैं, हाँ... ठीक..”

उसने फ़ोन तो रख दिया पर नींद उड़ गयी।

उसने घड़ी देखी, सवा चार के आस-पास का वक़्त था जब उसे अज़ान की आवाज़ सुनाई दी।

 

वो कुछ देर जागता रहा, ‘जाने क्यों अम्मा ने आज फ़ोन किया, ऐसा पहले तो कभी नहीं करती थीं’ पंद्रह मिनट बाद उसका एक साथी भी उठ गया।

“ठण्ड बहुत है यार, क्यों जाग रहे हो? क्या बात?”

उसने सारी बात बताई।

“अम्मा कभी ऐसे फ़ोन नहीं किए, पता नहीं का अनिस्ट होना है”

“बेकार की बात न करो यार, हम आर्मी हेडक्वाटर में बैठे हैं न कि एलओसी पर। बेकार की चिंता है”

“तो भाई एल-ओ-सी है ही कितना दूर यहाँ से?”

दोनों के बीच बहस छिड़ गयी।

 

वो चारों मस्जिद से निकलने के बाद जैसे ही वैन में बैठे, वैन हिली भी नहीं। उन्हें हर हाल में पांच बजे हेडक्वाटर पहुँचना था।

गाड़ी का इंजन जम सा गया था, स्टार्ट होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

देखते-देखते दो और जवान जाग गए। बाकायदा दो ग्रुप बन गए, फिर शोर इतना होने लगा कि तकरीबन सब ही जाग गए। बस कुछ अलसाए पड़े रहे!
अब तीन गुट बन गए, एक का कहना था कि यहाँ खतरा उतना ही है जितना बॉर्डर पर, दूसरे का कहना था कि यहाँ खतरा है ही नहीं, आर्मी हेडक्वाटर से ज्यादा महफूज़ जगह कोई नहीं। जबकि तीसरा गुट कहने लगा कि खतरा कहीं भी हो, हम हर जगह के लिए तैयार हैं इसलिए फ़िक्र की कोई बात नहीं!

 

सर्दी बहुत थी इसलिए चाय बनवाई गयी। सूरज अभी तक बादलों के पीछे ही कहीं छुपा हुआ था। भोर होने लगी थी।

कोई पांच उन्नतीस का वक़्त था.....

 

“कुल-मिलाकर जवान, तुम्हारी अम्मा ने हम सबको जगाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है” एक अफ़सर ने मज़ाकिया लहजे में उसे छेड़ा

तभी पहला धमाका हुआ।

पता चला किन्हीं मिलिटेंटस् ने हमला कर दिया है।

चाय फेंक कर जवान बाहर की तरफ निकले।

“जवान मोर्चा संभाल, हेडक्वाटर पर हमला हुआ है” कोई जोर से चिल्लाया।

बबुआ अपनी गन लिए मोर्चे पर पहुंचा कि एक और धमाका हुआ।

 

गोलियों की बौछार मिलिटेंट की तरफ कर दी गयी कि तभी एक साथ दो धमाके हुए। एक उसी टेंट में जिसमें से बबुआ अभी निकला था। टेंट में अब भी काफी लोग मौजूद थे। वो वापस टेंट की तरफ लपका। टेंट जलने लगा।

फिर दो धमाके और हुए। कई तरफ से जवानों के चीखने की आवाज़े आईं।

मिलिटेंटस् ने “आज़ाद कश्मीर” के नारे लगाए।

धमाके फिर हुए। इस बार पांच बम चार-चार सेकंड की देरी से गिरे। कई टेंट धू-धू कर जलने लगे।

बबुआ अपने टेंट में से घायल जवानों को बाहर निकलने में मदद करने लगा।

फिर एक सीरीज में धामके हुए।

कोई तीन मिनट के अंदर-अंदर सतरह ग्रेनेड फेंके गए।

“जवान मोर्चा संभाल” अफसर चिल्लाया.

जवानों ने मोर्चा संभाला!

 

बबुआ की अम्मा का रोते-रोते हाल बुरा हुआ था। वह न्यूज़ में हमले की खबर देखती जा रहीं थी। पर उसके पिताजी सपाट चेहरा लिए न्यूज़ देख रहे थे।

तभी दोपहर के वक़्त न्यूज़ फ़्लैश हुई।

 

छः घंटे तक गोलियां चलती रहीं। आखिर वो चारों मिलिटेंट मारे गए।
उनके पास से तार काटने का प्लास, चार ए-के-47 रायफल और चार अंडरबैरल ग्रेनेड लांचर और भी बरामद हुए।

 

जायज़ा लेने पर पता चला कि अगर टेंट में सोये जवान जाग न गए होते तो कोई सतरह से बीस जवान शहीद हो गए होते। अभी पहली नज़र में पता चला है कि को सैंतालिस जवान घायल हैं, एक जवान गंभीर रूप से घायल है, मालूम हुआ है कि इसी जवान ने कई जवानों को जलते टेंट से बाहर सुरक्षित निकलने में मदद की। इस जवान की हालत नाज़ुक है, फिलहाल इनको एयरलिफ्ट कर अस्पताल ले जाया गया है। भारतीय सेना के जवान सारे विश्व के लिए एक मिसाल हैं। हम इन सब घायलों के जल्द स्वस्थ होने की अथवा उस जवान के ख़तरे से बाहर निकलने की प्रार्थना करते हैं!

अब बबुआ के पिताजी की आँखें भी नम हो गयीं। पर दुःख या डर से नहीं, बल्कि गर्व से!

 

#सहर
#काश_के_यूँ_होता



Vote Add to library

COMMENT