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@dawriter

मेरे कंधे से ऊपर भी मैं हूँ!

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मेरे कन्धे से ऊपर भी मैं ही हूँ,
पर तुम देखते ही नहीं,

जब तुम सड़क पे गुजरते हुवे,
अपने दोस्त को कुहनियां कर मेरी तरफ इशारा करते हो,
तब तुम भूल जाते हो कि मेरे पास भी ऑंखें हैं,
जिन्हें भान होता है, तुम्हारी नजरों का,
ये आँखे जो समझती चलती हैं, दुनिया की तस्वीरों को,
जब तुम कहते हो अपने अंतरतम की गहराइयों में,
"माल अच्छा है"
तुम देख नहीं पाते, मंजिलों की खोज में निकली,
अनन्त संभावनाओं को,
तुम्हे दीखते हैं बस आसपास घुमते हुवे मांस के लोथड़े,
क्योंकि तुमने कभी कंधे से ऊपर देखा ही नहीं,
मेरे कंधे से ऊपर भी मैं ही हूँ,
पर तुम देखते ही नहीं,
...
तुम आते हो मेरे पास, चाचाओं और फ़ूफ़ाओं की शक्लों में,
और फिर देखकर कंधे के नीचे
कहते हो,"लड़की अब बड़ी हो गयी है",
इस पर बंदिशें लगाओ!
कंधे से ऊपर जो देखते... तो देखते मेरी आँखों को,
कितने सपने मैंने बुने हैं, 'कल' के लिए...
कभी सुनते तो सुनते मेरी चहकती घुंघराली आवाज को,
बहुत परिपक़्व तो नहीं, पर कहने के लिए कुछ है,
तब तुम फतवे ना जारी करते...
पढ़ते मेरा दिमाग, जो बिखरे बिंदुओं को जोड़कर राह बनाने लगा है,
ये चुनना चाहता है अरमानो के पंख लगाकर उड़ने की आजादी,
जब मैं सोचना और तर्क करना चाहती हूँ
और पूछना, सवाल करना चाहती हूँ,
तब तुम डपट देते हो कहकर, "नारी तुम केवल श्रद्धा हो"
और छीन लेते हो मुझसे चुनने का अधिकार,
दब जाऊँ मैं, अपनी ही महानता के बोझ से...
ये आजादी 'घर की वस्तु' छोड़ 'बाहर की वस्तु' बनने की नहीं है,
जो परोसता है बाजार,
बेढ़बता और फूहड़ता को आधुनिकता के लबादे में,
वो आजादी जो मुझे मेरे अलग अलग पुर्जो में बाँट देती है,
जो बताती है की मैं कितनी खूबसूरत हूँ, मेरे अंडरआर्म्स पर निर्भर करता है,
मैं इतनी आजाद भी नहीं होना चाहती की तुम छिड़को "डिओ"
और मैं उड़ती हुई गिरूँ तुम्हारे ऊपर,
चीज़ें इतनी आसान तो कभी ना थीं!
कभी बातें करते मुझसे ढेर सारी,
प्यार और सेक्स की बातों के अलावा,
तुम चौंकते ये जानकर, की मुझे भी 'दुनियादारी' आती है,
तब तुम टालते ना मुझे कहकर, "लड़की का मैटर"
पर अफ़सोस,
तुमने मुझे कभी कंधे से ऊपर देखा ही नहीं,
मेरे कंधे से ऊपर भी मैं ही हूँ,
पर तुम देखते ही नहीं....



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