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@dawriter

मूक दर्शक

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भीड़ थी घेरे खड़ी थी
वहां शायद कोई अनुपम दृश्य हो
कौतूहल वश पहुंचा वहाँ
देखने खड़ा हो गया मैं
एक हाथ से भीड़ को छांट
आगे बढ़ता गया मैं
सचमुच एक अनुपम दृश्य ही तो था
कोई रो कोई तड़प रहा था
कर रहा था कोई मदद की गुहार
पर भीड़ कतई छटती नहीं थी
बस देखती बातें करती थी
कितना मज़ा था किसी की तड़प में
मैं भी कम बेशर्म नहीं था
मैं भी तो भीड़ का हिस्सा ही था
आजकल नींद नहीं आती है
बेचैनी बहुत तड़पाती है
डर लगता है ये सोच कर
बन गया गर मैं भी वो अनुपम दृश्य
क्या पता मेरा भी हो कुछ हश्र ऐसा
ये ली कसम न बनूँगा मूक दर्शक अब
स्नेहिल सेवा करूँगा अब
उसके घर भी तो जाना है
ईश्वर को मुँह दिखाना है
परोपकार परम धर्म
जीवन प्रयन्त यही कर्म



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