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@dawriter

मुसाफ़िर

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Shreya Dubey by  
Shreya Dubey

 

 

मैं तो वो मुसफिर हूँ जिसकी तक़दीर ही उसकी राह है
आज सवेरा यहां हुआ
और कल के सूरज का कोई ठिकाना नहीं थकते नहीं कभी चलने से
कदम मेरे रुकते नहीं हौसले साथ हैं तो
सर कभी झुकते नहीं हाँ माना मैने ये बात
की दुनिया बहुत बड़ी है
पर इंसानियत इतनी भी छोटी नहीं की इस राहगीर को
दो वक्त की रोटी न दे सके
देंगे दस्तक कल
किसी अजनबी के दरवाजे पर
अजनबी समझ कर
शायद कोई अपना ही
मिल जाये हमे किसी राह पर
अपनाने को आज भी हैं हमे कई तैयार,
पर हम हैं किसी
और ही मंज़िल की तलाश में वो जगह भी होगी ही कहीं जहां सब होंगे एक जैसे
और मुसाफिरों की भीड़ में खोए होंगे कई हम जैसे
न सोएगा वहाँ कोई भूखा
न होगी किसी की मौत ठंड से
न जलेंगे किसी के पाव इस कड़कती धूप में न होंगे वहां कोई चोर ओर गरीब
मुसाफिर हूँ मैं यारों कल कहीं और चल जाऊंगा
अकेला चला था
अकेला ही रह जाऊंगा
पर याद रखेंगे सब मुझको
क्योंकि दिल में सबके बस जाऊंगा।

 

Picture Credit: Akash Verma



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