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@dawriter

मन की सैर

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भावी जीवन की आस में,क्यों धूमिल हो हमारा आज।

मैं पैरों में घुंघरू बांधू,तुम छेड़ो ना कोई साज।

कितने दिनों में मिली है,फुर्सत.. जीवन की आपाधापी से।

तुम भी जी लो,मैं भी जी लूं..कुछ लम्हें चुराकर ले आए।

तुम दूर क्षितिज पर खड़े रहो,,मैं धानी चुनर ओढ़कर आऊं..

फिर वहीं बनाए..एक शामियाना.. हम दोनों वहां पर बतियाएं।

हम सब से यूं ओझल हो..कि कोई हमें न ढूंढ पाए।

सूरज की किरणों को छान छान,,मैं थोड़ा तुझपर आने दूं।

इस हवा को बोलों धीरे चले,मैं अपना ऑचल लहराने दूं।

फिर रातों को जब चंद्रमा निकले,,तुम चांदनी भरकर ले आना।

जितनी भी शीतलता होगी,, उससे मन को तुम नहलाना..

एक दूजे के दिल को झंकृत करते है, जो तेरे मेरे मन के तार..

बज उठता जीवन संगीत,, बाधाओं की होती हार..

आओं चले,,कहीं दूर एक उपवन में,,मधुगंधों को चुरा लाते है।

ऐसी ही कुछ मधुगंधों को,मन में अपने भर लेते है,,जीवन सुवासित कर लेते है।

जाकर के निर्झर के नीचे,,अपनी दुश्चितांए बहा आए..

लेकर के वृक्षों की छाव,,थोड़ा फिर हम सुस्ताएं।

आओं चलों ना स्वांग करे,हम कोई चंद्र चकोरी जैसे।

बना रहे चिरकालिक जोड़ा,हो कोई हंस हंसिनी जैसे।

खुद को खोकर क्यूं डाले हम सुखद भविष्य की नींव।

पहले खुद को पहचाने,,फिर होंगी संभावनाएं सजीव।

तुम्हारे संग तो मेरे साथी,हर पल है मधुमास।

मेरे रोम रोम से,निकले अब प्रेम की उच्छ्वास

कविता नागर😊😊



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