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@dawriter

बुंदाबांदी

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emotionseeker by  
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एक छोटी सी बूंद वो बादलों से ताकती है
बादलों के झुरमुट से वो हमको निहारती है
आना चाहती है वो भी दूर देश के आंगन
देखना चाहती है वो धरती के सावन
पर आज नहीं ये सूरज ने कह डाला है
अभी मुझे धरती को और भी तपाना है
सूरज और बादलों को वो अक्सर देखती खेलते आँख-मिचौली है
पर बनना चाहती वो तो धरती की सहेली है
उमड़-घुमड़ के धरती के आंगन में वो करना चाहे रासलीला
हो रहा है उसका मन बरसने को रंगीला
तरस जाती है.... होती बैचेन वो धरती से मिलने को
जब देखते हैं वो सूखे-बंजर उसके नैन
बस और नहीं! बस और नहीं!
आज उसने कह डाला है
तोड़ बादलों का पहरा उसने पैर पसारा है
दमक पड़ी उसकी काया
बरस पड़े उसके नैन
मिली गले काया से काया
हुआ तृप्त दोनों का प्रेम
झूम-झूम कर मोर-डालियां करती उसका स्वागत हैं
मेरे मन में भी आज भीगने कि बड़ी चाहत है
काश! बना रहे ये प्रेम धरती और बूंद का
आता रहे सावन हर बरस यूंही झूमता

 



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