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@dawriter

बस यूं ही

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पूर्णिमा के चांद जैसा रूप उसका खिल गया,
अमावस की रात मे भी सब था मुझको मिल गया,
चांद की शीतलता उसके रुप मे जो समाई थी,
लग रहा था चांद जैसे उसकी ही परछाईं थी,
देखा दर्पण, जो उसका अर्पण खुद से वो शरमा गया,
देख उसका रुप सावन को भी पसीना आ गया,

:-
चन्द्र प्रताप सिंह



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