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@dawriter

बने ना तुमसे रोटी गोल..

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नया युग है,नवीन विचारों की बयार है..अधिकांश लोगों में परिवर्तन आया है।परिवर्तन आवश्यक भी है।बहुत से लोग अपने भावों और विचारों से आधुनिकता दिखलाते है,और इसे अमल भी करते है।कुछ लोग बस कपडों से आधुनिक हुए है,विचार वहीं के वहीं है।कुछ लोग सामाजिक स्तर पर तो आधुनिक हो जाते है,पर घर में वही ढाक के तीन पात.

अक्सर लड़कियों को ताना मारा जाता है,रोटी बनाना सीख लो,काम आएगी..पर वर्तमान परिवेश में क्या ये लड़कों के लिए आवश्यक नहीं है। सारी शिक्षाएं लड़के और लड़की दोनों के लिए अनिवार्य है।वैसे कुछ लोगों को देखा है..लड़की कितनी ही आगे निकल जाए.. अगर खाना बनाना नहीं आता तो यही कहते है..कि गोल रोटी ना सीखी तो क्या सीखा।कितने ही कीर्तिमान कर ले,रेल,वायुयान चला ले।पर नहीं।वैसे देखा जाए तो लेखिकाओं की भी यही दशा है,क्या कर लेंगी लिखकर।कोई कितना ही अच्छा कर ले..कुछ लोगों की आदत होती है..खींचतान करना। खासकर लड़कियों को परेशान करना।

  कभी कभी कितनी ही चेष्टा कर ले स्त्रियाँ, पर जिनसे प्रशंसा सुनना चाहती है,उनसे ही कभी तारीफ नहीं मिली। बेचारी को बस किचन में ही उलझाने की कोशिशें की जाती है और नौकरी भी इसलिए कि घर में चार पैसे आते है।जिस खाने की दुनियां तारीफ करती है,उसमें भी कमियां निकाल दी जाती है..क्या किया जाए।

एक कविता लिखी है..ऐसी मानसिकता वाले लोगों पर,जो कि नीचे प्रस्तुत है..

बने ना तुमसे रोटी गोल..और बाहर जाकर पीटो ढोल..

शब्दों से दिखलाती,दर्पण.. किस किस की तुम खोलों पोल..

करतल बजती,,वाह वाही होती..

ऐसा क्या करती हो झोल..

बने ना तुमसे रोटी गोल..और बाहर जाकर पीटो ढोल..

एक अकेली नार हो,पर मर्द बिना बेकार हो तुम..

किस किस का विरोध करोगी,,जो बड़े बड़े से बोलो 'बोल'..

बने ना तुमसे रोटी गोल....

और बाहर जाकर पीटो ढोल।

आज चलाती..रेलगाड़ी और वायुयान हो तुम..

सीमा पर लड़ने भी जाती..और ओलंपिक में मेडल लाती..

पर मुझे तो ना जरा भी भाती,,क्यूँ

अरे..पर बने ना तुमसे रोटी गोल..

और बाहर जाकर पीटो ढोल..

कलम से,क्या क्या लिख जाती..

हाय क्यूँ ना तुमको लज्जा आती।

पुरुषोचित बातें करती हो..बड़ी सुधारक का दंभ भरती हो..

हमें तो उन पर दया है..आती

जिन लोगों को तुम हो भाती...क्यूँ

पर..बने ना तुमसे रोटी गोल..

और बाहर जाकर पीटो ढोल।

  © कविता नागर..



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