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@dawriter

बच्चों का बचपन जी लें...

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आज सुबह से ही मधु को बच्चों की बहुत याद आ रही थी। रमेश ऑफिस के लिए निकल चुके थे। मम्मी जी नाश्ता करके आराम कर रही है और पापा जी अपने मैग्ज़ीन आदि में व्यस्त हैं। इसी साल बेटी चारु मेडिकल की कोचिंग के लिए कोटा चली गयी थी और बेटा वासु पिछले तीन साल से अहमदाबाद में आर्किटेक्चर की पढ़ाई कर रहा है। घर में एक मौन सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा अब सीधे एक बजे थोड़ा सा टूटेगा जब पापा जी के खाने का टाइम होगा।

मधु अपने रूम से निकल बच्चों के कमरे में आ गयी। उसकी आँखों के आगे अतीत छाने लगा...22 साल की उम्र में मधु रमेश के साथ शादी के पवित्र बंधन में बंध बनारस के अपने इस नए घर में आई थी। घर में दादी सास, दादा ससुर, सासु माँ, ससुर जी, छोटे देवर, ननद और पति का साथ। नए सपने,नया उल्लास, नई खुशियों से मन उमड़ रहा था मगर रसोई की रस्म के बाद जल्द ही सारी दिनचर्या चाय की गर्म प्याली और गर्म रोटी की तैयारी में बंध सी गयी।

दादी की कथा पूजा, मम्मी जी का अचार पापड़ दादा ससुर और पापा जी का परहेजी भोजन, रमेश की छोटी बड़ी प्रत्येक जरूरत और छोटे देवर ननद की लाड़ भरी फरमाइशों में वो पूरा दिन बंधी रहती।

साल बीतते-बीतते नन्हा वासु गोद में था। सवा महीने के आराम के बाद मधु फिर काम के पीछे दौड़ने लगी। इस बार वह दौड़ नहीं भाग रही थी क्योंकि नन्हे वासु के काम भी होते थे।

कई बार मम्मी जी की गोद में खेलता देख उसका भी मन होता कि वह भी थोड़ी देर दुलारे मगर फिर किसी के काम के लिए उसे जाना पड़ता। रात को जब वह खाली होती तब नन्हा वासु सो रहा होता। दिन भर सासु माँ के साथ होने के वज़ह वो रात में भी उन्ही को ढूंढता। उस वक्त मधु की ममता पिघलने लगती।

कई बार जबरदस्ती रोते वासु को काम की जल्दी में किसी के साथ घूमने भेज देती और उसके लगा तार चीखने की आवाज़ को पत्थर बन कर दबा जल्दी-जल्दी बचा काम निपटाने लगती।

दूध का ग्लास ले जब वो 5 मिनट भी तीन साल के वासु के पीछे घूम लेती उसे फिर से काम की चिंता होने लगती एक ग्लास की जगह एक कप दूध ही पिला उसका मुँह साफ़ कर किचन में भाग जाती उसका पेट पूरी तरह भरा या नहीं यह भी सोचने की फुरसत नहीं थी।

सासु माँ की हर काम जल्दी खत्म हो जाए इस सोच से वह भी मशीन हो चुकी थी।

समय को पंख लग गए थे। वासू के चार साल होते-होते चारु आ गई और फिर तो वासु को स्कूल के लिए तैयार करना और उसी वक़्त चारु का उठ जाना , मम्मी जी का पूजा मे व्यस्त होना और रमेश का बिलकुल सहयोग न देना दौड़ते भागते मधु का दिल बैठने लगता।।

घर में जब देवर और ननद की सगाई और शादी की रस्मे हुई उस वक़्त तो मधु बच्चो को देख भी नहीं पाती। बच्चे अक्सर रात में रिश्तेदारो के घर चले जाते, बुलाने पर भी नहीं आते, मजबूरन उसे उनके कपड़े, हॉर्लिक्स आदि वही भिजवाने पड़ते। इस बीच दादी सास और दादा ससुर का निधन हो चुका था।

अब बच्चे टीनएज के हो चुके थे उनके पढ़ाई पर मधु कम ही ध्यान दे पाती। घर पे ट्यूटर रख दिया था। बच्चो को जब प्रोजेक्ट वर्क मिलता था किसी तरह थोड़ा बहुत ही हेल्प कर पाती। आज बच्चों का यह कमरा उसके बच्चों के हर पल की याद को सजोये हुए है। आज यहाँ उसकी नन्ही चारु का किचन सेट पूरी तरह व्यवस्तित रखा हुआ है। नन्हे वासु का डॉक्टर सेट भी अपनी जगह पर है। बार्बी डॉल खामोश है मधु इन पर थोड़ी भी धूल नहीं जमने देती। मधु को याद आता की जब दोनो अपने रूम में खिलौने फैलते वो उन पर कुछ ज्यादा ही चिल्ला देती बाद में अफ़सोस करके भी कोई फायदा नहीं क्योंकि जब वह रात में उन्हें दुलारती वे सो चुके होते।

मधु बच्चों के खिलौने में ऐसी खो गयी कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। मम्मी जी की आवाज़ से उसे होश आया की पापा जी के खाने का टाइम हो चुका है। आज भी मधु न कह सकी की मुझे थोड़ी देर बच्चों की भावनाओं में बहने दो। कमरा धीरे से बंद कर मधु किचन की ओर चल दी आँखों के आँसूं आज नहीं रुक रहे थे।

अपने बच्चों का बचपन जरूर जिए..

आज बस इतना ही।।।

आपके अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में...

रागिनी श्रीवास्तव



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