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@dawriter

पिंजरे का पंछी

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पानी में अपने अक्स को तस्वीर समझ बैठा
नादान परिदां पिंजरे को तकदीर समझ बैठा।
जब भूख लगती वो चिल्लाता
तुरंत उसको खाना मिल जाता।
मासूम पंछी इसको अपने हुक्म की तामीर समझ बैठा।
देखता वो और परिदों को भटकते दर ब दर
दया आती उसको उनकी इस हालात पर
सोचता मेरी जैसी तकदीर इनकी कहाँ है
ये सोने का पिंजरा मेरा आलीशान जहाँ है।
अपनी कैद को वो अपनी जागीर समझ बैठा।
हम भी तो फंसे हुए है ऐसे ही भ्रम जाल में।
कैद कर बैठे है खुद को इच्छाओं के जंजाल में।
हम को जो चाहिये वो चाहिये हर हाल मे।
कैसा है इंसान जो सूई को तलवार समझ बैठा।
अपनी जिंदगी को खुद ही हम कैद बना बैठे
चकाचौंध जो है दिखावा उसे ही लक्ष्य बना बैठे।
जो है संकुचित जलधार ,इंसान उसे मझधार समझ बैठा।
अपनी दबी इच्छाओ को जग जाहीर कर बैठा
नादान परिदां पिंजरे को तकदीर समझ बैठा।



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