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@dawriter

पिंजरा

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"एक पिंजरा और खोल दो" ये कहते-कहते अनवर मियां मुस्कुराए। जामा मस्जिद के बाहर बैठे बहेलिए ने भी मुस्कुराते हुए पिंजरा खोल दिया।

दो और पंछी आज़ाद हो गए।

अनवर मियां तकरीबन हर पीर के दिन कुछ एक पंछी खरीदने आते थे। और खरीदने के बाद उन्हें आज़ाद कर देते थे। कहते थे इससे सबाब मिलता है। अनवर कोई पचास के लपेटे में थे लेकिन कद काठी मजबूत और जवानों जैसी थी।
बहेलिया मुश्ताक उन्हें देखकर बहुत खुश होता था।
'कितना आज़ाद-ख़याल आदमी है, वाह'

"मियां आप क्यों अपना रुपया ज़ाया करते हो? इन पंछियों को फिर कोई बहेलिया पकड़ लेता होगा।"

"देखो मुश्ताक, तुम अभी बहुत छोटे हो, ये बातें नहीं समझ सकोगे। बस यूँ समझो अल्लाह ने मुझे मौका दिया इन्हें आज़ाद करवाने का, आगे वो जाने, उसकी कुदरत जाने"

तभी अनवर का फ़ोन बजा, वो कुछ देर ऑंखें सिकोड़ कर स्क्रीन पर झलकता नाम देखता रहा फिर उठाते ही चिल्लाया "कितनी दफ़े समझाया है कि जब बाज़ार में होऊ तब कॉल न किया कर, खैर बोल, क्या काम है?"

कुछ देर सुनते रहने के बाद फिर चिल्लाया "तुझे पहले भी मना किया है, तू फिर शुरू हो गयी। रमज़ानों में अभी वक़्त है...."

"नहीं....."

"नहीं कहा न एक बार...."

फ़ोन कट गया।

मुश्ताक़ उत्सुक हुआ उसकी तरफ देख रहा था।

"ऐसे क्या देख रहा है मुश्ताक़, घरवाली का फ़ोन था। कहती है अब्बू की याद आ रही है, इरम भी नानी को याद कर रही है.... मैंने हड़का दिया। अरे जब बात तय हो गयी है कि रमज़ान में चले जइयो तब बहस क्यों?"

"पर मियां याद आ रही है तो जाने...."

"अरे तू चुप कर, तुझे अभी अंदाज़ा नहीं शादीशुदा ज़िन्दगी का, याद रखियो, जुरुवा को ज़्यादा मायके नहीं भेजते, पर निकलने लगते है। एक तो अल्लाह के करम से पाँचों लड़कियां हैं मेरी, एक भी लड़का न दे सकी, पांचों मेरे सुसराल में हुई, इरम तो अभी तीन साल की सारी है और देखो उसकी माँ ने कैसे सिखा दिया उसे भी कि कहो नानी की याद आ रही है। मैं क्या समझता नहीं।"

मुश्ताक़ मंत्रमुग्ध हुआ सारी बात सुन सिर हिलाने लगा।

इतने में एक और ग्राहक आया और बोला "ये तोते का जोड़ा कै पैसे में दोगे?"

मुश्ताक़ बोला "किस वास्ते चाहिए? आज़ाद करना है या पालना है?"

"मुझे आंगन में रखना है ताकि कोई आहट हो तो ये आगाह कर दें, और पिंजरा न देना, मैं पर कुतर दूंगा और दिये के मोखे पर बिठा दूंगा"


ये सब सुनकर अनवर को एक अजीब सा दर्द हुआ। उसके मुंह से निकला 'अल्लाह, कैसे-कैसे ज़ालिम हैं तेरी दुनिया में'

 #सहर



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