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@dawriter

पतझड़ बीत गया

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sunilakash by  
sunilakash

 

 

उसके जीवन में पतझड़ जैसे आकर ठहर गया...और विनय के उसे छोड़ जाने के बाद से आज तक, जैसे उसके जीवन फिर कभी बहार नहीं आई । फिर भी चीनू उसके साथ है ...और वह  हमेशा अपने पापा को याद करती रहती है।

 

विनय के बारे में पूछती रहती है, अतः चाहे-अनचाहे वह भी विनय को भूल नहीं पा रही है, जबकि विनय ने तो उसे कहा था, "मुझे भूल जाना शालू।"शालू ने भी कह दिया था, "जब तुमने तलाक ले ही लिया है तो अब किस प्रकार तुम्हें याद रखूंगी। यह अध्याय तो अब खत्म होना ही है विनय।"

 

विनय चला गया। अमेरिका में जाकर बस गया। अगले वर्ष यह खबर भी आ गई कि उसने वहां किसी से शादी भी कर ली। भारत में रह रहे विनय के मित्रों में से कभी न कभी कोई मिल जाता है तो इस प्रकार की खबरें उसे भी मिल जाती हैं। मगर चीनू?चीनू को शालू कैसे समझाए? बच्चे तो फूलों की तरह मासूम होते हैं, उन्हें कोई तलाक का मतलब कैसे समझाए? शालू भी नही समझा पाई। नही कह पाई कि तुम्हारे पापा अब तुमसे मिलने नहीं आ पाएंगे क्योंकि उनका तुम्हारी मम्मी से तलाक हो गया है। अब वे अमेरिका में जाकर बस गये हैं, शायद सदा-सर्वदा के लिए। इसलिए वह पूछती रहती है, "मेरे पापा कब आएंगे मम्मी? मम्मी, हम पाप के पास कब चलेंगे?"शालू क्या कहे ? कुछ सूझता नही है उत्तर। जो जी में आए कह देती है---"वे नाराज़ हैं क्योंकि तुम शरारत बहुत करती हो।" कभी चीनू बहुत ज़िद करती तो वहः कह देती है--"तुम्हारे पापा जल्दी आएँगे---जब पेड़ों से पत्ते झड़ेंगे---जब वृक्षों पर नई कोंपलें आएंगी---जब मुरझाए फूलों के पौधों पर फिर फूल खिलेंगे---जब बसन्त बहार आएगी।"पहले चीनू बसन्त का अर्थ नही समझती थी, बहल जाया करती थी।

 

मगर अब वह बड़ी हो रही है। छः वर्ष की हो रही है। पिछले वर्ष बसन्त के सीजन में वह रोज़ पूछती रही थी--"मम्मी नए फूल भी खिल गये हैं। वृक्षों पर मौल भी आ रहा है। फूलों की खुशबू से चारों ओर की हवा भी महक रही है। मेरे पापा कब आएंगे?"चीनू कई  दिन तक रोती-सुबकती रही थी। याद करके शालू की ऑंखें भर-भर आती हैं। चीनू का ख्याल करके उसने एक दिन विनय के किसी दोस्त से कहलवा भी दिया था---चीनू को कैसे समझाऊं? वह अपने पापा को बहुत याद करती है।

 

कभी विनय भारत आए तो एक दिन अपनी बेटी से मिल जाए।मगर फिर एक अरसा बीत गया। फिर शरद ऋतु बीत गई है। फिर बसन्त आने को है और फिर चीनू दिन गिनने लगी है कि बसन्त आने वाला है और उसके पापा इस बार जरूर आएँगे।

 

कल से चीनू ड्राइंग बना रही है। आर्ट पेपर पर अपने पापा का अपनी कल्पना से ही एक चित्र बना रही है। कहती है अपने पापा को भेंट करेगी। मगर एक अधूरा-सा चित्र है। बार-बार वह शालू से पूछती है,"मम्मी पापा का नाक कैसे बनाऊं? उनकी मूंछें हैं या नहीं?"शालू उसे चित्र बनाते देख रही है। जो भी चीनू उससे पूछती है उसे बता रही है।

 

खिड़की के रास्ते फूलों की महक रह-रहकर अंदर आ रही है। बसन्त बहार तो आ गई है। मगर उन दोनों माँ-बेटियों की बसन्त बहार कहीं ठहर गई है। शालू यह सोच ही रही थी कि उसका फोन बज उठा। उसने हाथ बढ़ाकर फोन उठाया। विनय का फोन था। वह एक बार तो झिझकी मगर अगले पल ही चीनू का ख्याल आते ही वह जी कड़ा करके बात करने लगी। फोन पर बात करते-करते उसके चेहरे का रंग पल-पल बदल रहा था।

 

यकायक वह ख़ुशी से चीख पड़ी,"तुम भारत में हो और कल हमसे मिलने आ रहे हो?" यह बोलते हुए उसने फोन एकदम चीनू के कान से लगा दिया और बोली,"तुम्हारे पापा बोल रहे हैं चीनू। बात करो अपने पापा से।"चीनू अपने पापा से बातें कर रही थी और शालू सोच रही थी उन बातों के बारे में जो शालू और विनय के बीच अभी हुई थीं। विनय ने उधर से बताया था कि वह अमेरिका की नागरिकता छोड़कर, वहां की नौकरी छोड़कर उनके पास रहने के लिए आ रहा है...हमेशा-हमेशा के लिए।

 

शालू ने दौड़कर चीनू को गोद में उठा लिया और बेतहाशा उसे चूमने लगी---"कल तेरे पापा आ रहे हैं चीनू। हमारा बसन्त आ गया है। हमारी बहार आ गई है। और हमारा पतझड़ बीत गया।" (समाप्त)  


सुनील आकाश।



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