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@dawriter

निराशा

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बात कई साल पुरानी है, मगर मेरे ज़हन में अभी तक ताज़ा है। उन दिनों मैं इंटर्नशिप कर रहा था। हमारे सीनियर ओ. पी. डी. हमारे हवाले कर अपनी सुविधानुसार अपने काम निपटाने के लिए निकल जाते थे। एक दिन मैं ओ. पी. डी. में अकेला था और एक के बाद एक मरीज़ देख रहा था। तभी एक बहुत ही बुज़ुर्ग दंपत्ति, जिनकी उम्र क़रीब नब्बे साल से ऊपर ही होगी, ओ.पी.डी. में दाखिल हुए। दोनों ही बहुत मुश्किल से चल पा रहे थे। मैंने उन्हें बैठने का इशारा किया। वो दोनों कांपते-कांपते से दो स्टूलों पर आकर बैठ गए। इतने बूढ़े व्यक्तियों के साथ कोई रिश्तेदार तो होगा ही, ऐसा सोचकर मैंने उनसे पूछा, “आपके साथ कौन है बुलाइए”

वो ठीक से सुन नहीं पा रहे थे। उन्होंने इशारे से बताया कि वो दोनों ही कानों से सुन नहीं सकते और फिर मुझे ज़ोर से बोलने का इशारा किया।

मैंने ज़ोर से बोला कि आपके साथ कोई तो आया होगा उसे बुलाइए।

इस बार उनको कुछ-कुछ समझ में आ गया था जो मैंने कहा था। उन्होंने फिर हाथ के इशारे से ही मुझे बता दिया कि उनके साथ कोई नहीं आया है।

अब मैं आश्चर्य में था कि इतने बूढ़े व्यक्तियों के साथ कोई नहीं, न घर का, न पास-पड़ोस का कोई भी व्यक्ति नहीं आया है! इनकी तकलीफ़ के बारे में कौन बतायेगा? मेरी दूसरी मुश्किल थी कि अब इनके रोग के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए मुझे हर बार ज़ोर से बोलना पड़ेगा। और मैंने अपने आपको हर बार ज़ोर से बोलने के लिए तैयार कर लिया।

मैंने पूछना शुरू किया, “कहिये दादा क्या तकलीफ़ है?”

बूढ़े बाबा ने अपनी पत्नी ओर इशारा किया और बताया कि उसे और उसकी पत्नी दोनों को काफ़ी कम सुनाई देता है।

मैंने उन दोनों के कानों की जांच की परन्तु मुझे उनके कान साफ़ नज़र आये, कहीं कोई मैल इत्यादि नहीं था। अधिक उम्र होने के कारण उनका तंत्रिका तंत्र काफ़ी कमज़ोर हो गया था जिसके कारण दोनों को ही कम सुनाई देने लगा था। बुढ़ापे की वज़ह से होने वाले ऐसे रोगों का किसी भी दवाई से इलाज़ नहीं हो सकता इसलिए मैंने उनसे पूछा कि, “आपको आख़िर ऐसी क्या आवश्यकता है कि इस अवस्था में कानों से ठीक सुनाई दे?”

वृद्धा चुपचाप बैठी थी। थोड़ी देर बाद जब वृद्ध को मेरी बात समझ में आई तो उसने कहा, “मैं जब बोलता हूँ तो इसको सुनाई नहीं देता और जब ये बोलती है तो मुझे सुने नहीं देता।”

मैंने फिर से पूछा, “आख़िर इस उम्र में बात-चीत की क्या आवश्यकता है?”

वृद्ध के चेहरे पर मज़बूरी के भाव थे। मेरी ज़ोर से कही गयी बातों को वह समझ लेता था। उसने कहा, “डॉक्टर साहब, बिना सुने हम एक दूसरे से बात नहीं कर सकते। मौत पता नहीं कब आएगी और जब तक न आये, समय तो काटना ही है। बिना बात-चीत के हमारा समय नहीं कटता और कुछ तो हम कर नहीं सकते।”

उसकी बात सुनकर मैं थोड़ा हैरान हुआ कि आख़िर ये बात मेरे दिमाग़ में क्यों नहीं आई कि सुनने और बातचीत करने की आवश्यकता तो सबको रहती है और इस उम्र में जब व्यक्ति असहाय हो जाता है और कोई दूसरा काम नहीं कर सकता, तब बातचीत की ज़रुरत सबसे अधिक है जिसके लिए कानों से ठीक सुनाई देना बहुत ज़रूरी है। अब इस वृद्ध दंपत्ति की सहायता कैसे की जाए जिससे इनको कुछ ठीक सुनाई देने लगे, मैं सोचने लगा।

मैंने फिर ज़ोर से कहा, “बाबा, आप दोनों की कानों की नसें बहुत कमज़ोर हो गयी हैं, दवाई से कोई लाभ नहीं होगा।”

वृद्ध और उसकी पत्नी मेरी ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे थे परन्तु मैं उनकी कोई सहायता नहीं कर पा रहा था, इसका मुझे दुःख था। मैंने फिर कहा – “बाबा, आप लोगों को कानों में लगाने वाली मशीन से कुछ फ़ायदा हो सकता है। कम से कम बहुत ज़ोर से तो नहीं बोलना पड़ेगा।”

बूढ़े की आँखों में कुछ आशा जगी। उसने पूछा–“कितने पैसे लगेंगे मशीन खरीदने में?”

“क़रीब दो-तीन हज़ार की एक मशीन, कुल मिलाकर दोनों मशीनें पांच-छह हज़ार में आ जाएँगी।”

“पांच छह हज़ार? डॉक्टर साहब, खाना तो मुश्किल से मिलता है– पांच छह हज़ार हमें कौन देगा।”

उन दोनों की आँखों में जो आशा की किरण आई थी वो एकदम ग़ायब हो गयी और उनके चेहरे मुरझा गए। फिर वृद्ध ने अपनी पत्नी की ओर देखा और आँखों से चलने का इशारा किया।

मैंने देखा, दोनों की आँखों में आंसूं की एक-एक बूँद तैर रही थी और वो अपने आपको फिर से घोर निराशा में प्रवेश करता महसूस कर रहे थे। मैंने देखा अत्यधिक कमज़ोरी और घोर निराशा के कारण उन दोनों को उठने में बहुत दिक्क़त हो रही थी। मैं अपनी सीट से उठा और उनको खड़ा होने में मदद करने लगा। मेरी थोड़ी सी मदद से उन्हें उठने में आसानी हुई और वो धीरे-धीरे ओ.पी.डी. से बाहर हो गए।

मैं काफ़ी देर तक यूँ ही बैठा रहा। उनकी कोई मदद न कर पाने के कारण मेरा शरीर भी उतना ही ढीला पड़ गया था, जितना उनका। और निराशा भी क़रीब-क़रीब उतनी ही।

अचानक ही मैंने महसूस किया कि मैं नब्बे साल का असहाय वृद्ध हो गया हूँ !

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