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@dawriter

नियति

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dks343 by  
dks343

 

बाहर लकदक टेंट लगे थे। नसबन्दी जैसे जुमले का हुस्न शबाब पर था। उसी शामियाने के पीछे उस गंदी इमारत पर तहरीर लिखी थी, ‘‘तत्काल लाभ, तुरंत भुगतान। इस इबारत के बगल एक अधखुला दरवाजा था। जिसके नीम-अंधेरे कमरे में आहें एवं सिसकिंया थीं। मैले-कुचैले बिस्तर पर एक बच्चा तकरीबन मौत की आगोश में था। मगर डाक्टरों को उसके बच जाने की उम्मीद न छोड़ी थी। नीम-हकीम, दवा-दारू, गंडक-ताबीज, पीर-मजार, दुआ-फातिहा, कोई कसर छोड़ी नहीं गयी थी। यकीनन नाउम्मीदी थी, मगर डाक्टरों ने आश्वासन देना नहीं छोड़ा था। जब तक सांस, तब तक आस, और जब तक आस तब तक मनुष्य की अदम्य जिजीविषा, हे धन्य मानव! उसी मनुष्य ने जब ब्लड-बैंक से पहली बार खून लिया तो मरणासन्न बच्चे के वालिद की नसबन्दी हुयी। हालाॅकि चेक न मिला था मगर उस चेक के सबब ग्यारह सौ का कर्ज जरूर मिला था।

तीन बेटियों के बाद जने बेटे को बचाने की कोशिशें बदस्तूर जारी थीं। दूसरे बोतल खून की दरकार हुई तो वालिदा की नसबन्दी हुई। चेक फिर नहीं मिला था, मगर चेक पर लिखी जाने वाली रकम के सापेक्ष कर्ज जरूर मिल गया था। तीसरे बोतल खून की जरूरत पड़ी तो बच्चे का बिन ब्याहा चाचा हाजिर हुआ। अपने कुल के दीपक को बचाने के लिये छोटे भाई के कुल का नाश करना बड़े भाई को गवारा न हुआ। फिर बेटियां हाजिर की गयीं। बिन ब्याही बेटियों को बाल-बच्चेदार बताकर भर्ती कराया गया।

आपरेशन टेबल पर बेटी की कौमार्यता छिप न सकी और डाक्टर ने कानूनी पचड़े से बचने के लिए नसबन्दी से हाथ खड़े कर दिये। बच्चे के चाचा ने बाप से जिरह की। कल की होने वाली औलाद के लिये आज की औलाद को मरने नहीं दिया जा सकता। पुरूष नसबन्दी में कोई कानूनी लफड़ा न था। बिन ब्याहे चाचा की नसबन्दी के बाद तीनों चेक तत्काल मिल गये थे, मगर तब तक बच्चे के प्राण-पखेरू उड़ चुके थे। नियति से उन्हे कोई गिला न था, मगर इस नियति का वक्त उन्हें ऊपरवाले की मर्जी कबूल न था।

समाप्त



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