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@dawriter

नारी

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कुछ खास नही मेरे जीवन की कोई परिभाषा है
असंतृप्त,अनजानी और अधूरी सी कुछ अभिलाषा है।
कहीं रसोई के धुएँ सा,कहीं घरों के जालों सा
कहीं,नहीं कुछ कह पाने की
विवशता के तालों सा
कहीं कुछ उलझा उलझा सा है
कहीं व्यथित सा जीवन
कहीं खाँसती चिल्लाती सी
कुचला सा ये तन मन
कभी भँवर में अनजाने से भय के खाता हिचकोले
कभी बेबातों की उम्मीदों में बौराया मन डोले
कही अपनो मे खोज रहा,कोई मन का मीत मिले
कही खोजती है ये आँखे कोई सुरीला गीत मिले।
आज अचानक अंगड़ाई लेने की चाह जगी है
आज अचानक कोई धुंधली पर,
नई सी राह मिली है।
माँग रही हूँ साथ सभी का
इस राह पर चल जाने को।
कदम बढ़ाया है अब अपना
एक पहचान बनाने को।।



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