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@dawriter

दानी

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sidd2812 by  
sidd2812

"दानी"

वो अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा केस जीतने वाला था। शीशे में अपनी सूरत देख वो मुस्कुराया!

सालों पहले उसके माँ-बाप के एक साथ चले जाने से, और उसके चाचे ताऊ की ज़्यादतियों के चलते भी उसने लॉ किया था।
सिवाए उसके दादा के उसका साथ देने वाला कोई न था।

जब तक दादा जी ज़िंदा रहे, वो इस घर का केस लड़ते रहे। घर भी क्या, पूरी जागीर थी। इसीलिए विवाद था। उसके दादा ने कई बार सलाह दी कि आपस में बाँट लो, चाचा तो मान भी गए पर ताऊ जी अड़ गए, लेंगे तो पूरी प्रॉपर्टी अपने नाम लेंगे।

फिर दादाजी मर गए।

केस चलता रहा।

जिस वकील के हाथ में ये केस था, उसका एक्सीडेंट करवा दिया गया।
शायद इसीलिए उसने वकालत सीखी थी। ये उसका पहला केस था। अपने ही घर के लिए।
अपनी ज़मीन के लिए।

और सिर्फ पांच तारीखों में उसने इस केस को ऐसे मुकाम पर पहुँचा दिया था जहाँ जीत उसी की होनी थी।

वो घर से निकल ही रहा था कि जोगिया वस्त्र पहने एक भिक्षुक ने रास्ता रोक लिया।

"धन्य है तेरे भाग बच्चा! धन्य हैं" भिक्षुक की बड़ी-लम्बी-घनी दाढ़ी साफ़ सुथरी थी। आँखें शांत, मुख पर तेज़, मुस्कान शालीनता से ओढ़ी हुई थी।

उसने आँखें मूंदी - खुद से जवाब मिला - 'इन्हें मैंने देखा है। ये भिक्षुक तो नहीं'

"किस दुविधा में है बालक, कहाँ भागा जा रहा है?"

"बाबा एक जंग है, जिसे जीतने जा रहा हूँ।"

"मेरा आशीर्वाद है बच्चा, तेरे ललाट की लकीरें बताती हैं कि तू अवश्य जीतेगा।"
मन ही मन बाबा बना रणछोड़दास ये सोच रहा था कि किस तरह इसे कोर्ट जाने से रोका जाए या विलम्ब किया जाए। रणछोड़दास उसके चाचा का सबसे ख़ास और समझदार मित्र था। उसकी बुद्धि के बल पर ही इतने सालों से केस लटक रहा था। लेकिन अब केस को हाथ से फिसलता देख उन्हें कुछ न सूझा तो रणछोड़दास को ही उसका रास्ता रोकने के लिए चल दिया। पर उसका दिल गवाही दे रहा था कि वो गलत कर रहा है,लेकिन मित्रता धर्म भला कैसे न निभाता; इसलिए वो उसका समय बर्बाद करने के उद्देश्य से उसके घर गया था। सालों पहले उसने इस बालक को देखा था, इसीलिए नाम भी उसे याद न था।

"बाबा आप अंदर आ जाइए, मैं भिक्षा लेकर आता हूँ"

"नहीं नहीं पुत्र, हम भिक्षा में अनाज नहीं लेते।"

"तो बताइए मैं किस प्रकार आपकी सेवा कर सकता हूँ?"

"हम तेरे साथ कुछ समय व्यतीत करना चाहते हैं। तेरे हाथ देखना चाहते हैं। तेरा भाग्य देखना चाहते हैं।"

वो समझ गया कि सारा प्रपंच क्यों किया जा रहा है।
फिर भी मुस्कुराकर बोला "बाबा, मुझे जंग आज ही जीतनी है, मैं समय से न पहुँचा तो मेरा अनादर होगा, आप समय के बदले जो चाहें मांग लें, मैं सहर्ष दे दूंगा।"

"सोच ले बच्चा, वचन दे रहा है, ऐसा न हो कि बाद में पछताना पड़े!"

"मैं क्षत्रिय हूँ बाबा, वचन से भला क्योंकर मुकर सकता हूँ। आप मांगिए, क्या चाहिए आपको"

रणछोड़दास कुछ देर सोचता रहा - ये तरीका भी बुरा नहीं, इससे इसकी मोटर गाड़ी मांग लेता हूँ, भले ही न दे, कम से कम बहस कर के समय तो नष्ट हो ही जायेगा।

"बच्चा अपनी घड़ी दे दे" बाबा बोले

उसने उतारी और दे दी। चहरे पर अब भी मुस्कान थी।

घड़ी कीमती थी, रणछोड़दास भी मुस्कुराया।

"और कुछ बाबा?"

"अपनी मोटर-गाड़ी की चाबियां दे दे।"

उसने मिनट से पहले चाबी बाबा को थमा दी।

अब रणछोड़दास चौंक उठा, ये कैसा आदमी है?
"तुझे ये ज्ञात है कि अगर मोटर न होगी तो तू जंग के मैदान तक नहीं पहुँच पायेगा?"

"ज्ञात है बाबा, पर मैं दौड़ कर पहुँच जाऊंगा। या मैं तांगा ढूंढ लूंगा, जो तीन एक कोस पर मिल ही जायेगा। पर मैं आपको मना नहीं कर सकता। मैंने पहले भी कहा आपसे"

"मैं कुछ भी मांग लूँ तू दे देगा?"

"सौ प्रतिशत!" वो मुस्कुराया।

रणछोड़दास का दिल पसीजने लगा। उसे अहसास हुआ कि वो एक नेक बच्चे के साथ गलत कर रहा है। उसे नाम फिर भी याद न आया।

"अगर मैं कहूं कि ये जो घर है, ये ज़मीन है, जिसे तू जीतने जा रहा है, इसे जीत कर मेरे नाम कर दे, तब?"

"मैं नाम कर दूंगा"

"कर दे" और तुरंत अपने झोले से रणछोड़दास ने कुछ कागज़ निकाले और कलम उसके हाथ में देकर दस्तखत करने को कहा।

कागज़ कोरा स्टाम्प पेपर था।

वो फिर मुस्कुराया और दस्तखत कर दिए।

"क्या अब मैं जा सकता हूँ..." वो कुछ ठहर कर बोला "चाचा" और मुस्कुरा दिया

"तू किस मिट्टी का बना है? अब क्या होगा केस लड़ के? अब किस लिए जाना चाहता है?"

"फैसला करने के लिए। जीतने के लिए। जो मैंने आपको वचन दिया है उसको पूरा करने के लिए। मैं घर जीतूंगा तभी तो आपको मिलेगा।
फिर भी ये मेरी हार नहीं होगी। मैंने आपको 'दान' दिया है, हारा नहीं हूँ मैं"

इतना कहकर वो सड़क की तरफ चलने लगा कि पीछे से रणछोड़दास 
ने आवाज़ दी "सुन, तेरा नाम क्या है?"

"कर्ण" बिना मुड़े उसने जवाब दिया।

 

 



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