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@dawriter

दादी की यादें .....!

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nehabhardwaj123 by  
nehabhardwaj123

आज पड़ोस मे बनते हुए घर के पास एक बूढ़ी औरत को देख कर राशि को बरबस ही अपनी दादी की याद आ गयी। कैसा था ?... उसकी दादी का जीवन शांत सा बिना मोबाइल, T V वाला! खो सी गयी थी! दादी की ही दुनिया मे। उसकी दादी!.... जो बहुत ही साधारण सा जीवन जीती थी। वो बहुत ही कंजूस थी या शायद हालात ने उन्हे ऐसा बना दिया था क्योंकि दादा जी तो बहुत कम उम्र मे उन्हे छोड़कर जा चुके थे। जो भी कारण रहा था, उसने उन्हे बचपन से ऐसे ही देखा था। उनका कमरा साधारण सा छत के बीचोबीच लगभग 10 x 8 फुट का होगा, लाल -भूरे रंग के दरवाज़े! उसमे घुसते ही बायीं ओर एक बड़ा सा संदूक!.... जिसमे दादी अपने सर्दी, गर्मी के कपड़े रखती थी और साथ ही उसमें उनका कुछ पुराना सामान था। उससे लगता हुआ एक बड़ा पलंग, जिसमे कपड़े की बनी हुई पट्टियाँ थी। जिसे निवार कहते थे। उसके पीछे की ओर एक बड़ी सी दीवार अलमारी, जो हमेशा बंद ही रहती थी हालाँकि उसमें कुछ खास था नहीं .. पर जब नीचे घर मे कोई मेहमान आता था तो सब बच्चे ऊपर दादी के कमरे मे जाते थे। क्योंकि शायद वहीं एक ऐसी जगह थी जहाँ बिना रोक टोक बच्चे खेल सकते थे। अगर किसी तरह अलमारी खुल जाये तो कहना ही क्या ?...पर ऐसा मौका कभी आया ही नहीं और अगर आया भी तो दादी वहीं कमरे मे होती थी।

तो उसे छूना भी मुश्किल था। उस अलमारी से एक अजीब सी खुशबू आती थी उस समय तो किसी भी बच्चे को पता ही नहीं था वो किस चीज़ की थी ? पर अब राशि को लगता है वो!... शायद! हींग की खुशबू थी। खाने के लिये उस अलमारी मे दो ही चीज़ होती थी, एक तो शक्कर और दूसरी खरबूजे की गिरी वो भी छीली हुई, जिसे दादी पूरे साल बच्चों से बचा कर जन्माष्टमी की पन्जीरी मे डालने के लिये रखती और बच्चों की एक ही विनती दादी! हमारे हिस्से की अभी दे दो। हमारी पन्जीरी मे मत डालना। दायीं और एक दूसरा पर उससे थोड़ा छोटा पलंग उसके सामने ही था और उसके ऊपर एक बड़ा सा स्लेब! जिसे कानिश कहते थे। उस पर दो-तीन तस्वीरें थी, एक दादा जी की, एक दादी के गुरु जी की और भी एक दो ओर थी जिनकी याद धुंधली सी हो गयी थी। उसके ऊपर एक सादी सी गोल दीवार घड़ी, जिस पर बल्ब की पीली रोशनी पड़ती जो उसके बिल्कुल ऊपर था। छत के बीचोबीच छोटा सफेद पंखा, जिस पर सर्दी के मौसम मे दादी पॉलीथीन चढ़ा कर रखती थी और जो गर्मियों मे सुबह 5-8 के बीच मे चलाना मना था। क्यूकि!.... दादी कहती थी " तड़क मे ठंड हो जाती है " और पलंग के दूसरी ओर पास ही दादी के भगवान जी रखे थे जिनमे शायद सब ही भगवान थे पर सबसे ज्यादा अगर किसी भगवान की तस्वीरें थी तो वो थे, लड्डूगोपाल जी!.... जिनकी कम से कम 3-4 मूर्ति तो होंगी ही। क्यूकि ?.... वो दादी के इष्टदेव थे। बाहर के दरवाजे के ठीक सामने एक और दरवाजा था, जो बाहर छज्जे पर खुलता था जहाँ एक और लाल रंग की पानी की टंकी थी।

तीसरी मंजिल होने के कारण उसमें कभी-कभी बाहर का पानी आया करता था। उसके नीचे एक लोहे की बाल्टी रखी होती थी उसके बराबर मे एक दो पानी के घड़े होते थे। छज्जे के दूसरी और बडा सा पानी का मटका और उसके ऊपर छोटे -छोटे घडो का पिरामिड सा था। उसके बराबर मे सुराही और एक मिट्टी से सनी हुई अँगीठी भी रखी रहती थी हालाँकि उसने उसे कभी जलते हुए तो नहीं देखा पर कभी -कभी दादी उसे मिट्टी से लीपती थी। एक दो बार राशि ने भी थोड़ी सी लीपी थी। ऐसा लगता था जैसे लोहे की बाल्टी को काटकर बनायी गयी थी। सबसे अच्छा तो तब लगता जब बारिश मे छतरी ले कर सब बच्चे ऊपर दादी के कमरे मे आते थे और हल्का सा दरवाजा खोल कर ही बैठते थे। क्यून्कि बारिश होते ही लाइट चली जाती थी और रोशनी का बहाना बना कर और हल्की हल्की बारिश की फुहारो का आनँद लेते थे। दादी बच्चों को या तो इमला बोलती थी या फ़िर अपनी भजन की किताब पढ़ने को देती थी।

गर्मियों मे रात को लेट कर दादी के पास ही तो लाइट का इंतजार करते थे और उनके साथ साथ भजन भी गाते थे। कभी कभी गर्मी मे भी बहुत बारिश के बाद हल्की सर्दी हो जाती थी। और दादी अपना स्वेटर निकाल लेती थी। और बहुत गर्मी मे तो सब बच्चे मिलकर जवे तोड़ते थे और सर्दी मे दादी क्रोशिया करती थी। एक बार उन्होने उससे एक पूजा का आसन भी बनाया था। उनकी सबसे बड़ी बात जो आज तक राशि को आश्चर्यचकित करती है कि उन्होने अपनी पूरी जिंदगी मे सिर्फ एक कपड़े धोने का ब्रुश लिया था। जबकि!... उस समय मशीन नहीं होती थी कभी कभी हम बच्चे भी दादी के कमरे मे सोते थे। जब कार्तिक माह मे दादी तुलसी पूजन के लिये मंदिर जाती थी। सब बच्चे भी अपने कपड़े रात को ही लेकर आ जाते थे, कि सुबह को नहा के मंदिर जायेंगे पर दादी ठंड मे सुबह - सुबह नहाने नही देती थी बस मुँह हाथ धोने की इजाजत थी। फ़िर हम सब बच्चे भी तैयार हो कर जाते थे। एक और बूढ़ी दादी भी साथ जाती थी जो घर के सामने ही रहती थी। फ़िर थोड़ा आगे जा कर और भी औरते मिल जाती थी। फ़िर वो सब गीत गाते हुए मंदिर जाती थी। कैसी जिंदगी थी दादी की ?.. और हमारे बचपन की! राशि बस यही सोचे जा रही थी कि उस समय सब बच्चों की दादी का कमरा कुछ कुछ ऐसा सा ही होता था खासकर छोटे शहरों मे। आजकल दादी के कमरे भी ऐसे ही होते होंगे क्या ? यही सोचते सोचते राशि ने देखा की बूढ़ी अम्मा तो कब की जा चुकी थी, राशि को उसकी दादी और उनके कमरे की याद दिला कर।



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