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@dawriter

जिन्दगी से कोई वादा तो नहीं था..!

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chandrasingh by  
chandrasingh

कल रात के स्याह सन्नाटों में, जब पलकों ने मूंदने से इनकार कर दिया। आखें इक-टक शून्य में निहारने लगी। तो नींद समझ गयी की, आज मेरा यहाँ कोई काम  नहीं और वो चुपके से वहाँ से चली गयी।आसपास कोई था भी  नहीं। और मीलों तक ख़ामोशी अपने होंने पर इतरा रही थी। तभी किसी के कोमल स्पर्श ने मुझे छुआ। और कहा। सुनो, अगर इन आखों से बहते झरने को कुछ देर रोक लों तो मैं तुमसे दो पल बात कर लूँ ?

मैंने कहा कौन हो तुम ? मैंने तो किसी को आवाज नहीं दीया। तुम फिर कैसे चले आये? मुझे किसी से कोई बात नहीं करना और  तुम तो दिखते भी नहीं मुझे क्यों ? 

वो बोली मैं तुम्हारी अपनी ही हूँ। तुम्हारी जिन्दगी। “अपना ” शब्द सुनकर मुझे जोर से हंसी आ गया| और मैं उठकर जाने लगा। उसने रोका -ज़रा ठहरों। तुम मेरे बिना कैसे जा सकते हो ? कैसे जी सकते हो ? कैसे चल सकते हो ? मैं फिर हँसने लगा हाँ मैं तुम्हारे बिना भी जी लेता हूँ। हंस लेता हूँ। अगर सांसों का आना जाना  ही  जिन्दगी है| तो ये काम बखूबी हो रहा है। अब तुम जाओ।वो बड़ी मनुहार के साथ कहने लगा।देखो तुमने कभी किसी मोड़ पर मुझसे वादा किये थे की तुम मेरा साथ निभाओगे। नहीं मैंने ऐसा कोई वादा नहीं किया। लेकिन तुम बिन जीने का इरादा भी नहीं  था मेरा।लेकिन तुम जो कदम -कदम पर मुझे आजमाते हो। नये नए रूप धर के स्वांग रचते हो। इससे मैं थक गया हूँ। अब तुम किसी भी भेष में आओ मैं तुम्हे पहचान लेता हूँ।अब  क्या लेने आते हो मुझसे ?-चले जाओ|इस बात पर  उसने मेरे हाथ, अपने हाथों में भर लिए और प्यार से कहने लगा। तुम जिसे स्वांग कहते हो| वो मेरे रंग है। बहुत रंग बिरंगा हूँ मैं। जहाँ दर्द के स्याह रंग है। पीड़ा के धूसर रंग है। वहां प्रेम के लाल,गुलाबी रंग भी तो मैंने तुम्हे दिए। ख़ुशी के आनंद के नीले पीले इन्द्रधनुष भूल गये तुम ? मेरे साथ साथ चलो यूँ बेजार नहीं हुआ करते।

बोल चुके  तुम ? अब मैं कुछ कहूँ ? देखो, जिन्दगी तुम्हारी इक इक अदा मेरी समझ से परे है। और तुम मुझे कभी रास नहीं आये। अभी पिछले दिनों  तुमने मुझे बुरी तरह तोड़ा था। बिखर -बिखर गया मैं। अनगिनत टुकड़े हुए मेरे। दर्द के समन्दरों से खुद को निकाल कर मैंने इक -इक टुकड़ा खोजा। उन्हें उठा –उठा कर जोड़ता रहा ……| लेकिन अफ़सोस कोई भी टूटा हुआ टुकड़ा किसी भी हिस्से  से मेल नहीं खा रहा। कोई किसी से नहीं मिलता। और ना फिर से जुड़ ही पाता है। अब मैं खुद को कही से जोड़ना नहीं चाहता तो फिर तुम मेरे सामने आ खड़े हुई जोड़ने के लिए। 

खुद को बहुत होशियार समझते हो तुम। क्या यहाँ कोई ” मुझे तोड़ो -मुझे जोड़ो ” का खेल हो रहा है। जुड़ भी गया कोई हिस्सा तो उसमे दरार साफ नजर आती है जिन्दगी। जिसमे से दर्द रिस -रिस कर बहता रहता है ताउम्र। समझे तुम ?

क्यों करती हो तुम ऐसा। जब हर झील में पानी है। लहर है तो। कमल क्यों नहीं खिलते ? जब भी मैंने तुम्हारे अर्थ खोजे। बदले में सिर्फ बैचेनियाँ ही पाया। आईने में खुद को जब -जब भी देखा बस इक आवाज आया| क्यों हूँ मैं यहाँ ? किसके लिए ? और क्या अर्थ है मेरेहोने का ? इन डरावने सवालातों के जबाव  तो दो ? 

क्या मांग लिया तुमसे ? अपनी बाहें फैला कर सारे संसार को भरना चाहा  था उसमे। अपनी दो छोटी आखों में सबके लिए दर्द भर लिया था। और मन में प्रेम। अपनी उम्मीदों के पौधे लगाये। सपनों के बीज बोये। और तुमने मेरी क्यारियों को छोड़ सारे शहर में सावन बरसाए क्यों ? जब मैं दर्द से भर गया और तुमसे कुछ कहना चाहा तो तुम्हारे पास समय नहीं था। आज मैं होठों पर चुप लगाये हूँ तो कहते हो बोलते क्यों नहीं ? 

जब मैं हंसता था तो कहते थे। क्यों वेवजह हंसना ? आज जब आसूँ है तो फिर कहते हो क्यों ये झरने ? पहले कहते थे ख्वाब बुनो यही जिन्दगी है। और जो ख्वाब बुने तो नींद से जगाकर कह दिया जागो ये हकीकत नहीं। सुख दुख के तानेबाने पर मैंने रिश्तों के लिबास सिल लिए थे  जिन्दगी और तुमने उन रिश्तों में भी गांठ लगा दीये। 

तुम बिन जीने का इरादा नहीं था जिन्दगी। पर मैं अब तुम बिन ही जीना चाहता हूँ। अब मुझे तुम्हारी जरुरत भी नहीं। इस बार जिन्दगी बड़ी मायूस होकर मेरे पास से चली गयी। जिन्दगी तुमसे कोई वादा नहीं था मेरा। हाँ लेकिन तेरे बिना जीने का अब इरादा है मेरा।  सुबह हो गया। 

और मुझे याद आया| मेरे एक दोस्त की एक शेर।
“नींद क़ी बंदिशों में, आखं कहाँ जगती है 

जिन्दगी बर्फ है कभी, कभी सुलगती है।

बेबसी, मुफलिसी, गम, दर्द, जिल्लते, आसूं 

इतने कपड़ों में, भला ठण्ड कहाँ लगती है।|”

दोस्तों समय के आभाव के चलते बहुत दिना बाद आप से मुखाबिक हुआ हूं। जीवन के भाग दौड़ मे कुछ व्यस्त हूँ आशा करता हू बहुत जल्द नियमित मुलाकात होगी।



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