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@dawriter

जाने वालों ज़रा, मुड़ के देखो इन्हें..!

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दोस्तों, जहाँ मैं रहता हूँ वहाँ से इक लम्बी सड़क निकलती है। मेरे कमरे की खिड़की उस सड़क पर ही खुलता है। सड़क के दोनों और बहुत खूबसूरत मकान बने है।उन मकानों की मालकिने और मालिक भी खूबसूरत हैं। जो अपने साफ सुथरे घरों की गंदगी उस सड़क पर शान से फेंक देते हैं। शाम को इक सफाई वाली आती है और सारी गंदगी बड़ी तन्मयता से साफ करती है! अब आप कहेगे इसमे नया क्या है? 

दोस्तों, उस सफाई वाली को मैं कुछ सालों से जानता हूँ! अपने पैरों से लाचार वो महिला सभी के नफरत की पात्र है ,लोग उसे अपशब्द कहते हैं! उसकी लाचारी पर हंसते हैं। बच्चे उसे परेशान करते हैं! लेकिन कोई उससे बात नहीं करता। वो अक्सर मेरे खिड़की के पास आकर अपनी बड़ी सी झाड़ू टिका कर आवाज देती है! दादा पानी मिलेगा? मैं अपने सारे काम छोड़ कर उसके पास जा खड़ा होता हूँ। और फिर हम घंटों बाते करते हैं! उस महिला के पास कोई डिग्री नहीं पर ज्ञान बहुत है , दुनिया की समझ है उसे!उम्र में वो मुझसे बड़ी है लेकिन मुझे दादा कहती है। दादा पूना/मुम्बई मे बड़े भाई को बोलते हैं। हम बहुत देर तक बातें करते है धर्म पर राजनीती पर जीवन पर और जोर जोर से हंसते भी हैं। उस समय सभी आसपास की पुरुष मुझे घूर-घूर के देखतें हैं और महिलाएं मुझे संदेह की नज़रों से।

सब कहते है की वो नीच जाति की महिला, गन्दी औरत, जो गंवार है लंगड़ी है! उससे तुम क्या बाते करते हो! मैंने कहा मुझे उस गंदी महिला की आखों में उजली चमक दिखता है! उसके बूढ़े चेहरे पर मेरे लिए इक पवित्र मुस्कान आता है, वो अनमोल है। उसका ह्रदय इतना विशाल है की आपके हवेलीनुमा मकान छोटे पड़ जाए।

दोस्तों ,क्या देह से अधूरे इन्सान, इन्सान नहीं होते कोई महिला क्या सिर्फ इसलिए नफरत का पात्र बन जाए क्योकिं वह विकलांग है या हमारे जैसा नहीं है। वो ऐसा काम करे जो हम नही कर सकते क्यों? क्या देह से अधूरे लोगों का अपना स्वाभिमान नही होता? उनके सपने नहीं होते?

उनमे कुशलता नहीं होती? उनमे प्रेम नहीं होता?

देह से अधूरे है तो क्या आत्मा तो पूरी है न, मुस्कुराहटों में मिलावट तो नहीं है ना, इक सवाल अक्सर मन में उठता है कि विकलांग कौन? जिसकी देह अधूरी है वो या जिसे इश्वर ने देह तो सुन्दर दे दी लेकिन मन की सुन्दरता नहीं दिया ह्रदय में किसी के लिए प्रेम, सब कुछ दिया लेकिन उन्हे मनोरोगी बना दिया, भाव और संवेदना नही दी। जिनके पास किसी को देने के लिए मुस्कान ना हो वो विकलांग ही है।

मुझे उस बूढ़ी झाड़ू वाली से मिलकर अपने होने का बोध होता है। जो किसी दूसरे को अपने स्नेह से आत्मीयता से सम्पूर्ण कर दे वो खुद अधूरी कैसे, वो विकलांग अपाहिज कैसे हुई? अधूरे है तो वो लोग जो इन्हें इन्सान भी नहीं समझते! इन्हें ना परिवार में स्नेह मिलता है ना समाज में सम्मान! अधूरे है वो लोग जिनकी सोच छोटी रह गयी! देह को सुन्दर बनाने में जीवन बिता दिया! लेकिन अपनी मानसिक विकलांगता से कभी आजाद नहीं हो सके।

अधूरी वो झाड़ू वाली नहीं, अधूरे हैं वो लोग जो खुद कभी अपने छोटेपन, अधूरेपन, ओछेपन से बहार नहीं निकल सके। जो बड़े -बड़े मकानों और बड़ी गाड़ियों में बैठ कर खुद को पूर्ण समझ लेते है!

और कभी कोई विकलांग व्यक्ति दिख जाये तो उस पर दया करके खुद को परोपकारी साबित करते हैं। या हिकारत भरी नजरों से देख कर मुंह फेर लेते हैं।

याद रखिये , इन्हें हमारी दया नहीं सिर्फ सच्चा प्यार चाहिए। सम्मान चाहिए हमारा साथ चाहिए। सुनो ये जो दूसरे के विकारों को देखते देखते जो 'आप' मे खुद विकृतियाँ आ गयी है, समय है उन्हें सुधार लो और समय रहते अपने मन मे उपज रहे रोग को समाप्त कर दो ।

किसी गीत की पंक्तियाँ है:-

"जाने वालों ज़रा मुड़ के देखो इधर ,
हम भी इन्सान हैं तुम्हारी तरह!,
जिसने सबको रचा, अपने ही रूप से
उसकी पहचान हैं हम तुम्हारी तरह-॥"
"-एक इन्सान हैं।"



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