0
Share




@dawriter

जाग जाओ हे जन गण मन

0 0       

कितने विवश हैं आज राम !!! उन्हें अब अपना आशियाना बनाने के लिए नेताओं के मुखमण्डल की और ताकना पड़ रहा है. अयोध्या में राममंदिर बनाने की जुगत में लगी नेताओं की एक पूरी जमात जो पिछले कई दशकों से इस मुद्दे पर अपनी राजनीती की दुकानें चमकाने में लगे हुए हैं अयोध्या में एकत्र होती है.मीटिंग होती है, बयानबाज़ी होती है, वे साधु संत जिनके चेहरों पर और वाणी में शांत भाव होना चाहिए उग्र वाणी में बात करते दीख पड़ते हैं. राज्य में नए मुख्यमंत्री से राज्य की दशा सुधारने की आशा शायद किसी को नहीं है ऐसा इसलिए लगा क्योंकि न कभी रोज़गार की बात होती है न गरीबों की गरीबी और दुर्दशा की. न कभी शिक्षा की बात होती है न किसी अन्य प्रकार के विकास की जब टेलीविजन पर समाचार देखने बैठो तब बस या तो धर्म के नाम पर मारकाट दिखाई देती है या राम के नाम पर वोटों की राजनीती की. वंदे मातरम, भारत माता की जय और गोरक्षा.अब तो लगता है की विकास पूरा हो चुका है भारत का और केवल यदि कुछ मुद्दे बचे हैं तो वे यही हैं. गोरक्षा अवश्य होनी चाहिए आखिर हम पूजते हैं गौ माता को किन्तु क्या इसके लिए मासूमों की बलि लेना उचित है ? किसी भी धर्मग्रन्थ या वेद पुराण में ऐसा कहीं नहीं लिखा होगा ( मैंने सब कुछ पढ़ा नहीं है )कि धर्म की रक्षा के लिए किसी का कुछ भी अहित करना पड़े, करो. भाई धर्म के सही अर्थ को समझ लें हम पहले तो क्या यह अच्छा नहीं होगा. गाय ही क्यों, रक्षा तो हर प्राणी कि हर जीव कि होनी ही चाहिए फिर क्या कारण है कि अन्य पशुओं कि हत्या देश में जायज़ है क्यों भैंसों के लिए कभी कोई आंदोलन नहीं हुआ वे भी दुधारू पशु हैं यदि गाय को हम माता समझ कर पूजते हैं तो इसके पीछे हमारे पूर्वजों कि सोच यही रही होगी कि गाय हमारे लिए दूध देती है जो विशेषकर शिशुओं के लिए अमृत है और गाय के मल मूत्र में भी औषधीय गुण हैं. उन्हें क्या पता था कि एक दिन इस विचारधारा को धर्म के नाम पर ऐसे भुनाया जायेगा. मैं धर्म के विरुद्ध नहीं हूँ लेकिन धर्म की आड़ में होने वाली राजनीती के चलते बहुत आहत हूँ. यहाँ हिन्दू और मुस्लमान ही धर्मों में राजनीती की घुसपैठ है और मज़हब, सम्प्रदाय जात- पात आज राजनीती के पर्याय बन चुके हैं.

जिस देशकी जनसंख्या का एक बड़ा भाग दो वक्त की रोटी के लिए जीवन भर जद्दो- जहद करता है, जहाँ आज भी अशिक्षा, अज्ञानता और अन्धविश्वास अपनी जड़ें जमाये हुए है, जहाँ बेरोज़गारी और भूख के कारण लोग आत्महत्या कर रहे हैं, अपनी बहन बेटियों का सौदा करने को विवश हैं उस देश में ऐसे मुद्दे क्या इतने महत्त्वपूर्ण हैं....उस देश में यदि कोई नेता राममन्दिर का मुद्दा उठता है तो सारी की सारी सरकारी मशीनरी की ताकत इसी काम में झोंक देता है तो बड़े ही शर्म की बात है यह. किसी को भिक्षावृत्ति शर्मनाक क्यों नहीं लगती ? किसी को देश में अशिक्षा के आंकड़े क्यों नहीं डराते ? भूख और गरीबी भला उन्हें क्यों डराने या सताने लगी जिन्हे तीन वक्त भरपेट शाही भोजन मिलता है !! भला उनका जनता की तकलीफों से क्या सरोकार?? जनता बेरोज़गार है तो हुआ करे उनकी तो सात पुश्तें तर गयीं. उनकी तो तनख्वाहें समय पर बढ़ती हैं, समय पर मिलती हैं, और कल वो नेता न भी रहे तो सरकारी मकान और पेंशन तो उनसे कोई छीन ही नहीं सकता. फिर अपनी रिटायरमेंट ( जो राजनीती में कभी होती ही नहीं ) से पहले अपने पुत्रों को राजनीती सीखा चुके होते हैं और बड़े ओहदे भी दिला चुके होते हैं.

लोगों की विवशता उनके लिए केवल एक राजनितिक मुद्दा होता है जो वोट बटोरने में उनकी सहता करता है क्योंकि जनता मूर्ख है, बहुत जल्द हर अन्याय को हर अनीति को भूल कर चिकनी चुपड़ी बातों में आ जाती है.

यदि कहीं कोई आत्महत्या कर ले तो कुछ बातों पर ध्यान ज़रूर दिया जाता है, मरने वाला किस धर्म या संप्रदाय से था ? उसका धर्म या संप्रदाय इनकी राजनीती को जो भी लाभ पहुंचा सकता है उसकी समीक्षा होने के बाद तुरत फुरत एक्शन लिया जाता है......कई पार्टियों के नेता उनके घर पहुँचते हैं, उन्हें मुआवज़ा देते हैं पत्रकारों की जमात उनके इंटरव्यू लेती नहीं थकती क्योंकि सब चैनल राजनीती से जुड़े हैं और उनकी दुकानें आपसी मेलजोल से ही चलती हैं.

आज देश में कोई टीवी चैनल नहीं है जहाँ पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने का फ़र्ज़ निभा रहे हों. सब के सब बिके हुए मालूम पड़ते हैं.

हे राम !! अब तो आप से भी गुहार लगाने में दो बार सोचना पड़ेगा क्योंकि आप तो स्वयं ही पराश्रित हो गए लगते हैं इनके हाथों. इनकी कृपा हो जाएगी तो आपका मंदिर बन जायेगा....हमे किसके सहारे छोड़ दिया प्रभु ? कहाँ जाएँ ? क्या करें ? कब होगा इस देश का उद्धार ? कौन बनेगा इसका तारणहार ? क्या ऐसे ही देश का सपना देखा होगा हमारे उन वीरों ने जिन्होंने देश को आज़ाद करने के लिए प्राणों की बाज़ी लगा दी ? किसे पता था की १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेज़ों की दासता से मुक्त होकर देश हमेशा के लिए उनके हाथों में चला जायेगा जिनकी दासता से देश को कोई भी मुक्त न कर पायेगा !! कभी भी नहीं.....आज लोकतंत्र परिहास का विषय बन गया है....मानवता बौनी हो गयी है धर्म और राजनीती के आगे. अब तो भगत सिंह, सुखदेव हैं, न राजगुरु !! अब तो देश के नाम पर शहीद होने वाले हमारे जवान भी बेचारे बिना युद्ध के ही मारे जा रहे हैं....कौन आएगा अब मसीहा बनकर ???

जाग जाओ मेरे भारत के भाग्य विधाता.....जाग जाओ जन गण मन !!

( कृपया लेख को खुले विचार से पढ़ें। यह लेख किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के लिये नहीं लिखा क्योंकि मैं भी पूर्ण रूप से आस्तिक हूं लेकिन धर्म के राजनीति करण से आहत हूं ! )



Vote Add to library

COMMENT