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@dawriter

जब जड़ों में पनपता हो भेदभाव

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harish999 by  
harish999

जब विश्वविद्यालय अपने शैक्षणिक सत्र तक नियमित न कर पाते हों। सरकार विश्वविद्यालयों को सामान्य स्तरीय सुविधाएं तक देने में आनाकानी करती हो. ऐसे में युवाओं से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो देश को तरक्की के रास्ते पर ले जाएंगे। न फैकल्टी, न स्टूडेंट्स के बैठने के लिए क्लास रूम और न ही पर्याप्त सुविधाएं। बस, धकापेल एडमिशन और फीस का घालमेल. भारत रहा होगा कभी विश्व में शिक्षा का केन्द्र, लेकिन अब तो विश्वविद्यालय कैंपस राजनीति की प्रयोगशाला के तौर पर तब्दील होते जा रहे हैं। जहां गुरु की जगह सर ने ली है। अब सर के दौर में सिर ही उठेंगे, उन सिरों में क्या होगा, यह गुजरे समय की बात हो चुकी है. वह दौर और था जब गुरु को सर्वोपरि माना जाता था, लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण के चलते गुरु-शिष्य की परंपरा खत्म सी हो गई है। अब पैसे के दम पर हासिल की गई शिक्षा में गुरु -शिष्य वाली जैसी कोई बात नहीं हो सकती है। यह बात तो हुई उच्च शिक्षा की। अब बात आती है प्राईमरी एजुकेशन की। आईसीएससी, सीबीएसई और स्टेट बोर्ड। इन तीनों बोर्डों के बीच फंसे अभिभावक और बच्चे आखिर तक इस बात को नहीं समझ पाते कि आखिर एक ही देश में एक तीन बोर्डो की जरूरत क्यों? यह तीनों बोर्ड ही आम जनता में अमीरी-गरीबी के अंतर को कभी खत्म नहीं होने देते है. जब तक ये तीनों बोर्ड एक नही होगे तब तक असमानता की खाई को पाटा नहीं जा सकता। हिन्दी-अंग्रेजी माध्यम का ड्रामा वो अलग। नागरिकों में एकता का भाव जगाने की बजाय भेदभाव तो जड़ों के साथ ही पनपाया जा रहा है। साथ ही बच्चे की आफत ही आफत। जहां अंग्रेजी मीडियम वाले बच्चे आधी-अधूरी एजुकेशन के साथ अदर एक्टिविटी में सिर घपाते मिलेंगे, वहीं हिन्दी माध्यम वाले किताबों के पेज पलटते-पलटते कब बचपन की दहलीज पार कर जाते है, उन्हें तो क्या उनके अभिभावकों को भी पता नहीं चलता। भेदभाव बढ़ाने वाली शिक्षा व्यवस्था को पोषित करने वाली सरकार कहती है कि बचपन बचाओ। जब प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था ही लडखडाई हो तो उच्च शिक्षा को कैसे भरोसेमंद माना जा सकता है। भारत को डिजिटल इंडिया बनाने पहले कुछ सवालों के सकारात्मक जवाब तलाशने होंगे। जैसे ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों मे टीचर स्थाई रूप से पढाएंगे। शिक्षा की लचर व्यवस्था ढर्रे पर कैसे आएगी. पब्लिक और सरकारी स्कूलों के बीच बढ़ती खाई को कैसे पाटा जाएगा। मिड डे मील, साइकिल और लैपटॉप जैसी चीजों का लालच देकर आखिर कब तक बच्चों को स्कूल लाया जाएगा। एक समान शिक्षा प्रणाली भारत में कब से लागू होगी। शिक्षा के बाजारीकरण पर रोक कब लगेगी। विश्वविद्यालय कैंपस में जड़े जमाती राजनीति को कैसे दूर किया जाएगा। इन सवालों के सार्थक जवाब आए तो साक्षरता दर बढने के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे। इन सबसे अलग आए दिन होने वाली टीचर्स की हड़ताल, अध्यापकों का ट्यूशन के प्रति मोह भी शिक्षा व्यवस्था के लडख़ड़ाने का एक कारण है। शिक्षा व्यवस्था को बेहतर कर लिया जाए तो एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है। यह बात सही है कि अचानक कुछ नहीं होने वाला। आज शिक्षा व्यवस्था की खामियों को दूर करने का प्रयास शुरू करेंगे तब जाकर हमारी आने वाली पीढिय़ों को इसके सुखद परिणाम देखने को मिलेंगे। वरना यूं ही भारतीय प्रतिभाएं देश छोड़ती रहेगी और अपने सिस्टम को कोसती रहेगी।



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