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@dawriter

गुलटेन

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mrinal by  
mrinal

मालिक,चार सौ से ज्यादा हो गया है आपके यहाँ। दे दीजिए ना, बड़ा दिक्कत चल रहा है।

तड़ाक की आवाज़ से चाय दुकान पर बैठे सब लोग सहम से गये और गाल सहलाते हुये गुलटेन बाकी ग्राहकों को चाय देने लगा। अपना पैसा ही तो मांग रहा है, सम्राट जी दे दीजिए न पैसा। काहे गरीब का हाय ले रहे हैं।

बीच में टपकना जरूरी था। पंडित जी है, इसलिए इज्जत करते हैं। मुंह कम खोलिये, फायदे में रहिएगा। सम्राट सिंह ने बुलेट पर बैठते हुये कहा। बहुत मार खा लिये। अब और नही। चल जाएंगे बड़का सार के पास पंजाब। वहीं मज़दूरी कर लेंगे। गुलटेन का दर्द बहुत ज्यादा था।

थप्पड़ का टीस अभी भी बरकरार था। रात के ११ बजे थे लेकिन गुलटेन को नींद नही आ रही थी। अचानक गुलटेन, गुलटेन की आवाज़ सुनकर वह चौंक कर उठ बैठा। देखा तो सामने एक औरत थी। फिर पहचानने की कोशिश करता हुआ बोला, ठाठोपुर वाली मलकिनी आप! चले जाइये आप, काहे आये यहाँ ? सम्राट मालिक को पता लग गया तो चरसा टान देंगे हमरा। हजार रुपया है, रख लो। किसी को कहना मत। और हाँ, कोई जरूरत नही है गाँव छोड़कर जाने की। यहीं रहो, हम सम्राट को समझाएंगे।

नही मलकिनी, अब इस उमर में ये दर्द नही सहा जाता। हम चल जायँगे पंजाब। जमींदार घर के बेटी थे और जमींदार के घर में ही ब्याह हुआ। सम्राट के बाबूजी पहले कैसे थे, याद है न! तुमसे कुछ छुपा हुआ तो है नहीं। तुमसे कम्मो दर्द सहे हैं हम? इतनी देर से गुलटेन जो अपने आप पर काबू रखे हुये था, अब बिलख पड़ा। मलकिनी अपने घर की ओर लौट रही थी।



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