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@dawriter

खलनायिका

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swa by  
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कुछ चीजे हमारे जीवन में ऐसी होती हैं जो हमारे बस में नहीं होती। कुछ भी ऐसा जो हमारे जीवन में योजनाबद्ध तरीके से नहीं होता। अच्छी से अच्छी  योजना भी विफल हो सकती है किसी भी चीज को लेकर हो हम अपना भाग्य निर्धारित नहीं कर सकते हैं। पर कभी-कभी हमारे जीवन में ऐसा होता है जो हमने कभी सोचा नहीं होता हमारी सोच की दिशा से बिल्कुल विपरीत ।

 

गांव में रहने वाली शारदा ने कभी नहीं सोचा था कि वह एक दिन एक बड़ी वर्कशॉप की मालकिन बनेगी। या फिर उसकी शादी एक विदूर से होगी। हर लड़की शादी से पहले यही सपना देखती है की उससे भी उसके सपनों का राजकुमार मिलेगा ।लेकिन राजकुमार की परिभाषाएं अलग अलग होती है सब की नजर में ।लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि हम योजना बनाना बंद कर देते हैं । हम सोचना बंद कर देते हैं क्योंकि अगर सोच खत्म हो जाएगी तो जीवन भी शायद अर्थहीन हो जाएगा। हम चल पाते हैं क्योंकि हम योजना बनाते हैं। बिना योजना कि शायद हम एक कदम भी ना चल पाए। छोटे-छोटे कामों को हम भी योजनाबद्ध तरीके से करते हैं ।

 

शारदा  बहुत गरीब घर से थी लेकिन पढ़ने में बहुत अच्छी थी ।हमारे समाज की एक मान्यता यह भी है कि विदुर  विवाह कर सकता है लेकिन औरत के लिए उसे उतनी ही गलत नजर से देखा जाता है ।या फिर यूं कहिए उसको समानता का कोई अधिकार नहीं होता। मां बाप अपने सोच से चलते हैं  अच्छा पैसे वाला लड़का है   एक और मान्यता है लड़की की पसंद नापसंद को इतना ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता ।क्या उसको भी किसी ऐसे इंसान के साथ रहना पसंद है जो पहले अपना जीवन किसी और के साथ बिता चुका है या फिर किसी की दूसरी पत्नी होना पसंद है या नहीं ।इस बात  पर मां बाप ज्यादा गौर नहीं करते।

 

सिर्फ यही देखा जाता है कि अच्छा कामाता है या नहीं और उनकी इमेज के लिए अच्छा है बस ।लेकिन शादी हो जाने के बाद बहुत सी परेशानियां जिनसे वह होकर गुजरती है ।मैंने केवल सरला ही नहीं न जाने कितनी औरतों को देखा है जिनकी इस तरीके से शादी की गई और फिर यह भी आशा की गई कि खुश रहने के लिए और क्या चाहिए ?क्या सच में खुशियों का संबंध सिर्फ पैसे से ही होता है या फिर हर इंसान चाहता है हम उम्र अपने जैसा हमसफर ।लेकिन वह बोल भी क्या सकती थी ना ही अपने पैरों पर खड़ी है अभी तो ढंग से सोचने की उम्र भी नहीं है उसकी।

 

तो वह कैसे कह सकती है कि मैं ही शादी नहीं करूंगी क्योंकि उसके पास ये अधिकार ही नहीं है बोल इंसान तब सकता है जब वह अपने पैरों पर खड़ा होगा या फिर उसमें वह हिम्मत हो कि अगर मना भी किया गया तो वह उसका सामना कर सकता है। ज्यादातर मध्य वर्गीय परिवारों में समानता का कोई अधिकार नहीं होता ना ही लड़की के पास ना ही मां के पास ना ही दादी के पास औरत हर रूप में मजबूर होती है ।हां यह भी कह सकते हैं सभी जगह ऐसा नहीं होता लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत की 70% जनसंख्या गांव और कस्बों में रहती है और वहां की सोच क्या है ?दिल्ली में रहकर शायद हम इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकते।

 

पति को अपनाना उसके बच्चों को अपनाना उसके बच्चों को मां का प्यार देना जब वह यह भी नहीं जानती कि मां का क्या अर्थ होता है? यह सब इतना आसान नहीं होता किसी और की जगह अपना स्थान बनाना । जीवन में एक लड़की की  शादी किसी हम उम्र लड़के  से  होती है तो शायद लड़के का प्यार उसे अन्यास ही मिल जाता है । उसको परेशानी  बस इतनी होती है कि उसे ससुराल में अपने सास ससुर और जो भी रिश्ते हैं उनकी नजर में अपनी जगह बनानी है ।लेकिन जब किसी विदुर  से उसका विवाह होता है तो उसके आगे सबसे बड़ी परेशानी होती है कि उसे अपने पति और अपने बच्चों की नजर में भी जगह बनानी है। उसे साबित करना है कि वह भी एक अच्छी पत्नी है वह भी एक अच्छी मां बन सकती है ।

 

उसके बच्चों को वही प्यार दे सकती है जो उनकी मां ने दिया लेकिन जरूरी नहीं होता कि बच्चे भी  आपको अपनाना  चाहे ।आप कितने भी अच्छे हो कितना भी प्यार करें लेकिन जरूरी नहीं है बच्चा आपको अपनी मां माने।

 

ऐसा ही सरला के साथ भी हुआ बेटी को बहुत प्यार से रखा लेकिन वह नहीं रही उसके पास  ।भाग कर  दादी के पास ही आती थी सरला एक गंभीर  समझदार औरत  थी । लेकिन वह एक अच्छी मां नहीं बन पाई हमेशा उसने चाहा कि उसकी सौतेली बेटी (रिनी) उसके साथ रहे वह उसे  अच्छी शिक्षा दें लेकिन वह कभी उसे अपने पास रोक नहीं पाई।

 

मैंने कई बार रिनी  के मुंह से सुना था जब मैं बहुत छोटी थी और वह मेरी हम उम्र थी मुझे उससे काफी सहानुभूति थी कि उसकी मम्मी नहीं है ।लेकिन तब मैं यह बात नहीं समझती थी ।वह अक्सर ही अपनी सौतेली मां के बारे में बताती थी कि वह बहुत बुरी औरत है वह बहुत डांटती है इसलिए मैं उसके पास नहीं रहती दादी के पास रहती हूं। वह मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। ऐसी बातें वह हमेशा करती थी और यकीनन मैं उस का दर्द समझती थी । ऐसा कैसे हो सकता है कोई किसी और को अपनी मां कैसे मान सकता है ।

 

उस समय मुझ में जितनी समझ थी मैं सिर्फ उसी के हिसाब से सोचती थी और जो मेरे सामने है बस वही देखती थी इतनी समझ नहीं थी कि मैं दूसरे पहलू पर भी गौर करूं। फिर एक दिन एक पारिवारिक समारोह में मैंने सरला को देखा उसकी भूमिका मेरी नजर में एक khalnayak की थी बहुत बुरी औरत।  मैं उससे  दूर से बस घूर घूर कर देख रही थी तभी मेरी दादी ने बताया कि मेरी पोती है तो वो  मेरे पास आई उसने बड़े प्यार से मुझसे मेरा नाम पूछा ।उसके बाद उसने रिनी के बारे में पूछा कि वह कहां है मैं उसके लिए फ्रॉक लेकर आई हूं । तुम रिनी की सहेली हो। रिनी मेरी बातें करती है ।उसने मेरे बारे में बताया तो  मैं बस घूर-घूर कर उसे देख रही थी। मेरे मन में यह चल रहा था कितनी बनावटी औरत है मां नहीं है फिर भी जबरदस्ती मां बनने की कोशिश कर रही है ।

 

लेकिन आज मैं समझती हूं की मां बनने की कोशिश करना भी कितना मुश्किल होता है। जब सौतेले बच्चे तुम्हें अपनाना  ही ना चाहे तो आप सिर्फ एक खलनायक बनकर रह जाते हैं।

स्वाति गौतम



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