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@dawriter

क्या मौत ज़िन्दगी से ज्यादा खूबसूरत है?

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nidhi by  
nidhi

 

क्या मौत, जिंदगी से ज्यादा खूबसूरत है???

लेख का शीर्षक सबको नकारात्मक लग सकता है, लगना भी चाहिए।। आखिर मौत, ज़िन्दगी से ज्यादा खूबसूरत कैसे हो सकती है?? पर एक पहलू और भी है...

एक इंसान को जीते जी कभी कभी वो सम्मान या प्रेम नही मिलता जो अचानक मरने के बाद मिल जाता है।।

 

इस मुद्दे पर ज्यादा लिखू उसके पहले कुछ छोटी छोटी कहानियां नज़र में लाना जरूरी है...

पहली कहानी -

12 साल की सपना जिसके पिता माली हैं , कृष्ण जन्माष्टमी पर फूलों से भगवान का झूला सजाना चाह रही थी..घर में तो फूल थे नहीं तो पास में रहने वाले सेठ जी के घर पहुँच गयी जहाँ उसके पिता काम करते थे... यूं तो इस उम्र के कई बच्चे फूल चुरा कर भ ले जाते थे .. लेकिन सपना का दिल चोरी करने को राज़ी नही हुआ..।।

सपना- काका कुछ फूल चाहिए।।

सेठ जी ( जो अंदर से पान चबाते आ रहे थे) - नहीं है फूल ।।

सपना - ये लगे तो हैं।( एक नजर बगिया को देखती हुई सपना बोली)

सेठ जी - तो हम क्या बिना फूल के पूजा करेंगे ..चल निकल यहां से ।।

आंसू टपकाती सपना वहां से चली गयी.. अगले दिन जहरीले सांप के डसने से सपना की म्रत्यु हो गयी।।

आज उन्ही सेठ जी के घर के फूल सपना से लिपट लिपट कर रो रहे थे.. कैसी विडम्बना थी जिन फूलों के लिए उसका फूल सा नाजुक दिल टूटा था.. मरते ही उसे वही फूल अपनेपन का एहसास दिला रहे थे।।

दूसरी कहानी -

घनश्याम काका रामपुर की जानी मानी शख्सियत थे.. जहाँ भी जाते आस पास लोगों का हुज़ूम लग जाता.. पर 70 पार की उम्र और दुर्घटना में एक पैर खो देने के बाद से वो गाँव में ना के बराबर निकल पाते। काका कई महीनों से अकेलेपन का बोझ अपने अपाहिज पैर के साथ झेल रहे थे। उनके करीबी पवन काका कभी कभी उनसे मिलने आ जाते थे पर इस महीने पवन काका रोज वक्त निकाल कर जाने की सिर्फ सोचते रहे... और उधर घनश्याम काका एक रात हृदयगति रुक जाने की वजह से सबको अलविदा कह गए.. सुबह खबर मिलते ही पवन काका सब काम छोड़कर उनसे मिलने पहुंचे ..पर उनकी लाश कैसे शुक्रिया करती उनके आने का ?? पवन काका पूरी जिंदगी अफ़सोस में रहेंगे की काश वक्त निकाल लिया होता।। अकेलेपन के शिकार घनश्याम काका को मरते ही सैकड़ो लोगों का साथ, अपनापन और प्रेम सब हासिल हो गया।।।

तीसरी कहानी-

गाँव में रहने वाले एक पिता रोज, अपने शहर में रहने वाले बेटे को गांव मिलने आने की बात कहते पर बेटा ऑफिस में बिजी हूँ कहके बात टाल देता।। प्यार से समझाता की मेरा कमाना हम सब के लिए बहुत जरूरी है।। पर पिता का दिल नही माना और ट्रेन की टिकट कराकर बेटे से मिलने निकल गए।। पर रेल दुर्घटना में वो काल में समा गए।। बेटा सारी कमाई का जिम्मा छोड़ पिता के पास पंहुचा और उनके मृत शरीर को सीने से लगाकर बहुत रोया।। पर पिता मरने के बाद अपने बेटे के करीब थे।।।

 

ये कहानियाँ हमे एहसास दिलाती हैं की वक्त किसी का इंतज़ार नहीं करता... क्या हम इतने व्यस्त है की हम अपनों को समय ना दे सकें?? जो हम मर चुके व्यक्ति के लिए करते हैं ( समय देना, मिलने जाना,फूल देना, सम्मान देना, उसे याद करके उसकी सराहना करना) क्या जीवित व्यक्ति के लिए नहीं कर सकते???

किसी को एक फूल देकर उसकी मुस्कुराहट की वजह नहीं बन सकते? किसी अपने से बेवक्त, बेवजह मिलने नही जा सकते?? क्या दिलखोल कर हम किसी अच्छे की तारीफ नहीं कर सकते? किसी बूढ़े व्यक्ति को अपनापन देना ... क्या ये सब हमारी जीवन शैली का हिस्सा नहीं बन सकता???

 

इस स्पर्धा से भरे युग में क्यों हम छोटी छोटी खुशियाँ नहीं बाँट सकते?? क्यों हम सिर्फ वही करते हैं जिससे हमे ख़ुशी या सन्तुष्टि मिले?? क्यों हम अपना अहम् अलग रखकर किसी को खुदसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते?? क्यों किसी तारीफ के हकदार की द्वेष में आकर तारीफ नहीं कर सकते?? क्यों जो हमारी हमेशा मदद करते हैं हम उन्हीं का फायदा उठाते हैं??

 

क्यों एक लाश बन चुके शरीर पर मोहहब्बत लुटा सकते हैं पर एक भावनाओं से पूर्ण जीवित व्यक्ति पर नहीं ?? क्या है जो हमे रोकता है खुलकर अपनी भावनाए ,प्रेम,अपनापन,गुस्सा दिखाने के लिए??

कौन सी बेड़िया हैं हमारी रूह के भीतर जो हमे जकड़े रहती हैं??

 

क्यों हम किसी की मौत को खूबसूरत बनाये जबकि हम किसी की जिंदगी खूबसूरत बना सकते हैं???

ये मेरे निजी विचार है आप में से कुछ की असहमति लाज़मी है उसका स्वागत भी है।।।।


#निधि खरे #बस यूँही



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