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@dawriter

कैसी भूल..

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हर लड़की चाहती है,अपने सपनों की ससुराल। कहते है कि कि आजकल की लड़कियाँ संयुक्त परिवार में रहना पसंद नहीं करती है,पर शिक्षा एक अपवाद थी। उसनें अपनें ससुराल के लिए जो सपने देखें थे,उसमें एक यह भी था कि परिवार के सभी लोगों के साथ मिलजुल कर रहेगी।

एक दिन उसके लिए एक रिश्ता आया,लड़का शिक्षा के लिए बिल्कुल उपयुक्त था। दोनों ने एक दूसरे को पसंद कर लिया। परिवार बाद में शिक्षा को देखने आया,क्योंकि उनके लिए लड़के की सहमति पहले अनिवार्य थी। ग्रामीण इलाके का परिवार था, जो नौकरी के कारण शहर में आ बसे थे। शिक्षा को लगा जैसे उसका परिवार है, वैसा ही इनका है, क्योंकि वे भी ग्रामीण परिवेश से ही थे। पर पढ़ाई लिखाई के कारण नयें तौरतरीको को अपना चुके थे। लिहाजा शिक्षा को कोई संशय न हुआ।

तय समय पर शिक्षा का विवाह उनकी हैसियत अनुसार उसके पिता ने किया। वे दहेज और अन्य प्रथाओं के सख्त विरोधी थे। बेटी की उच्च शिक्षा को ही वे अपना सबसे बड़ा धन मानते थे। इसी विचारधारा के साथ अपनी बेटी की विदाई की।

वह जब अपने ससुराल गई तो पहले पहल नई बहू को जो लाड़ किए जाते है। काम नहीं करवाया जाता। घूंघट में रखा जाता है। वह उससे भी करवाया गया। उसे लगा कि मुँह दिखाई की रस्म के बाद उसका घूंघट खोल दिया जाएगा। यद्यपि उसकी नजरे हाथभर का घूंघट किए अपनी जेठानी पर बार-बार चली जाती थी। कुछ दिन ऐसे ही बीते। उसने अपनें पति अग्रिम से इस विषय पर चर्चा की तो उसने यह कहकर टाल दिया कि रहने दों तुम्हें यहाँ कितनें दिन रहना है तुम तो मेंरे साथ भोपाल चलने वाली हो।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चला। एक दिन उसे परिवार सहित एक विवाह के प्रीतिभोज में बुलाया गया। आज शिक्षा का सामना यहाँ की असली दुनिया से होने जा रहा था। जहाँ तक नजर जाती थी हर तरफ घूँघटों से ढकें चेहरे नजर आते थे। वे महिलाएँ मर्दों को अपनी तरफ आता देख बहुत अजीब तरीके से सिहर उठती थी। आज शिक्षा भी इन्ही का हिस्सा बनकर रह गई थी। वह शिक्षा जो ऐसी ही कितनी औचित्यहीन प्रथाओं की विरोधी थी।

सभी महिलाओं को पंक्तिबद्ध कर बैठाया गया। उन्हें भोजन परोसा गया। अब शिक्षा की असली परीक्षा थी,उसे भी अन्य महिलाओं की तरह आधे हाथ का घूंघट कर भोजन करने को कहा गया। शिक्षा जब से यहाँ आई थी उसे लगता था कि वह कोई बुरा सपना देख रही है। उसने कितनी ही चेष्टा की पर वह इस तरह भोजन वह कर हीं नहीं पाई। यह भी वह समझ गई थी,कि ऐसे में कोई भरपेट भोजन कैसे कर सकता है।

यहाँ ऐसा रिवाज था कि महिलाएँ अपना मुँह किसी आदमी के सामने भोजन के लिए भी नहीं खोल सकती थी। उन्हे मुँह ढंककर ही खाना है,भले ही वह भूखी रह जाए। इस कोशिश में शिक्षा का घूंघट कितनी ही बार नीचें गिरा। उसकी सास ने तो वहीं पर अभद्र भाषा में तानों की बौछार कर दी। जिसकी झलक शिक्षा को घर पर मिल गई थी। जब वह उसकी जेठानी को कोस रहीं थी।

घर आकर उसकी हम उम्र ननद जो कि ग्रेजुएट थी और जिससे शिक्षा को काफी उम्मीदें थी। उसने रही सही कसर पूरी कर दी। उससे शिक्षा को ऐसी उम्मीद न थी। वहाँ तो अधजल गगरी छलकत जाए वाली बात हो गई। वह खुद घूंघट की महिमा का बखान किए जा रही थी।

अब शिक्षा को ऐसा लगा कि वह भूमि में धंसी जा रही है। वह रोती हुई अपने कमरें में चली गई। कितनें धनाढ्य परिवारों को छोड़ कर उसनें यह परिवार चुना था। क्या गलती हुई थी उससे?उसे अपने दीयें की लौ बुझती हुई दिखाई दे रही थी। जिसमें तेल डालने वाला कोई ना था। वह मन ही मन सोच रही थी,आखिर भूल वास्तव में कहाँ हुई थी। मन ही मन अपनी लिखी कविता की पंक्तियांँ उसे याद हो आई।

"दिखाईं नहीं देती,पर एक अनजानी पिंजरे की दीवार है। मन का पंछी व्याकुल होकर उड़नें को तैयार है। "



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