0
Share




@dawriter

उम्मीदों की कश्ती-७

0 38       
abhidha by  
abhidha

बर्फीले तूफ़ान के गुज़रते ही हमने अपनी चढ़ाई शुरू की। अब धीरे-धीरे जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे हमें ऑक्सीजन की कमी महसूस रही थी परन्तु अलख में पता नहीं कहाँ से एक नयी ऊर्जा का संचार हो गया था, ऐसे लग रही थी जैसी सात साल पहले मैंने उसे देखा था। अपने अनुभव बांटती जा रही थी। एक बार हम फँस गए तो उसके अनुभव की वज़ह से ही निकल पाए, नहीं तो द एन्ड हो जाना था। हम कभी ट्रेकिंग करते चलते तो कभी रस्सियों के पुल बनाकर उस पर चढ़ते और सबसे आगे चलती अलख।

               आखिर कई दिनों के लम्बे सफ़र के बाद हम महज़ 60 फिट दूर थे एवरेस्ट से। हमने अपने टेंट लगा लिए। रात को मैगी खाकर मैं सोने ही जा रहा था कि अलख मेरे टेंट में आ गई। मेरे बगल में बैठ गयी उसका चेहरा उतरा हुआ था।मैंने उसकी ओर देखा तो उसने कसकर मेरे हाथों को थाम लिया और कहने लगी- बहुत डर लग रहा है, कहीं उस बार की तरह इस बार भी... यही वो जगह थी जहाँ दो साल पहले... बस इतना ही कहा था उसने कि मैंने अपनी उँगलियाँ उसके होंठों पर रख दीं और उससे कहने लगा-

   दूर गगन में चमकता हुआ

    कई राज़ खुद में लपेटे हुआ

कितना खामोश है आज चाँद

 

कल रात जलते अंगारों ने जीभ जला दी है।।

        कुछ देर हम दोनों एक दूसरे को देखते रहे,उसके बाद मैंने उसे सो जाने के लिए कह दिया। वह चली गई उसके बाद मैंने बोतल निकाली और नीट ही लगा गया। सर्दी के मारे हालत ख़राब थी और साथ ही ऐसा बहुत कुछ था जो मेरे अन्दर जल रहा था, जिसे मैं बुझने देना नहीं चाहता था।

          अगली सुबह 5 बजे अलख ने मुझे जगाया बाहर अँधेरा था। मैं बाहर निकला तो कहने लागु- छी मेरे जाने के बाद पी थी तुमने। मैं हँसते हुए कहने लगा- तुमने बताया नहीं कि तुम भी पीती हो,नहीं तो खूब जमता रंग, जब मिल बैठते तीन यार... अलख ने कहा ज़ल्दी करो, चलो नहीं तो देर हो जाएगी।

           हम चल दिए अपने अंतिम पड़ाव की ओर अलख सबसे आगे चल रही थी।उसे देख मैं सोच रहा था, कुछ ही देर में इसके सपने पूरे हो जायेंगे पर मेरे सपने... वो तो शायद कभी नहीं... कहकर मैंने गहरी साँस ली ही थी कि देखा बस एक कदम और...अलख का सपना पूरा हो गया था। अलख अपने हाथों में तिरंगा लेकर एवरेस्ट पर फहरा रही थी,हम सब अपने राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दे रहे थे। उसके बाद हमारे दल में जितने भी सदस्य थे, सबने अलख को और उसके हौसले को सलामी दी। मैं जब अलख की ओर देख रहा था, तब मैंने देखा ध्वज फहराते समय सूरज की पहली किरणें सबसे पहले उसके चेहरे पर पड़ीं,ऐसा लगा मानो आज सूरज भी अपनी इस बहादुर बेटी का माथा चूमने आया हो।अलख के चेहरे और आँखों पर अलग ही ख़ुशी थी,वह पागलों की तरह कूद रही थी, जैसे हम सब कूदते हैं जब हमारा कोई सपना पूरा हो जाता है।

           तेज़ हवाओं की सरसराहट और बिल्कुल सर के ऊपर आसमान, मन तो किया कि मैं भी आज एक पत्थर उछाल ही देता हूँ,देखता हूँ आसमान में सुराख़ होता है या नहीं।इस खूबसूरत नज़ारे को अपने कैमरे और आँखों में हमेशा-हमेशा के लिए कैद कर लिया था मैंने। अब वक़्त आ गया था हमारे लौटने का। हम सब जब एवरेस्ट से विदा लेने लगे तो अलख की आँखों में आँसू थे उसने एवरेस्ट को चूमते हुए कहा- 'अलविदा एवरेस्ट अब शायद कभी न मिलें'।

             हम लोगों ने नीचे पहुँच कर अपना टेंट लगाया तो सबको पता चल गया था कि अलखनंदा जोशी ने इस बार सबसे पहले अपना ध्वज फहराया है।वहाँ एक समिट और था... मोहित का...

 हम अलख की जीत की ख़ुशी बाँट ही रहे थे कि तभी मोहित आ गया।उसने अलख को बधाई देते हुए, जब उससे उसके पैर के बारे में पूछा तो अलख कहने लगी- आज इतने सालों के बाद याद आ रहे हैं तुम्हें मेरे पैर।थोड़ी देर चुप रहने के बाद अलख बोली- आज किस्मत मुझ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है।मैं तुम्हारी हमेशा अहसानमंद रहूंगी मोहित जो तुमने मेरे साथ किया उसके लिए।अगर तुम वो सब नहीं करते तो शायद मेरा ये सपना कभी पूरा नहीं हो पाता। जो होता है अच्छे के लिए ही होता है।तुमने सही कहा था रिश्ते हमेशा बराबरी में ही होते हैं और हमारा रिश्ता टूटा इस वज़ह से नहीं क्यूंकि मैं लंगड़ी थी बल्कि इस वज़ह से क्यूंकि तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की सोच लंगड़ी थी।

तुम जो ये सबसे कहते फिरते हो न कि अलखनंदा जोशी तुम्हें चाहती है, आज के बाद कहना बंद कर देना क्यूंकि इतने सालों के अकेलेपन में मैंने प्यार को बहुत गहराई से समझा और महसूस किया तो मुझे पता चला कि मैंने तो तुमसे कभी प्यार किया ही नहीं था और उस समय मुझे जो दर्द और तकलीफ थी वो तुमसे रिश्ता टूटने या धोखे की नहीं बल्कि अपने सपने के टूटने की थी। इस बात का अहसास मुझे आज हुआ जब मैं एवरेस्ट पर थी कि मुझे अब और कोई गम नहीं।मुझसे बस इतनी गलती हो गयी थी कि मैंने तुम्हें वही समझा जो तुम दिखा रहे थे मुझे, पर तुम्हारी असलीयत तो कुछ और ही थी, बहुत ज्यादा दिनों तक आदमी चेहरे पर नक़ाब लगा कर नहीं जी सकता। मुझे आज इस बात की तसल्ली है कि अब जो लोग मेरी ज़िन्दगी में हैं वो मुझे मेरी टांगों के बिना भी अपनी बराबरी का ही समझते हैं। मोहित कुछ कहने जा रहा था कि अलख ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया।

            मैं भी अपने टेंट पर आ गया सारी रात बस इसी उलझन में कटी कि अब मेरा और अलख का साथ बहुत कम दिनों का है मैं उसके साथ बिताये अपने हर लम्हे को कैद करता जा रहा था। धीरे-धीरे हम कुछ दिनों में नीचे उतर आए। अलख ने वापस गंगटोक जाने की ख्वहिश ज़ाहिर की तो कर्नल साहब ने पद्मा और तृप्ति जी को भी वहाँ पहुँचने को कह दिया।

 हमारे पहुँचने से पहले वो दोनों घर को व्यवस्थित कर रहीं थीं, साथ ही अपनी बेटी के जीत के जश्न की तैयारियां भी कर रही थीं। हम जैसे ही गंगटोक पहुँचे अलख अपनी बाहें फैलाये वहाँ की खुशबू और ठंडक को अपने अन्दर समा लेना चाह रही थी। घर पर हम सबका स्वागत हुआ।

                अगली सुबह अलख ने मेरे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया और मेरे साथ दूरबीन से एवरेस्ट को देख रही थी। उसे अपने इतने करीब कभी महसूस नहीं किया था मैंने। मेरा हाथ थाम कर मुझे उन झरनों के नीचे खींच कर ले गयी जहाँ वो कश्तियाँ बहाती थी। आज भी उसके हाथों में दो कश्तियाँ थीं। झरने का ठंडा पानी फुहारों की तरह अलसाई सी सुबह में हम दोनों को भिगो रहा था। चट्टान पर मेरा हाथ पकड़कर बैठते हुए बोली- मेरी मोहित के नाम से नफ़रत मुझे समझ आती है पर तुम्हें क्यूँ नफ़रत है इस नाम से?

                मैंने उसकी ओर देखा और कहने लगा- मोहित मेरा बचपन का दोस्त है, बचपन की छोटी-छोटी शरारतों के साथ जवानी में कॉलेज में हमने साथ में बहुत मस्ती की थी। सब कुछ बहुत अच्छा था हम दोनों की दोस्ती में पर पता नहीं कहाँ से उसने ज़िद पकड़ ली मेरी बहन से शादी की। दोस्त वो बहुत अच्छा था पर इतना अच्छा इंसान नहीं था कि मैं अपनी बहन की शादी उससे करवा देता। मैं इस रिश्ते के खिलाफ़ था पर मेरी किसी ने सुनी नहीं, मोहित का रिश्ता मेरी बहन से तय हो गया पर फिर कुछ महीनों बाद कोई और मोहित की ज़िद बन गया। मोहित घर आया और बिना मुझसे बात किये घर पर अंगूठी लौटा कर चला गया। उस दिन मेरे दिल से एक बददुआ निकली पर लग किसी और को गई। मोहित वापस लौट आया, माफ़ी माँगी सबसे और सबके न मानने पर उसने मेरी बहन के साथ कोर्ट में शादी कर ली।मैंने जब उस लड़की के बारे में पता किया अलख तो मालूम पड़ा एक और बार उसने मेरे पीठ में छुरा भोंका था, जिस लड़की के बारे में मेरा पूरा कॉलेज जानता था कि मैं उसे चाहता हूँ, उसके साथ ही मोहित ने सगाई की और एक हादसे में उसके पैर चले जाने पर उसके मुश्किल वक़्त में उसे उम्र भर का दर्द देकर उसने मेरी बहन से शादी कर ली, मुझे नफरत है अलख उससे। हम दोनों एक ही इंसान से नफरत भी करते हैं अलख। तुमने मुझे एक दिन वो कविता सुनाई थी न और कहा था किसी मोहित ने लिखी थी। वो मोहित मैं था अलख, 7 साल पहले तुम्हारे लिए लिखी थी मैंने वो कविता-

 होंठों का तकल्लुफ रहने दो, बस आँखों से ही बात  करो।

मैं कल भी तुम्ही पे मरता था,तुम आज तो ये इकरार करो।।

इजहार-ए-मोहब्बत की अपनी हम क्या सुनाएँ दास्ताँ।

एक टूटा दिल डूबी कश्ती वीरां बस्ती और मुर्दा ज़हान।।

कुछ तुम भी अपनी बात करो कुछ तुम भी अपना हाल कहो।

यूँ बुत बनकर क्यूँ बैठी हो तुम आज तो ये इकरार करो।

 

तुम आज तो ये इकरार करो। मैं चुप था, आँखें बस छलकने ही वाली थीं कि अलख ने अपने हाथ बढ़ाकर आँसू पोंछ दिए और मुझसे कहने लगी मुझे माफ़ कर दो, मुझसे तो मोहित ने... अपनी शादी का... मैंने उसके होंठों पर अपने हाथ रख दिए और उससे कहने लगा-  बहुत अच्छे से जानता हूँ मैं उस कमीने को, गलती मेरी है जो मैं उसकी गलतियों को नज़रंदाज़ करता गया। मैंने अलख का चेहरा अपने हाथों में पकड़ लिया और कहने लगा-

     मैं परसों जा रहा हूँ अलख, उसकी आँखें भर आई थीं।मैंने पोंछते हुए कहा- मेरा सच न तुम्हारे परिवार वाले अपना पाएँगे और न ही तुम्हारा मेरे घरवाले, इसलिए अपने बीच के इस रिश्ते को हम यहीं ख़त्म कर देते हैं अलख। उसकी आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे और मुझे पता नहीं चला, कब मेरी आँखों से भी सैलाबफूट पड़ा था। रोते-रोते अलख मेरे गले से लग गई,मेरी पूरी शर्ट भीग चुकी थी। थोड़ी देर बाद मैंने उससे कहा- अब हमें घर चलना चाहिए तो दो कश्तियाँ निकालते हुए बोली- चलो इसको बहाते हैं। हम दोनों ने मिलकर कश्तियाँ बहाई और जब चलने लगे तो अलख ने मेरे हाथों को थाम लिया और कहने लगी कुछ दूर तो साथ चल सकते हैं न हम... मैंने मजबूती से उसके हाथों को थामते हुए कहा-'बहुत ज़रूरी है ज़िन्दगी में कुछ ख्वाहिशों का अधूरा रह जाना...'

क्रमशः

उम्मीदों की कश्ती- अंतिम भाग

                                            अभिधा शर्मा।।



Vote Add to library

COMMENT