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@dawriter

उम्मीदों की कश्ती-६

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अगली सुबह से हम लोग अलख के अंडर ट्रेनिंग में थे। कर्नल साहब आर्मी में थे और मैं खुद भी एक बार एवरेस्ट की आधी चढ़ाई चढ़ चुका था इसलिए हमें कोई परेशानी नहीं होती। अलख के नए पैरों की वजह से उसे पहले छोटे-छोटे रास्तों पर ट्रैकिंग करवानी थी जिससे उसके पैरों को पहाड़ी रास्तों की आदत हो जाये।

         हमने पहले दिन गोविन्दघाट से घांघरिया तक ट्रैकिंग की थोड़ी मुश्किल हुई उसे पर उसने हौसला नहीं हारा, हम भी उसका मनोबल बढ़ाते धीरे-धीरे चल रहे थे। अगले दिन हम घांघरिया से वैली ऑफ़ फ्लावर्स की ट्रैकिंग पर गए। पहाड़ी रास्तों पर हमारा सामना कई बार लकड़बघ्घों से भी हुआ पर कर्नल साहब साथ थे तो कोई परेशानी नहीं हुई। नाक पर मास्क पहन हम जैसे ही फूलों की घाटी में दाखिल हुए मेरे मुँह से अचानक निकल पड़ा, आज से पहले इसे कभी क्यूँ नहीं देखा मैंने। लोग तो कश्मीर को जन्नत कहते हैं पर ये तो उससे भी कई गुना ज्यादा अच्छा है।

            हम धीरे-धीरे अन्दर की ओर बढे तो अलख ने बताया जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो इन घाटियों में वापस वनस्पति बनना शुरू हो जाती है और जुलाई के माह तक पूरी घाटी फूलों से भर जाती है। अभी तक मैंने सिर्फ तस्वीरों में ही देखा था इसे। मैं अपने दोनों हाथ पसारे इस घाटी की याद को अपने में समा लेना चाहता था।घाटी की सारी खूबसूरती देखने के बाद, जब मेरी नज़र अलख पर गयी तो मानो ठहर गयी। वो पहाड़ों से कल-कल की ध्वनि कर बहते झरने के पास ठण्ड में भी अपने चेहरे पर ठन्डे पानी के छींटे मरते हुए उस पानी के साथ खेल रही थी।मुझे पता ही नहीं चला,जाने कितनी देर तक मैं उसे इस तरह खेलते देखते बैठा था,साथ ही अपने कैमरे में उसे कैद भी कर रहा था।अभी कैमरा लेकर पलटा ही था कि मेरी नज़र कर्नल साहब पर पड़ी, वे मुझे घूर रहे थे और शायद बहुत कुछ मुझसे जानना चाहते थे, मैंने वहाँ से भागने में ही अपनी भलाई समझी।

          अलख के पास जब मैं पहुँचा तो मन ही मन सोच रहा था क्या किस्मत है मेरी,जो मैं इन फूलों से भरी वादियों में अलख के साथ हूँ।मैं आज उससे सब कुछ कहना चाहता था पर कर्नल साहब के डर से कुछ नहीं कह पाया। मुझे देख अलख बोली- यहीं आये थे हनुमान जी संजीवनी बूटी की खोज में। मैं बस मुस्करा कर रह गया। रात हमने घांघरिया में एक रेस्ट हाउस में बितायी। रात के सन्नाटे में घाटी से आ रही जानवरों की आवाजें गूँज रही थी।

            अगली सुबह हम हेमकुंड साहब जी के लिए चल पड़े। ये चढ़ाई अलख के लिए किसी चुनौती से कम नहीं थी, चलते-चलते उसके पैरों में दर्द हुआ तो मैंने जब लौटने का कहा तो कर्नल साहब ने अलख का हौसला बढाया और सारे रास्ते उसके हाथों को थामे चलते रहे। उस वक़्त मुझे दोनों बाप-बेटी का रिश्ता समझ आया था। कर्नल साहब को अपनी बेटी की काबलीयत पर पूरा भरोसा था साथ ही डर था उन्हें, कहीं उसके सपने टूट न जायें पर अब जब वो खुद अपनी बेटी का साथ दे रहे थे तो मुझे एक विश्वास हो गया था कि अलख के सपने पूरे ज़रूर होंगे।

             हम हेमकुंड साहब पहुँच गए। ठण्ड इतनी थी कि दांत किटकिटा रहे थे पर मान्यताओं के हिसाब से मैंने और कर्नल साहब ने उस कुण्ड में डुबकी लगायीऔरकंपकंपाते हुए गुरूद्वारे आ गए।वहाँ दर्शन करते समय हम तीनों एक ही प्रार्थना कर रहे थे अलख की कामयाबी की।कुछ देर रुक, हम जब वापस लौटने लगे तो हमारे सामने बहुत बड़ी मुश्किल थी।अलख के लिए जितना मुश्किल वहाँ चढ़ना था, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल था वहाँ से उतरना। मैंने और कर्नल साहब ने जब उसे सहारा देना चाहा तो उसने मना कर दिया। एक बार गिरी भी,हम जैसे ही उसे उठाने लगे तो कहने लगी- एवरेस्ट चढ़ना है न मुझे तो गिर कर खुद को संभालना सीखने दो मुझे। हम धीरे-धीरे वापस आते जा रहे थे और अलख को खुद अपनी मदद करते देख, हमें ये समझ आ गया था कि उसका हौसला भी धीरे-धीरे वापस आ रहा है।

             कुछ महीनों के इसी तरह अभ्यास के बाद अब हमें निकलना था एवरेस्ट के लिए। मैंने पहले से सारी अनुमति ले रखी थी अब हमारा फिजिकल टेस्ट होना था। मुझे डर था कि कहीं अलख को जाने से रोक दिया उन लोगों ने तो...

                     हम सब दिल्ली...दिल्ली से नेपाल पहुँचे।अलखनंदा जोशी, ये नाम सुनते ही चयन समिति ने अलख की ओर देखा और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले- घबराओ मत ये तुमसे ज़रूर होगा।

             मैं,अलख और कर्नल साहब हम तीनों ही उन 300 लोगों में से थे जिन्हें इस साल एवरेस्ट पर चढ़ने की अनुमति मिली थी। हम शेरपाओं के साथ अपने काफिले को साथ लेकर कुम्भु की ओर बढ़े।वहाँ पर पहुँचकर अलख का सामना मोहित से हुआ।कर्नल साहब, अलख और मैं हम तीनों ही उसके सामने थे।वह हमारे पास आता कि उससे पहले ही हम अपने टैन्ट्स में चले गए। अगली सुबह, हम बेस कैंपपहुँचे,वहाँ शेरपा के परिवारों से मिले और एवरेस्ट पर चढ़ने से पहले, पूरी समिट ने पूजा की अपनी कामयाबी के लिए।कई बौद्ध मठ देखे हमने।बौद्ध मठों को देख मन से बस यही एक आवाज़ आ रही थी- 'बुद्धं शरणम् गच्छामि','संघं शरणम् गच्छामि','धम्मम शरणम् गच्छामि'। मन में इसी शांति के भाव लिए अगली सुबह,हमारा दल चढ़ाई के लिए तैयार था। निकलने से पहले अलख दूरबीन से एवरेस्ट की चोटियों को देखने की कोशिश कर रही थी। मैं जब वहाँ पहुँचा तो मुझे भी दिखा रही थी। मैं भी उत्साह से देख रहा था।अलख और मैं दोनों इस बात से अनजान थे कि मोहित की नज़रें हम पर थीं। कर्नल साहब ने आते ही जैसे कहा- ये क्या हो रहा है? मैंने अलख की ओर बढ़ाये अपने क़दमों को पीछे खींच लिया। अलख अपने पापा को अब एवरेस्ट की चोटियाँ दिखा रही थी।

            कुछ देर बाद हम अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ गए। अलख की हालत के बारे में हमने शेरपाओं को जब बताया तो वो कहने लगे हम जानते हैं उसके बारे में। यहाँ एक बार घायल हो जाने के बाद कोई वापस दोबारा चढ़ने की उम्मीद से नहीं आता तुम आई हो तो हम सब तुम्हारा पूरा साथ देगा। धीरे-धीरे उसके क़दमों से कदम मिलाते हम चल दिए।एक रात हम टेंट 1 में गुजारते तो अगली रात हम कुछ दूर और आगे बढ़कर टेंट 2 में बिताते। कई बार ख़राब मौसम की वजह से हमें ट्रेकिंग रोकनी पड़ती।

               कई दिनों की यात्रा के बाद अलख के पैरों में एक रात बहुत दर्द हुआ कर्नल साहब ने मुझे आवाज़ दी। मैं अपने टेंट से भाग कर अलख के टेंट में पहुँचा। वो दर्द से चीख रही थी,आज चढ़ते समय उसके दायें पैर में मोच आ गयी थी।बाकी के लोग भी अपने टेंट से निकल आये थे।बाहर बर्फ़बारी थी,कर्नल साहब ने मुझसे जब लौट चलने को कहा तो मैं तैयार हो गया। अलख ने मेरा हाथ पकड़ कर रोका और कहने लगी- कितने पैसे लगे हैं तुम्हारी कंपनी के इसमें। मैंने कहा उसकी चिंता तुम मत करो अलख, तुम अपना स्वास्थ्य देखो, हम लौट चलेंगे। अलख ने मुझसे जिद की तो मैं कहने लगा 1,80,000 डॉलर।

               अलख ने मेरी ओर देख कहा और अगर हम कामयाब नहीं हुए तो सब तुम्हें लौटाना होगा। मैं चुप था तो अलख ने मेरी ओर देखकर कहा- मुझ लंगड़ी के लिए तुमने इतना जोखिम क्यूँ उठाया? मैंने गुस्से में उससे कहा-ख़बरदार जो खुद को लंगड़ी समझा तो।कर्नल साहब उसका सर सहला रहे थे मैं उसके पैरों के पास बैठ गया और उससे कहा एक कहानी सुनोगी अलख...

          उसने दर्द में हँसते हुए कहा- हाँ सुनाओ,मैं कहने लगा- 'तुमने अरुणिमा सिन्हा का नाम सुना है।' अलख ने कहा सिर्फ सुना नहीं उनसे मिली भी हूँ मैं। मैं कहने लगा- 'तुम्हें पता है कि वो वॉलीबॉल की नेशनल प्लेयर थी,एक बार जब वह लखनऊ से दिल्ली जा रही थी, कुछ लुटेरों ने लूट में नाकाम होने पर उन्हें ट्रेन से फेंक दिया था।उनका एक पैर कट गया था और दुसरे पैर पर लोहे की छड़ डली थी। हॉस्पिटल से ठीक होते ही उसने एक सपना देखा था और वो था एवरेस्ट पर जीत हासिल कर भारत का झंडा फहराने का। बछेंद्री पाल जी की मदद से और उत्तरकाशी में कई महीनो की ट्रेनिंग लेकर, 53 दिनों में उन्होंने एवरेस्ट पर जीत हासिल की थी अलख और वो पूरे विश्व में पहली भारतीय महिला हैं जिन्होंने प्रोस्थेटिक लेग के साथ एवरेस्ट पर जीत हासिल की थी।

            अलख ने मुस्कराते हुए कहा- 'सुनो'हम वापस तब तक नहीं जायेंगे जब तक हम एवरेस्ट पर न पहुँच जाएँ और हाँ एक बात और इस समिट में सबसे पहले एवरेस्ट पर झंडा मैं ही फहराऊंगी। कर्नल साहब का हाथ पकड़ बोली पापा इतनी दूर आकर खाली हाथ नहीं लौटना मुझे।

उम्मीदों की कश्ती-७

क्रमशः

                                                अभिधा शर्मा।।



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