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@dawriter

उम्मीदों की कश्ती-५

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abhidha by  
abhidha

सारी रात मुझे नींद नहीं आई। देर रात मैं उठकर कागज़ पर कुछ लिखकर कश्तियाँ बना रहा था। अगली सुबह मैं झरने की ओर भागा देखा तो अलख नहीं थी। सूर्य की किरणे पहाड़ी के चारों ओर धीरे-धीरे फ़ैल रही थीं। अलख की तरह आज मैं भी अपने दोनों हाथों को फैलाकर सूर्योदय को अपने अन्दर और अपनी ज़िन्दगी में एक नए सवेरे को महसूस कर रहा था।अलख नहीं आई, मैं बहुत देर तक उसका इंतज़ार करता रहा। बारिश के शुरू होने पर मैं चट्टान की ओट में खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद मैंने अपनी जेब से अपनी उम्मीदों की कश्तियाँ निकाली,देखा तो हाथ में चार ही कश्तियाँ थी,एक मैं कहीं गिरा आया था। एक-एक कर मैं अपनी कश्तियाँ बहाते जा रहा था और वो कमबख्त़ झरने के पास पहुँचने से पहले ही अटक जा रही थीं।मेरा सारा विश्वास एक ही पल में डगमगाने लगा,मेरी कश्तियाँ नहीं बहीं इसका मतलब मेरी ख्वाहिशें अधूरी रह जायेंगी।मैं वापस जाने के लिए मुड़ा और बस चट्टान तक हीपहुँचा था कि मेरे मन में आया कि मैं ऐसे उसे सिसकता,घिसटता छोड़कर नहीं जा सकता।

         मैंने अपने हॉस्टल से पार्सल उठाये और कर्नल साहब के बंगले की ओर चल दिया, एक आखिरी कोशिश के लिए।मैंने दरवाज़ा खटखटाया तो सामने पद्मा थी। मुझे देख कहने लगी- अब दोबारा यहाँ कोई तमाशा नहीं चाहिए मुझे,तुम जाओ यहाँ से। अलख की आवाज़ आई 'सुनो' अन्दर आ जाओ। मैंने कहा- मैं कर्नल साहब से मिलना चाहता हूँ। उसने पापा कहकर आवाज़ दी तो कर्नल साहब आ गए।

          मैंने जब कर्नल साहब को सब बताया तो पहले हैरानी से मुझे देखते रहे, उसके बाद बोले- तुम्हें क्या लगता है तुम हमें बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा कर लोगे।अलख अब कभी एवरेस्ट नहीं चढ़ पाएगी दोबारा, उसे सपने दिखाने की कोशिश भी मत करना। तुम्हारा क्या है तुम कल को कह दोगे मेरा अविष्कार फेल हो गया पर मेरी बेटी की ज़िन्दगी पर मैं तुम्हें ऐसा कुछ नहीं करने दूँगा। अब तुम जा सकते हो जैसे ही उन्होंने कहा, मैं अलख को देख रहा था।वो चुप थी तो मैं कहने लगा- तुम्हें तो मुझ पर भरोसा है न अलख।जब उसने कुछ नहीं कहा तो मैं कहने लगा- कोई बात नहीं अलख तुम्हें नहीं चढ़ना एवरेस्ट पर तो मत चढ़ो पर मेरे दो सालों की मेहनत है इसमें, इसे मैंने खास तुम्हारे लिए बनाया है तुम इसे लेने से मना मत करना, अब ये पूरी दुनिया में सिर्फ तुम्हारे पास ही रहेगा। पार्सल घर पर छोड़कर, मैं जाने के लिए मुड़ा ही था कि अलख ने जैसे ही कहा 'सुनो' तो मैं कहने लगा- 'इन्सान शरीर से नहीं दिमाग से अपाहिज होता है अलख' और मैं तुम्हें लैब में परीक्षण के लिए रखा जाने वाला चूहा नहीं बल्कि शेर समझता हूँ,मेरा यहाँ आने का मकसद पूरा हुआ,'एक बार तुमसे मिलने की ख्वाहिश थी पूरी हो गयी और कुछ ख्वाहिशों का ज़िन्दगी में अधूरा रह जाना भी ज़रूरी होता है,' कल मैं जा रहा हूँ कहकर, मैं उनके बँगले से निकल आया।

            सब हैरानी से मुझे देख रहे थे। पद्मा ने कर्नल साहब से कहा- उसकी खोज बहुत अच्छी है पापा पर हम इसे कैसे अपने पास रख सकते हैं,एक काम करते हैं मैं शाम को इसे लौटा आऊँगी। अलख उठी उसने वो पार्सल अपने हाथ में लिया और अपने कमरे में चली गयी।कर्नल साहब पद्मा और तृप्ति जी आपस में बात कर रहे थे,अलख अपने कमरे से सब सुन रही थी। कर्नल साहब ने कहा- अलख को अब आदत हो गयी है सहारा लेकर चलने की और हम सब हैं न उसके साथ हमेशा।

              सारी दोपहर अलख अपनी सोच में डूबी रही। मैं पूरी दोपहर अपने कमरे में पड़े गाने सुनता रहा। इतने सालों से बस यही एक साथी थे मेरे। अचानक अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन साहब को मैंने गाते सुना- 'प्यार सच्चा हो तो राहें भी नज़र आती है, बिजलियाँ अर्श से भी फिर रास्ता दिखलाती हैं'।

               मैं उठा और अपने क़दमों को मैंने जन्तो के स्टाल की ओर बढ़ा दिया। अदरक वाली चाय का बोल, मैं अपनी सोच में ही डूबा था कि देखा अलख एक  हाथ में कश्तियाँ और दुसरे हाथ में मेरा पार्सल लिए चले आ रही थी।मेरे सामने आकर बैठ गयी और कहने लगी तुम्हें मेरी हर छोटी से छोटी बात पता है, मुझे नहीं मालूम था कि कोई मुझे, मुझसे भी ज्यादा जान सकता है। मुझे लगता था कि मोहित मेरे बारे में सबसे ज्यादा जानता है पर तुम तो ऐसा लगता है जैसे मेरा आइना हो। मैं जैसी हूँ के साथ-साथ,  तुम मुझे मेरा वो सच दिखाते हो जिसे कोई नहीं समझ सकता। मैं हैरानी से उसे देख रहा था, उसने अपने हाथ मेरी ओर बढ़ाये और बोली चलो झरने के पास चलते हैं,कुछ कश्तियाँ बहानी है।

           मुझे मेरी सुबह बहाई कश्ती को दिखाते हुए बोली- यहाँ मेरे अलावा कोई कश्ती नहीं बहाता ये किसने बहाई। मैंने उदास लहज़े में कहा- मैंने कोशिश की थी पर नहीं बही।उसने उन कश्तियों को उठाने की कोशिश की तो वो गल गयी थीं, उन पर लिखे अक्षरों की स्याहियाँ भी कागज़ की ही तरह घुल गयी होंगी पानी में। अलख ने कहा और तुमने ये सोच  लिया कि जो तुमने लिखा वो पूरा नहीं होगा। उसने मेरी बनाई हुई एक कश्ती जो सुबह मुझसे कहीं गिर गयी थी मेरे हाथों में रख दी और कहने लगी 7 साल... मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि प्यार का ऐसा भी रूप होता है कभी मुझसे मिलने की, बात करने की कोशिश भी नहीं की तुमने। तुम ये भी नहीं जानते थे कि मैं तुमसे कभी मिल भी पाऊँगी या नहीं और तुमने अपने ज़िन्दगी के दो साल लगा दिए इस पैर को बनाने में ताकि कोई तुम्हारी अलखनंदा का अपाहिज समझ तिरस्कार न कर सके।

          मैं चुप था तो अलख डाँटते हुए बोली- दो मुझे कश्ती, मैं बहाकर आती हूँ।अपनी कश्तियों के साथ उसने मेरी कश्ती भी बहा दी और मेरे पास आकर बोली- अपनी खोज को घर पर छोड़ कर चले आये, उसे फिट कौन करना सिखाएगा। मैं मुस्करा उठा तो कहने लगी अगर एवरेस्ट पर चढ़ना है तो कल सुबह से मेरे साथ पहाड़ों पर चढ़ने का अभ्यास करना होगा।मैं कहने लगा मगर पद्मा और कर्नल साहब...

             वो खिलखिला कर हँसते हुए बोली- वानर जी, अब जब संजीवनी बूटी की खोज में आये हो तो पूरा सुमेरु पर्वत अब तुम्हें अपने ही कंधे पर उठाना होगा।मैं अलख के साथ उसके घर जा रहा था, उसके परिवार को मनाने के लिए।मैंने अलख के हाथों से पार्सल ले लिया और उसके साथ चल दिया।आज जब वो बातें कर रही थी तो उसके आँखों में वैसी ही चमक देखी थी जैसी शायद तब रही होंगी जब उसके पापा ने उससे कहा था कि वो उसे एवरेस्ट पर चढ़ने की ट्रेनिंग दिलवाएंगे।

          घर के दरवाज़े पर हम जैसे ही पहुँचे सब बाहर बगीचे में चाय पी रहे थे।मुझे देख सबकी त्योरियाँ चढ़ गई।अलख ने मुझे बिठाया और बोली अब इसे फिट करके दिखाओ। मैं हड़बड़ी में पार्सल खोलने लगा और अपनी खोज अलख को पहना रहा था। उसे पहनने के बाद कर्नल साहब को देख अलख बोली- अब मुझे किसी के सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ेगी पापा। अलख घर कीसीढियाँ चढ़ती, फिर उतरती... थोड़ा तेज़ कदम बढाती फिर रुक जाती... खिलखिलाते हुए बोलती जा रही थी- 'पापा अब कोई आपकी बेटी को पीठ पीछे लंगड़ी नहीं कहेगा।मेरे सपनों को फिर एक बार पंख मिल गए पापा अब बस देर है तो एवरेस्ट पर चढ़ने की।'

अलख ने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर खींचा और उनका हाथ पकड़कर वैसे ही गोल गोल घूम रही थी जैसे बचपन में घूमती थी। थोड़ा लडखडाई तो मैंने उसे संभाल लिया और कहने लगा मैडम ज़रा आहिस्ता अभी इसकी आदत होने में वक़्त लगेगा।कर्नल साहब ने गरजते हुए कहा- बंद करो ये सब। मेरी और मुड़ते हुए बोले- मत खेलो मेरी बेटी के सपनों से।उसके सपने टूटने का दर्द एक बार वो सह गई पर बार-बार नहीं सह पाएगी। मैं कुछ कहता कि अलख बोल पड़ी- पापा मैंने अपने लिए हमेशा से एक ही सपना देखा था और वो था एवरेस्ट। आप हमेशा कहते हैं न पापा सपने हमेशा बड़े देखने चाहिए, वो पूरे हों या न हों पर आपके सपने, आपके अन्दर हौसला बनाये रखते हैं। बड़ी मुश्किल से वापस अपने उसी पुराने हौसले को पाया है पापा, इसे मत छीनिये मुझसे। मैं जानती हूँ कि आप लोग मुझे बहुत चाहते हैं पर कब तक पापा, मैं सहारे की उम्मीद रखूँ। आप लोगों की भी उम्र हो गयी है, पद्मा की भी शादी होगी कल को, उसके बाद मेरा क्या होगा पापा। कर्नल साहब बोले- तुम्हें कुछ हो गया तो... अलख कहने लगी-'हमेशा के लिए अपने मन से ये अपाहिज का बोझ उतारना चाहती हूँ।अपाहिज हम अपनी सोच से होते हैं।मैं मोहित को उसके परिवार को और अपने ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट के साथ साथ उन सभी लोगों को ये जवाब देना चाहती हूँ कि अलखनंदा जोशी ने अपने पैर खोये हैं अपना हौसला नहीं। ये मेरे लिए आर-पार की लड़ाई है पापा मैं एवरेस्ट की चढ़ाई और उसके सच से भली भांति परिचित हूँ पर अनुभव भी तो काम आता है न पापा। इन पहाड़ों से और एवरेस्ट से तो ऐसा लगता है जैसे मेरा कोई पुराना नाता है। दो साल हो गए हमें यहाँ आये हुए भले ही सुबह अब मैं एवरेस्ट की चोटियाँ नहीं देखती पर सपने तो आज भी उसी के देखती हूँ।'

            कर्नल साहब ने मेरी ओर देखा तो मैं कहने लगा- हम कोई लापरवाही नहीं बरतेंगे अलख के साथ। मैं खुद उसके साथ जाऊँगा, साथ ही जाएगी डॉ की टीम भी, जिससे अगर हमें ज़रा सा भी लगा कि अलख को कोई परेशानी हो रही है हम तुरंत वापस आ जायेंगे ये वादा है मेरा आपसे। कर्नल साहब मुझसे बोले- तुम नहीं आओगे, मैं खुद अपनी बेटी को ले आऊँगा। अलख ने अपने पापा की ओर देखा तो वे कहने लगे- रिटायर हुआ हूँ पर हूँ तो एक फौजी ही न, मैं भी साथ चलूँगा। अलख के कंधे पर उनहोंने अपने हाथ रखते हुए कहा- इस बार अपनी बेटी को एवरेस्ट पर झंडा गाड़ते देखना चाहता हूँ ताकि दुनिया गर्व से मुझे अलखनंदा जोशी का पिता कहकर पुकारे।

           हम सबकी आँखों में ख़ुशी के आँसू थे। कर्नल साहब मुझसे मेरे परिवार के बारे में पूछ रहे थे।मैंने कहा- कोलकाता में हैं सब,पापा रिटायर हो गए हैं, माँ हाउस वाइफ हैं और छोटी बहन... की शादी हो गई है। जैसे ही उन्होंने कहा- क्या करते हैं उनके पति। मैं क्याकहूँ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने नजरें झुकाकर कहा- उसने अपनी मर्ज़ी से शादी की थी, इसलिए मैं काफी सालों से उससे नहीं मिला और मैं अब मुंबई में रहता हूँ। अलख ध्यान से मेरे चेहरे पर आये बदलाव को देख रही थी।

          रात का खाना खाते समय कर्नल साहब ने खाते-खाते मुझसे पूछा- तुमसे सब कुछ जान लिया मैंने, सिवाय तुम्हारे नाम के।मैं खाते-खाते अटक गया। अलख ने पानी का ग्लास बढाया कि पद्मा कहने लगी- इनका कहना है पापा कि पहाड़ों में लोग इन्हें 'सुनो' के नाम से जानते हैं और आप तो जानते है  न पापा, सुनो हमारे देश में किसे कहते हैं? मैंने कर्नल साहब की ओर देखा और कहने लगा- मेरा नाम 'डॉ मोहित तिवारी' है। मोहित नाम सुनते ही सबके चेहरे के भाव बदल गए। मैंने सबसे कहा- बस इसीलिए आप सबको नाम नहीं बताया था मैंने। मैं जानता था कि जिस नाम को आप सब कभी सुनना नहीं चाहते उसी नाम के शख्स को कैसे बर्दाश्त करेंगे।मैं उन सबसे कहने लगा- 'मुझे भी पसंद नहीं ये नाम इसलिए कोर्ट में एक एफिडेबिट जमा किया है मैंने नाम बदलने को लेकर।' सब शांत थे मेरे नाम ने सबकी ज़हन में फिर एक बार किसी की यादों को ताज़ा कर दिया था। मैंने खाना खाया और चुपचाप अपने यूथ हॉस्टल के लिए निकलने लगा।अलख और पद्मा मुझे बाहर तक छोड़ने आईं।

              मेरे मुड़ते ही अलख ने कहा- 'सुनो' बदल कर अपना क्या नाम रखोगे सोचा है? मैं मुड़ा और पद्मा की ओर देखते हुए बोला- सोच रहा हूँ 'निरंजन' रख लूँ। दोनों ने हैरानी से मेरी ओर देखा तो मैं खिलखिलाते हुए बोला- कम से कम लोग हमारा नाम साथ में तो लेंगे 'अलख निरंजन' जोर जोर से चिल्लाता हुआ मैं पहाड़ों से नीचे उतर रहा था मेरी आवाज़ और उन दोनों के हंसने की और आवाज़ रात के सन्नाटे में पूरी पहाड़ियों में गूँज रही थी।
उम्मीदों की कश्ती- १

उम्मीदों की कश्ती-२

उम्मीदों की कश्ती-३

उम्मीदों की कश्ती-४

उम्मीदों की कश्ती-६

क्रमशः

                                           अभिधा शर्मा।।



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